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बादल बारिश और झरनों
का शहर चेरापूँजी
ऋषभ देव
चेरापूँजी हिल स्टेशन की
इन्द्रधनुषी सुंदरता का कोई जोड़ नहीं। शायद इसीलिये चेरापूँजी
देश के सबसे खूबसूरत हिल स्टेशनों में गिना जाता है। मेघालय के
उत्तरी-पूर्व इलाका का यह हिल स्टेशन अपनी भव्यता-दिव्यता के
साथ ही सुरम्यता के लिये भी जाना जाता है। चेरापूँजी हमेशा
बादलों की धुंध से सरोबार रहता है, लिहाजा शांत और शीतल परिवेश
रहता है। समुद्र तल से करीब १४८४ मीटर ऊँचाई पर स्थित यह हिल
स्टेशन खासतौर से मानसून के लिये विलक्षणता के लिये जाना
पहचाना जाता है। चेरापूंज की सुंदरता की वजह से इसने दुनिया
में अपनी विशेष जगह बनाई।
मॉनसून के साथ ही बादलों का खिलंदड़पन भी चेरापूँजी को खास
बनाता था। ये चैंकाने वाली बात है कि चेरापूँजी में बारिश रात
में होती है। चेरापूँजी को स्थानीय भाषा में सोहरा कहा जाता
है। चेरापूँजी से शिलांग की दूरी ५३ कि.मी. है। मैं उसी
चेरापूँजी की सड़क पर दौड़ रहा था जिसके बारे में बचपन से पढ़ा था
कि इस जगह पर सबसे ज्यादा बारिश होती है। मैंने नहीं सोचा था
कि कभी यह शहर देखने यहाँ आऊँगा, लेकिन अब चेरापूँजी में था
तो बहुत खुश था।
शिलांग से चेरापूँजी आने का रास्ता बेहद प्यारा है। रास्ता ऊपर
जाते हुए आकाश को छू रहा था। ये वैसा ही था जैसा पहाड़ों में
होता है। आसपास सुंदर पहाड़ थे, घाटी थी और उनको देखते हुए हम
आगे बढ़ते जा रहे थे। दो पहाडों के बीच की घाटियों में भरे पड़े
थे अनन्नास के पेड़ और कुछ ऐसे पेड़ भी थे जिनको मैं पहली बार
देख रहा था। अनेक तरह के फर्न, सुंदर पत्तियों वाले इन पौधों
को देखकर मन कर रहा था, इनको साथ ले चलूँ। ये पहाड़ बद्रीनाथ और
केदारनाथ के पहाड़ों जैसे ऊँचे नहीं थे। कुछ आगे बढ़े तो रास्ते
में एक झरना मिला, ये खूबसूरती है चेरापूँजी की। आपको रास्ते
में वो चीज़ दिखा देगी जिसके बारे में आप सोच भी नहीं सकते।
इसके बाद तो रास्ते में कई खूबसूरत जगहें दिखाई दीं, लेकिन हम
हर जगह रूके नहीं।
पहाड़ों के बीच से गिरता झरना वाकई खूबसूरत लगता है। इसको देखने
के बाद लगता है कि प्रकृति आश्चर्य से भरी हुई है। हम जहाँ खड़े
थे वहाँ से झरने की पतली धारा दिखाई दे रही थी। यहाँ आसपास चीड़
और एरोकेरिया के पेड़ों की भरमार थी, यहाँ के जंगलों में देवदार
नहीं दिखाई दे रहा था। शिलांग से चेरापूँजी की दूरी बहुत कम है
लेकिन पहुँचने में काफी समय लगता है। इसका कारण है वहाँ तक का
पहुँचने का मनमोहक रास्ता। जब डगर इतनी खूबसूरत हो तो हर कोई
यहाँ रूकना चाहेगा। आपका मन बार-बार गाड़ी को ब्रेक लगाने का
करेगा। इस इलाके में बहुत बारिश होती है और उसका असर हम यहाँ
की हरियाली पर देख पा रहे थे। रास्ते में पहाड़ों में कुछ फसलें
भी दिखाई दे रही थीं जो देखने में बेहद खूबसूरत लग रही थीं।
पूर्वी खासी की पहाड़ियों में फैले हरे-भरे घने जंगल, पतली
नदियाँ, पहाड़ी ढलानों में दिखती फसलें, ये सब इस रास्ते को और
भी खूबसूरत बना देते हैं। यहाँ के सदाबहार जंगलों की ही वजह से
ही शायद इसे स्काटलैंड ऑफ ईस्ट कहा जाता है।
ऐसे ही खूबसूरत
नज़ारों को देखते-देखते हम चेरापूँजी पहुँच गए। चेरापूँजी की
समुद्र तल से ऊँचाई १,३०० मीटर है। इस हिल स्टेशन में कई
प्रकार के वनस्पति देखने को मिले। यहाँ कई तरह की फर्न,
स्थानीय फल जैसे चेसनट और अनन्नास के पेड़ तो बहुत हैं। यहाँ
कुछ विशेष फूल भी देखने को मिले। नागफन और ढक्कन वाले फूल तो
विशेष थे ही, साँप सा दिखने वाला एक फूल भी यहाँ के आकर्षण का
केन्द्र है।
चेरापूँजी से कुछ ही दूरी पर नोहकलिकाई वाटरफाल है, जो
चेरापूँजी का सबसे प्रसिद्ध स्थान है। नाहकलिकोई वाटरफाल के
बारे में एक कहानी भी है। हज़ारों फीट ऊपर से गिरता यह दूधिया
झरना अपने में एक मार्मिक कथा समेटे हुए है। कहा जाता है कि
लिकाई नाम की एक महिला जब एक दिन अपने काम से घर लौटी तो उसने
अपने पति से पूछा कि उसका बेटा कहाँ है? पति बोला, मैंने उसे
काटकर खाने के लिये पका लिया है। ये सुनते ही लिकाई पागल हो गई
और और झरने में कूदकर अपनी जान दे दी। तब से इस जगह झरने का
नाम नोहकलिकाई पड़ गया। इस झरने की सुंदरता टूरिस्टों को काफी
लुभाती है, इसके अलावा यहाँ कई प्राचीन और सुंदर गुफाएँ भी
हैं। इन गुफाओं की सुंदरता देखते ही बनती है। इनमें कई गुफाएँ
तो कई किलोमीटर लंबी हैं।
चेरापूँजी में खायर जनजाति के लोग रहते हैं। यहाँ के लोगों ने
बताया कि चेरापूँजी का पुराना नाम सोहरा है। जब यहाँ अंग्रेज़
आए तो वो इस जगह को चुर्रा बुलाने लगे। बाद में चुर्रा से चेरा
हुआ और अब ये चेरापूँजी के नाम से फेमस है। अब फिर से
चेरापूँजी से सोहरा कर दिया गया है लेकिन लोग चेरापूँजी ही
बुलाते हैं। चेरापूँजी हिल स्टेशन में डेविड स्काट का स्मारक
है जो दर्शनीय है।
यहाँ चेरापूँजी की कुछ परंपराओं को भी जानने का मौका मिला।
चेरापूँजी (मेघालय) के खासी और वार-खासी समुदाय में विवाह की
परंपरा पूर्णतः मातृवंशीय है। यहाँ शादी के बाद दुल्हन अपने
माता-पिता के घर नहीं जाती, बल्कि दूल्हा अपनी पत्नी के घर आकर
रहता है। यहाँ दहेज प्रथा नहीं है और महिलाएँ संपत्ति तथा वंश
की मुख्य उत्तराधिकारी होती हैं। शादी के बाद पुरुष अपनी पत्नी
के मायके में जाकर बस जाते हैं। बच्चे अपनी माँ का उपनाम
(सरनेम) अपनाते हैं।
ये सब देखते-समझते हुए मैं
यहाँ की मावस्माई गुफा को देखने के लिये निकल पड़ा। यहाँ आकर
अलग रोमांच पैदा होता है, ये प्रकृति की अद्भुत रचना है।
पत्थरों ने गुफा के अंदर कई आकार लिये हैं। कहीं हाथी, घोड़ा,
हिरण तो कहीं फूल और पक्षी कुछ इस तरह से बने हुए हैं जिन्हें
देखे बिना आप आगे बढ़ ही नहीं सकते हैं। इसी गुफा में एक मूर्ति
है जिसमें हजारों फन का साँप बना हुआ है, पास में ही एक
शिवलिंग है। हम जब गुफा में घुसे तो घुटनों तक पानी भरा था, जो
इस गुफा को ठंडा भी बनाए हुआ था। पत्थरों की ऊँची-नीची, चिकनी
तो कहीं सकरी और चैड़ी आकृतियों पर चलना और चढ़ना मुश्किल तो था
लेकिन मज़ा आ रहा था। यहाँ के स्थानीय लोग बता रहे थे कि पहले
यहाँ अंधेरा रहता था लेकिन अब सरकार ने यहाँ प्रकाश की
व्यवस्था दीं हैं।
चेरापूँजी अपनी घुँघराली पर्वत शृंखला और बादलों की धमाचैकड़ी
के लिये विशेषरूप से प्रसिद्ध है। घुमावदार बादलों से घिरा
चेरापूँजी सुंदरता के नायाब रंग बिखेरता है। जिसे देखकर मैं
मोहित हो गया था, चारों तरफ हरियाली ही हरियाली थी। चेरापूँजी
के पुल प्राकृतिक होते हैं, यहाँ आकर लग रहा था हम प्रकृति की
गोद में हैं। इन प्राकृति पुलों की मज़बूती बेमिसाल होती है।
पेड़ की जड़ों से जुड़ने वाले ये छोटे-छोटे पुल में सच में देखने
लायक हैं। ये कोई अचानक से अपने-आप नहीं बनते हैं, इनको यहीं
के लोग प्रकृति के साथ मिलकर बनाते हैं। इस पारंपरिक तकनीक से
पुल बनाने में लगभग १० से १५ वर्ष का समय लगता है।
चेरापूँजी भारत के उन स्थानों में आता है, जहाँ सबसे ज्यादा
बारिश होती है। जिसकी वजह से ये हिल स्टेशन देश और दुनिया की
सबसे पसंदीदा जगहों में से एक है। ये कहना सही होगा कि
चेरापूँजी शहर की सुंदरता, आश्चर्यजनक पहलुओं और प्रकृति की
विलक्षण रचनाओं के कारण है। बादलों के घर इस शहर के पास बहुत
कुछ है जहाँ जाया जा सकता है। इसमें खासतौर पर मासस्मा गुफा,
क्रेम माल्मलह गुफा, सात बहनों का झरना, क्रेम फिलेट, नेशनल
पार्क ज़रूर जाना चाहिए।
चेरापूँजी जाना बहुत आसान है और इसके लिये कोई भी साधन चुन
सकते हैं। अगर वायुयान से आना चाहते हैं तो सबसे निकटतम हवाई
अड्डा गुवाहटी है। गुवाहटी से चेरापूँजी की दूरी १८१ कि.मी.
है। अगर रेलगाड़ी से आने की सोच रहे हैं तब भी सबसे नजदीक
रेलवे स्टेशन गुवाहटी ही है। इसके अलावा सड़क मार्ग से भी
चेरापूँजी पहुँचा जा सकता है। |