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बेस्वाद आमलेट
- अनिरुद्ध धामी
हैदराबाद के सालार जंग संग्रहालय में वहां की एक घड़ी
विशेष आकर्षण है। जब भी घड़ी की बड़ी सुई १२ के अंक पर
पहुँचती है, तो घड़ी के अंदर का छोटा दरवाजा खुलकर एक
खिलौना स्वरूप दाढ़ी वाला व्यक्ति बाहर निकलता है और
ध्वनि के साथ उतनी बार घंटी बजाता है जितना समय हुआ
होता है—जैसे १०:०० बजे वह दस बार घंटी बजाएगा।
इसी तरह वर्षों पहले आईआईटी, दिल्ली के 'ज्वालामुखी'
छात्रावास में भी हर शाम ठीक ७:०० बजे एक मेस कर्मचारी
की ड्यूटी थी कि वह एक हाथ में पीतल का गोल तवा और एक
हाथ में हथौड़े से लगभग आधा मिनट तक घंटा बजाकर
छात्रों को रात्रि भोजन तैयार हो जाने की सूचना दिया
करता था। गर्मी, सर्दी या बरसात—यह क्रम लगातार चलता
रहता था। घंटे की आवाज से पूरा छात्रावास गुंजायमान हो
जाता और छात्र धीरे-धीरे अपनी सुविधानुसार भोजन करने
आने लगते।
जहाँ तक मुझे याद है, इसमें साल भर में केवल एक अपवाद
होता था। दिवाली की रात को त्योहार के उपलक्ष्य में
मेस कर्मचारियों की छुट्टी होती थी, इसलिए रात में
भोजन नहीं बनता था। आज के समय में घंटा बजाकर छात्रों
को भोजन के लिए निमंत्रित करना थोड़ा अजीब लग सकता है,
किंतु यह याद रहे कि उस समय, आज की पीढ़ी के विपरीत,
हम लोग उतना अधिक घड़ियों से नियंत्रित नहीं थे। मुझे
तो जीवन की पहली एचएमटी घड़ी आईआईटी में दाखिले के साथ
ही मिली थी।
जिन दिनों पूरे सेमेस्टर की पढ़ाई की फीस ₹२५० थी, उन
दिनों हमारे मेस के लिए मासिक १२५ रुपए का भुगतान करना
पड़ता था। हालाँकि, अन्य कॉलेज और संस्थानों की तुलना
में यह शुल्क कम था। इसका कारण था कि मेस कर्मचारियों
का वेतन आईआईटी देता था, उसका भार छात्रों पर नहीं
पड़ता था। हर दिन का खाने का मेन्यू निर्धारित था।
पाँच वर्ष के अंतराल में पढ़ने वाले विषय और पढ़ाने
वाले अध्यापक बदलते रहे, किंतु नहीं बदले तो मेस में
मिलने वाले भोजन का मेन्यू और मेस के कर्मचारी। संभवतः
इसीलिए कई पढ़े हुए विषय और अध्यापक तो चालीस-पैंतालीस
साल बाद अब मुझे याद नहीं, किंतु ज्वालामुखी मेस का
हेड वेटर, राम सिंह, मुझे आज भी याद है। राम सिंह को
याद रखने के पीछे एक घटना भी है, जो उस समय मुझे शर्म
से पानी-पानी कर गई थी।
राम सिंह पचास साल का दोहरे बदन का व्यक्ति था, जो
सदैव एक गंभीर मुद्रा धारण किए रहता था। मैंने उसे
मुस्कुराते हुए तो कभी नहीं देखा था। मेस के अन्य
कर्मचारियों की तरह मेज पर खाने के बर्तन और भोजन
परोसने का काम उसका नहीं था। खाने वाले बड़े हॉल के
साथ किचन जुड़ी हुई थी और दोनों के बीच एक दीवार थी।
इस दीवार के पीछे और किचन के आगे छोटे से स्थान पर कमर
की ऊँचाई तक एक काला ग्रेनाइट का स्लैब था, जहाँ भोजन
और धुले बर्तन रखे जाते थे। दिन और रात के भोजन के लिए
तो बर्तन और खाने का सामान छात्रों को कर्मचारियों
द्वारा मेज पर पहुँचाया जाता था, किंतु हर सुबह
छात्रों को स्वयं इस स्लैब से बर्तन और नाश्ता लेना
होता था। राम सिंह की ड्यूटी इसी स्थान पर थी, जहाँ वह
सभी लोगों पर 'बाज' की दृष्टि गड़ाए यह देखता रहता कि
सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है या नहीं।
राम सिंह की पैनी और अति गंभीर स्थिर मुद्रा का
रहस्योद्घाटन यहाँ पर करना आवश्यक है। दरअसल, नाश्ते
के समय स्लैब पर अंडों के ऑमलेट, ब्रेड कटलेट, मक्खन
के छोटे कटे हुए टुकड़े और दूध से भरे गिलास पड़े होते
थे। छात्रों से अपेक्षा थी कि हर व्यक्ति अपने हिस्से
का केवल एक ही नग और एक गिलास दूध ही उठाएगा। किंतु
अपेक्षा और लालच के बीच का द्वंद्व तो आदिकाल से
निरंतर चला आ रहा है। इसलिए छात्रों के ऊपर यदि
निगरानी न होती, तो देर से आने वाले छात्र अपने हिस्से
के भोजन से वंचित रह जाते। राम सिंह की यही मुख्य
भूमिका थी और जिसके डर के कारण छात्र शराफत से केवल
अपना हिस्सा लेकर आगे बढ़ जाते। जब कभी राम सिंह किचन
में जाता, तो कुछ साहसी छात्र अवसर का लाभ उठाकर तुरंत
दो या तीन ऑमलेट अपनी थाली में डालकर फुर्ती से हॉल
में खाने पहुँच जाते। मेरा एक मित्र तो इस कला में
इतना माहिर था कि वह राम सिंह की उपस्थिति में भी उसकी
नज़र इधर-उधर होते ही यह कारगुजारी कर जाता।
छुट्टी की एक सुबह मैं अपने मित्रों के साथ नाश्ता
करने मेस पहुँचा। किचन से गरम-गरम ताजे ऑमलेट बनकर
स्लैब पर रखे जा रहे थे और कतार में खड़े छात्र
अपना-अपना हिस्सा लेते हुए आगे बढ़ रहे थे। हमेशा की
तरह राम सिंह वहाँ खड़ा व्यवस्था का निरीक्षण कर रहा
था। जहाँ उसका ध्यान जरा भटका, वहीं कतार में मेरे आगे
खड़े कलाकार मित्र ने तुरंत दो ऑमलेट अपनी थाली में
डाले और ऊपर से ब्रेड से ढकते हुए दूध का गिलास पकड़ा
और हॉल में चला गया। चूंकि मैं अपने मित्र के बिल्कुल
पीछे खड़ा था, इसलिए अपने लोभ को मैं भी न रोक पाया और
मैंने भी झट से दो ऑमलेट उठाए, दूध का गिलास पकड़ा और
निर्विकार भाव से हॉल में अपने मित्र की बगल वाली
कुर्सी पर बैठ गया। 'खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता
है'—यह कहावत इन्हीं अवसरों से आई होगी।
अभी मैं इत्मीनान से कुर्सी पर बैठकर ऑमलेट को ब्रेड
के बीच दबा ही रहा था कि राम सिंह मेरे सामने दैत्य की
तरह आकर खड़ा हो गया और उसने जलती निगाहों से पूछा,
“आपने दो ऑमलेट क्यों लिए?”
मैं बिल्कुल सन्न हो गया, क्योंकि मन में ग्लानि तो थी
ही। मैंने जीवन में बहुत सारी परीक्षाएँ दी हैं, किंतु
कभी किसी प्रश्न से मुझे इतना पसीना नहीं आया होगा
जितना राम सिंह के उस एक सवाल से आया था। मैंने
निरुत्तर होकर अपने मित्र की थाली पर दृष्टि डाली ताकि
राम सिंह का ध्यान वहाँ आकर्षित कर सकूँ और साबित हो
सके कि उस गुनाह में मैं अकेला नहीं था। मेरे आश्चर्य
का ठिकाना न रहा जब मैंने पाया कि मित्र की थाली में
केवल एक ही ऑमलेट था, जिसे वह आराम से मुस्कुराकर खा
रहा था और मेरी स्थिति का पूरा लुत्फ़ उठा रहा था।
मैं शर्म से गड़ा जा रहा था और राम सिंह सबके सामने
मुझे घूरे जा रहा था। यह कहना कठिन है, पर कुछ देर बाद
शायद उसे स्वयं ध्यान आया होगा कि उसका अपना मोर्चा
छोड़ने पर और अधिक अंडों की क्षति होने की संभावना थी
या मेरी दीन-हीन अवस्था देखने पर उसका दिल पसीज गया
होगा। पर बिना और कहा-सुनी के वह वापस अपने स्लैब पर
चला गया।
राम सिंह के जाने के बाद मैंने अपने मित्र से पूछा कि
उसने भी तो दो ऑमलेट लिए थे, फिर राम सिंह मेरे पास ही
क्यों आया। उस पर मित्र ने मेरी नादानी पर हँसकर जवाब
दिया कि उसने स्लैब से हॉल तक चलते-चलते ही पहला ऑमलेट
खा लिया था और दो ऑमलेट का कोई सबूत बचा न था। पाठकों
को मैं विश्वास दिला दूँ कि उस दिन के दो ऑमलेट मैंने
खाए तो अवश्य, किंतु मन में अपनी लज्जा, ग्लानि और
कसैलेपन के कारण स्वाद और आनंद एक ऑमलेट का भी नहीं
आया।
आज लगता है कि उस दिन राम सिंह ने बिना अधिक चेष्टा
किए हुए कबीर का पुराना दोहा कुछ इस तरह से समझा दिया
था:
ऑमलेट अपना खाय के, दूध गिलास का पीव,
एक और की चाह में, मत ललचाये जीव। |