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 प्रकृति और पर्यावरण


रक्त तो बहेगा ही
- अनिरुद्ध धामी


"माँ मेरी क्या बानी?
मैं सुन रहा कहानी।
कोई निरपराध को मारे
तो क्यों अन्य उसे न उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे,
न्याय दया का दानी।"
यह मैथिलीशरण गुप्त की कविता का एक अंश है जिस में यशोधरा ने अपने बेटे को करुणा और जीवन की नैतिक जटिलताओं की एक मार्मिक कहानी के माध्यम से समझाया था कि गौतम ने, बुद्ध बनने से पहले, एक बार अपने चचेरे भाई द्वारा आखेट किए गए एक घायल पक्षी की जान कैसे बचाई थी। कविता के अंत में, बेटे राहुल ने मां के प्रश्न के उत्तर में उपरोक्त पंक्तियाँ कहीं थी। जिस मर्म को राहुल ने बाल सुलभ सरलता से तुरंत समझ लिया था, उसी गुत्थी को लेकर मैं वर्षों बाद वयस्क होने पर भी उलझ गया था।

वह मेरा एक यादगार अनुभव था जब मैं भारतीय वन सेवा में शामिल हुआ और केरल के परम्बिकुलम अभयारण्य के वन्यजीव वार्डन के रूप में मैंने अपना पहला कार्यभार संभाला था। यह क्षेत्र उबड़-खाबड़ और दिलचस्प भूभाग के साथ, समुद्र तल से ६०० मीटर से लेकर १४०० मीटर की ऊँचाई तक फैला हुआ था। कुल ३०० वर्ग किलोमीटर के अभयारण्य में लगभग ८० वर्ग किलोमीटर में सागौन के पेड़ लगाए गए थे। ब्रिटिश अधिकारियों ने स्वतंत्रता से पहले और फिर भारतीय वन अधिकारियों ने साठ के दशक तक बड़े परिश्रम से उनकी देखभाल की थी ताकि लकड़ी के उत्पादन को बढ़ाया जा सके।

पूरी परम्बिकुलम घाटी में जैव विविधता फल फूल रही थी और हर स्थान जंगली जानवरों से भरा हुआ था। वहाँ सफलतापूर्वक वनरोपण निश्चित ही एक दुश्वार कार्य रहा होगा क्योंकि बिना किसी बिजली की सुविधा वाले श्रमिक कैंपों की अँधेरी रातों में जंगली हाथियों के पैरों तले कुचले जाने और मांसाहारी जानवरों के शिकार होने का खतरा लगातार बना रहता था। जो अब लंबे समय से नहीं रहे, उन अधिकारियों की मेहनत और समर्पण को सलाम करना चाहिए क्योंकि अपने खून पसीने से स्थापित एक प्राकृतिक विरासत वे हमें सौप कर चले गए। अभयारण्य निजी बागानों से घिरा हुआ था, जहाँ कॉफी, चाय और इलायची जैसी नकदी फसलों की खेती की जाती थी। पट्टे पर ली गई वनभूमि पर घने पेड़ों के बीच इन की अच्छी फसल होती थी और बागानों के मालिक बड़े रईस लोग थे।

जिम्मेदारी संभालने के तुरंत बाद मैंने ३-४ दिन तक अभयारण्य की प्रबंधन योजना का अध्ययन किया। उसके बाद वह शायद मेरा पहला सप्ताह था जब मैं अपने रेंज अधिकारी और अन्य फील्ड स्टाफ के साथ जंगल में ट्रैकिंग करने निकला था। दो घंटे तक पैदल चलने के बाद एक स्थान पर जंगल की चुप्पी को तोड़ते हुए कुछ कुत्तों की भौंकने की आवाज हमने सुनी। अगले कुछ क्षणों में क्या होने वाला था, मुझे इसका कोई अंदाजा नहीं था।

कुछ समय बाद हमने जो दृश्य देखा उसे मैं आज तक नहीं भूला हूँ। हमने देखा कि चार घरेलू कुत्ते एक जंगली साम्भर के पीछे पड़े हुए थे। एक कुत्ता साम्भर की गर्दन को दाँतों से जकड़े हुए था, जबकि दूसरा कुत्ता उसके पुट्ठों पर दाँत गड़ाए लटका हुआ था और उस कुत्ते के चारों पैर हवा में थे। साम्भर स्पष्ट रूप से कुत्तों से अपनी जान बचाने के लिए बेतहाशा दौड़ रहा था, लेकिन उसके शरीर पर लटके दो कुत्तों के वजन के कारण वह शिथिल हो रहा था।

मेरे साथ आए वन विभाग के स्टाफ ने आनन फानन में धरती पर पड़े पत्थर उठाए और उन्हें कुत्तों पर फेंकने लगे। आक्रमणकारी कुत्ते अचानक अपने विरुद्ध हुए हमले से ठिठक गए और साम्भर को छोड़ कर तितर बितर हो गए।अनपेक्षित दैवीय हस्तक्षेप को देखकर साम्भर ने तत्काल अपनी दौड़ने की दिशा बदल दी और हमारे समूह के बहुत करीब एक झाड़ी के पीछे आ कर खड़ा हो गया। कुछ पत्थर जो कुत्तों पर फेंके गए थे, वे सटीक निशाने पर लगे भी थे। कुत्तों का समूह अब निरुत्साहित हो कर बिखर गया था और वे सभी हमसे सुरक्षित दूरी बनाए हुए ललचाई आँखों से साम्भर की ओर देख रहे थे।

कुछ और पथराव और स्थानीय स्टाफ से कुछ तीखी मलयालम गालियाँ खाने के बाद कुत्तों को पीछे हटना पड़ा। ऐसा लगा जैसे किसी ने उन्हें गुप्त संकेत दिया हो। वे वहाँ से ऐसे भागे जैसे किसी सेना के कमांडर के आदेश पर उसके सैनिक कोई राणनीति अपनाते हुए पीछे हट जाते है। यह कहना कठिन था कि मैदान छोड़ कर जाने के लिए उन्हें किस ने अधिक बाध्य किया था — पत्थरों से मिली शारीरिक चोट ने अथवा उनके खिलाफ दी गई गालियों ने?

पूरा घटनाक्रम बड़ी तेजी से हुआ था। प्रारंभिक उत्तेजना कम होने के बाद मैंने साम्भर को गौर से देखा तो पाया कि उसकी गर्दन और पीठ पर कुत्तों द्वारा काटे जाने पर घावों से रक्त बह रहा था। आमतौर पर कोई भी जंगली पशु, मनुष्यों के इतने इतनी निकट नहीं आता है। लेकिन उस दिन शायद उस हिरन ने महसूस किया कि हम उसकी रक्षा करने की चेष्टा कर रहे थे और इसलिए उसने भयभीत होकर हमसे दूर भागने की अपनी प्रवृत्ति पर काबू किया था।

आश्चर्यजनक रूप से जानवर हमारे इतने पास था कि मैंने उसके शरीर को भय से काँपते हुए देखा था। हमने स्थिति का निरीक्षण किया और इस निष्कर्ष पर पहूँचे कि वह गंभीर रूप से घायल नहीं था और यम के द्वार से वापस आ चुका था। मेरे स्टाफ ने मुझे बताया कि कुछ बागान मालिकों और उनके श्रमिकों ने घरेलू कुत्ते पाले हुए थे जो जंगली जानवरों का शिकार करने के लिए प्रशिक्षित थे। वे कभी-कभी मांस के लिए अभयारण्य में अवैध प्रवेश करते थे। हमने साम्भर को वहीं छोड़ दिया ताकि वह अपने आघात से उबर सके।

पास खड़ी अपनी मारुति जीप में हम सवार हुए और उन कुत्तों वाली दिशा में आगे बढे। हमने अभयारण्य की सीमा पर स्थित एक कॉफी बागान में प्रवेश किया और पूछताछ की लेकिन हमें कुत्तों का नामो निशाँ न दिखा। वे ऐसे गायब हो चुके थे जैसे साँप अपने बिल में छुप जाता है। निराश हो कर हमने बागान के श्रमिकों को कड़ी चेतावनी दी कि अगली बार ऐसी घटना होने पर हम कुत्तों को मौके पर ही गोली मार देंगे, उनके मालिकों को पहले गिरफ्तार करके बाकी पूछताछ बाद में करेंगे। बॉलीवुड पिक्चर शैली का यह संवाद बिलकुल गैर इरादतन ही था जिसे हमने संभवतः केवल भयभीत करने के लिए ही उपयोग किया था क्योंकि हमें मालूम था कि कानून की दृष्टि से ऐसा हम चाह कर भी नहीं कर सकते थे।

वापस लौटते हुए कुछ क्षणों के लिए मैं एक निरीह पशु को मौत के मुँह से बचाने पर आत्ममुग्ध होता रहा। हालाँकि, वह भावना लंबे समय तक नहीं रही क्योंकि एक और विरोधाभासी विचार मन में उमड़ पड़ा। जंगल में जीवित रहना एक सतत परिश्रम है। एक जानवर को स्टाफ के हस्तक्षेप के कारण बचाया गया था लेकिन ऐसा करते हुए हमने उन चार कुत्तों से उनके श्रम का फल भी छीन लिया था। मैं किस नैतिक आधार पर यह तय कर सकता था कि कौन सा जानवर जीवन के लिए अधिक दावा रखता था? क्या हमारी करुणा उस सन्दर्भ में उचित थी? यदि उस दिन पालतू कुत्तों की बजाय जंगली कुत्ते अथवा बाघ उस साम्भर का पीछा कर रहे होते तो भी क्या उसी तरह का हमारा हस्तक्षेप उचित होता ?

१ मई २०२५

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