|

होली के तीन रंग
१. विदेशों में होली-
डॉ. अनिता कपूर
२. अमेरिका में होली-
विनीता तिवारी
३. होली का वह रोमांचक
दिन-
पूजा अनिल
१.
विदेशों में होली
-
डॉ. अनिता कपूर
भारत से बाहर विदेशी धरती पर रहते हुए भी भारतीय अपनी
संस्कृति और धर्म को विरासत के रूप में अपने बच्चों को
देना चाहते रहे हैं और देते आ रहे हैं। इसी सांस्कृतिक
और धार्मिक मूल्यों के प्रति लगाव के कारण, बाहर रहते
हुए भी सभी त्योहार बिल्कुल वैसे ही मनाए जाते हैं
जैसे भारत में। आप स्वयं देखकर भी विश्वास नहीं कर
पाएँगे कि आप भारत में न होकर किसी विदेशी धरती पर
हैं। मुझे अमेरिका के अलावा अन्य देशों में रह रही
अपनी मित्रों से ‘होली’ के त्योहार पर बात करने का
मौका मिला, जो आपसे साझा कर रही हूँ।
लंदन में बरसों से बसी मीनाक्षी ने बताया कि होली लंदन
और उसके बाहर सभी बड़े शहरों में व्यापक रूप से मनाई
जाती है। मुख्यत: धार्मिक संस्थानों और स्थलों (मंदिर
आदि) पर विभिन्न संगठनों के लोग मिलकर इस उत्सव का
आयोजन करते हैं, जहाँ होली मिलन, होली खेलना और जलपान
के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है।
बाज़ारों में भारतीय दुकानों पर उत्कृष्ट टेसू के रंग
भी आसानी से मिलते हैं। आयोजन स्थलों पर व्यक्तिगत
सुरक्षा और सफाई का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है और
किसी को भी हानिकारक रंगों का या गलत तरीके का
इस्तेमाल नहीं करने दिया जाता। उत्सव के प्रति इतनी
उत्सुकता देखने को मिलती है कि वहाँ के स्थानीय मूल
निवासी और यहाँ तक कि सुरक्षाकर्मी भी इसके आकर्षण से
अछूते नहीं रह पाते। सभी इस खूबसूरत प्रेम-मिलन के
उत्सवी रंग में सराबोर हो जाते हैं। सभी लोग अपनी पसंद
के आयोजन स्थल पर जाकर बहुत ही उल्लास और प्रेम के साथ
आपस में होली खेलते हैं। फिर जलपान करके अपने-अपने
घरों को जाते हैं और शाम को सभी मित्रों व शुभचिंतकों
से मिलने का सिलसिला शुरू होता है। इन्हीं स्थानों पर
धुलेंडी से एक दिन पहले होलिका दहन का भी आयोजन किया
जाता है।
बहुत वर्षों से न्यूयॉर्क में रहने वाली कौसविला जी,
जो दक्षिण अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित गुयाना
की रहने वाली हैं, वहाँ मनाई जाने वाली होली को भुला
नहीं पातीं। होली के उत्साह को याद करके वे बात करते
हुए भी रोमांचित हो उठीं। उन्होंने बताया कि वहाँ लोग
होली को 'फगवा' भी कहते हैं और होली का विशेष गीत
'चौताल' गाते हुए एक-दूसरे पर रंगों का छिड़काव करते
हैं। इसकी शुरुआत एक महीने पहले 'अरंडी' का पौधा रोपने
के साथ होती है, जिसे बाद में होलिका के रूप में जला
दिया जाता है। यह परंपरा प्रह्लाद की भक्ति और बुराई
पर अच्छाई की विजय की पौराणिक गाथा को दर्शाती है।
चूँकि गुयाना में ४०% से भी ज़्यादा हिंदू रहते हैं,
इसलिए होली के दिन वहाँ छुट्टी रहती है और लोग अपने
परिवारों के साथ समय बिताना पसंद करते हैं।
सूरीनाम में रह चुकीं और हिंदी के लिए काम कर रही
भावना सक्सेना जी ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया
कि सूरीनाम में भारतीयों की एक बड़ी संख्या है, जो
उत्तर प्रदेश और बिहार से जाकर वहाँ बसे हैं। इसलिए
वहाँ होली बहुत खुशी और उत्साह से बिल्कुल वैसे ही
मनाई जाती है जैसी भारत में। यहाँ के लोग होली गीत
गाते हुए एक-दूसरे पर रंग छिड़कते हैं और गले मिलते
हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत की प्रतीक होलिका को होली
की पूर्व संध्या पर जलाया जाता है। यहाँ भी गुयाना की
तरह ही अरंडी का पौधा बोया जाता है और बाद में उसे
जलाया जाता है। गुयाना, त्रिनिदाद, टोबैगो और सूरीनाम
में हिंदुओं की संख्या बहुतायत में होने के कारण
त्योहारों को मनाने के ढंग में काफी समानता दिखती है।
इन दिनों लोग एक-दूसरे के घरों में या मंदिरों में
चौताल और तान गायन में संलग्न रहते हैं। गुलगुले, चना,
खीर या मीठे चावल का प्रसाद चढ़ाकर आपस में बाँटकर
खाते हैं।
चूँकि मैं अमेरिका में रहती हूँ, यहाँ संयुक्त राज्य
अमेरिका में बसे भारतीयों की एक बड़ी आबादी है; इसी
कारण होली बहुत उल्लास और धूमधाम के साथ मनाई जाती है।
भारतीय और धार्मिक संगठनों द्वारा गठित विभिन्न समाज
लोगों को इस खुशी का जश्न मनाने और अपनी सांस्कृतिक
जड़ों के करीब महसूस करने में मदद करते हैं। इस अवसर
पर उनके द्वारा संगीत कार्यक्रमों और होली मिलन का भी
आयोजन होता है। इससे नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक
पहचान समझने में मदद मिलती है। बच्चे त्योहारों के
महत्त्व को समझते हैं और उनसे जुड़ी कथाओं के बारे में
सीखते हैं। त्योहार का भारी उत्साह विशेष रूप से उन
शहरों में देखा जा सकता है जहाँ भारतीय बड़ी संख्या
में बसे हैं।
२. अमेरिका में होली
- विनीता तिवारी
होली का त्योहार मुझे बचपन से ही नापसंद रहा है।
केमिकल मिले रंग, फटे-पुराने रंगहीन कपड़ों का संग,
अनौपचारिक ढंग और होली के नाम पर होने वाली बचकानी व
कभी-कभी गैर-कानूनी हरकतों और हुड़दंग की वजह से यह
त्योहार मेरे पसंदीदा त्योहारों की सूची में कभी नहीं
रहा।
१९९७ में जब हम अमेरिका आए थे, तब हमारे शहर में
भारतीयों की संख्या काफी कम थी। लेकिन धीरे-धीरे
कंप्यूटर के क्षेत्र में बढ़ती माँग और हमारे शहर का
वाशिंगटन डी.सी. से लगा होने की वजह से उत्तरी
वर्जीनिया में नए आने वाले भारतीयों की संख्या में
तेज़ी से बढ़ोतरी हुई। यहाँ तक कि हर भारतीय समुदाय और
राज्य से जुड़ी संस्थाओं का पता चलने लगा। चूँकि हम
दोनों पति-पत्नी की जड़ें भारत के राजस्थान राज्य से
जुड़ी हुई थीं, तो हमने भी 'राजस्थली' द्वारा आयोजित
होली-दीपावली के त्योहारों में हिस्सा लेना शुरू किया।
मज़े
की बात यह थी कि होली हो या दीपावली, दोनों ही
त्योहारों को मनाने का राजस्थली तरीका करीब-करीब एक
जैसा ही था—यानी सांस्कृतिक कार्यक्रम, मिलना-जुलना और
खाना-पीना। इसलिए नापसंदगी जताने की कोई वजह नहीं रही।
वैसे भी मुझे बचपन से नृत्य, संगीत, नाटक और कविता
जैसी कलाओं का शौक रहा था, तो त्योहारों के साथ
सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन मेरे लिए 'सोने पर
सुहागा' जैसा रहा। बच्चों को भी अपनी जड़ों से पहचान
कराने का एक अच्छा और सौम्य तरीका मिल गया।
तो हुआ यूँ कि मैं, जो २००६-२००७ में इस 'राजस्थली'
नामक संस्था से जुड़ी थी, सांस्कृतिक समन्वयक,
कोषाध्यक्ष और उपराष्ट्रपति होते हुए २०२४ में दो साल
के लिए संस्था की 'प्रेसिडेंट' (अध्यक्ष) बना दी गई।
अब होली-दीपावली के त्योहारों को अपनी अभिरुचि के
अनुसार आयोजित करने की मेरी बारी थी। पिछले कई सालों
से हर त्योहार पर सांस्कृतिक कार्यक्रम करते-करते मेरा
मन कुछ अलग करने को चाह रहा था, सो २०२५ की होली खुले
प्रांगण में मनाना तय किया।
एक
सुंदर से पार्क में झील के किनारे पूरे दिन के लिए एक
'कैनोपी' किराए पर ली गई। वहीं पर खुले में ग्रिल के
ऊपर पूरी-पकोड़ी तलने का इंतज़ाम किया गया। साथ में
चाट, गोलगप्पे, आलू की सब्ज़ी, ठंडाई और चाय भी रही।
कैनोपी किराए पर लेने का लाभ यह था कि धूप और छाँव
दोनों सहजता से उपलब्ध थे।
एक तश्तरी में थोड़ा सा 'ऑर्गेनिक' गुलाल मेहमानों का
तिलक लगाकर स्वागत करने के लिए रखा गया, जो घास,
पेड़-पौधों और त्वचा, किसी के लिए भी हानिकारक नहीं
था। उसमें भी यदि किसी को गुलाल पसंद नहीं हो, तो कोई
ज़ोर-ज़बरदस्ती का प्रावधान नहीं था। दो घंटे के लिए
एक ढोल का भी इंतज़ाम किया गया, जिसकी वजह से
सांस्कृतिक
कार्यक्रमों की कमी बिल्कुल महसूस नहीं
हुई। बच्चे, बूढ़े और जवान, सभी ढोल की थापों पर एक
साथ थिरक रहे थे—बिल्कुल अपने मूल स्वरूप में। उस दिन
मौसम ने भी भरपूर साथ निभाया। न बारिश हुई, न ज़्यादा
सर्दी थी और न ज़्यादा गर्मी। नाचने-गाने के बाद कुछ
खेल भी खेले गए, जिनमें क्रिकेट ज़्यादातर पुरुषों का
पसंदीदा खेल रहा। वहीं कुछ अतिथियों ने प्रकृति के
अवलोकन का आनंद लिया। झील के किनारे-किनारे टहलने के
लिए पगडंडी भी बनी थी। मतलब मनोरंजन के साधनों की कोई
कमी नहीं थी। पूरी दोपहर कैसे हँसते-खेलते बीत गई, पता
ही नहीं चला।
अमेरिका में मनाई गई यह होली मेरे पसंदीदा उत्सवों में
से एक रही!
३. होली का वह
रोमांचक दिन-
पूजा
अनिल
यह तब की बात है जब मैं ग्यारह-बारह साल के बीच की रही
होऊँगी। बचपन से थोड़ा-सा बड़े होने के दिन थे वे,
दुनिया को समझने के लिए आँखें खोलने वाले दिन। जब बचपन
विदा ले रहा होता है, तब सब कुछ अलग-अलग सा दिखने लगता
है, वैसे वाले अलग दिन थे। दिल ने अभी तक सपने देखना
शुरू नहीं किया था, जीवन की जिम्मेदारी का कोई मसला
नहीं था, लेकिन सब कुछ जान लेने की उत्सुकता बल मारने
लगी थी। यह उत्सुकता जैसी भावना जो न करवाए वह कम है,
और खास तौर पर उस बचपन-कैशौर्य की ड्योढ़ी पर हज़ारों
जिज्ञासाएँ जाने क्या-क्या धमाल करवाने पर तुली रहती
हैं!
मेरे मन में भी एक उत्सुकता बड़ी बलवती थी। मैंने सुना
था कि उनके घर में बड़ी धमाल वाली होली खेलते थे। जो
भी उस घर के अंदर प्रवेश करता, उसे आँगन में ही पकड़
लिया जाता और फिर धमाल शुरू! हमारे घर में जो भी आता
था, उनके घर की होली के ऐसे-ऐसे मज़ेदार किस्से सुनाता
था कि हम हँस-हँस कर दोहरे हुए जाते थे। बस, वही वाली
'धमाल पकड़ होली' देखने की जिज्ञासा मेरे जाते हुए
बचपन की फाँस बन गई थी। मैं हमेशा से होली से दूर
भागने वाली बच्ची थी, लेकिन वह होली देखने को मन मचल
उठा था।
आप लोग सोच रहे होंगे कि मैं किनके घर की बात कर रही
हूँ? तो ऐसा है कि हम जिस घर में किराये पर रहते थे,
उस घर की मालकिन, सीमा आंटी, भी अपने परिवार के साथ
उसी घर में हमारे साथ रहती थीं। सीमा आंटी बड़ी
मिलनसार महिला थीं, मेरी माँ भी उनसे खूब दोस्ती
निभाती थीं, तो हम लोग अधिकतर साथ ही बैठे रहते थे।
बातें, खाना-पीना, सब साथ ही चलता था। उनकी छोटी बहन,
अनु, मुझसे केवल दो साल ही बड़ी थी और अक्सर सीमा आंटी
से मिलने आया करती थी। वैसे तो अनु और मैं अलग-अलग
स्कूलों में पढ़ते थे, लेकिन सीमा आंटी के यहाँ अक्सर
मिलते-मिलते और बात करते-करते हमारी दोस्ती हो गई थी।
तो ऊपर यह जो होली का बखान किया न, यह उन्हीं के घर का
किस्सा था। वे लोग एक अन्य कॉलोनी में रहते थे, जहाँ
पर मेरे चाचा का भी घर था। चाचा भी उनकी होली का हाल
जानते थे।
उस साल होली आने वाली थी, तब मैंने अपने चाचा जी से
कहा कि मुझे अनु के घर की होली देखने जाना है। चाचा जी
ने साफ़ मना कर दिया कि वे मुझे वहाँ नहीं लेकर
जाएँगे! उनकी आनाकानी देख कर मैं मन मसोस कर रह गई!
लेकिन बचपना हार कहाँ मानता है, उसके पास अपने तरीके
होते हैं न बड़ों को मना लेने के! तो बस फिर क्या था,
मैंने भी वही हथियार निकाल लिया और अपने बचपने वाली
ज़िद शुरू कर दी! "जाना ही है तो बस जाना ही है, आप
नहीं लेकर जाओगे तो मैं अनु से कह दूँगी, वह अपनी
साइकिल पर ले जाएगी मुझे!" चाचा जी अभी भी समझाने के
मूड में थे, कहने लगे, "अरे बेटा! तुमको रंग लगवाना तक
पसंद नहीं, कोई थोड़ा सा रंग लगा दे तो तुम्हारा
रोना-धोना शुरू हो जाता है, वहाँ जाकर क्या करोगी!
अच्छी बच्ची हो न, मान जाओ और ज़िद न करो!"
शायद इसे ही कहते हैं बचपन वाली ज़िद, कि मैंने भी ठान
लिया कि चाहे कोई कुछ भी कहे, जाना तो है ही। अतः
मैंने उनसे बड़े भोलेपन से कहा कि मैं थोड़ी दूर खड़े
रहकर देखूँगी कि वे लोग कैसे होली खेलते हैं, और
देखना, कोई मुझको रंग नहीं लगाएगा! यह मुगालता 'कि कोई
मुझको रंग नहीं लगाएगा' बड़ा ही जानलेवा था, लेकिन ठान
ही लिया था तो घबराना कैसा! हालाँकि मन में एक डर था
कि किसी ने पकड़ लिया और रंगों में डुबो दिया तो? सच
कहूँ तो इस 'तो?' का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था!
खैर, होली आई। धुलेंडी का दिन, रंगों से दूर भागने
वाली एक लड़की उस अनजानी ज़िद पर अटकी हुई थी। बाहर
सड़क पर होली का माहौल था, लोगों के हाथ में
पिचकारियाँ और पानी से भरे गुब्बारे थे, जेबों में भरा
रंग-बिरंगा गुलाल था। चेहरों पर लाल, पीला, गुलाबी,
हरा रंग लोगों की शक्लें एकदम अजीबोगरीब बना चुका था।
चाचा जी घर आए, मुझे बड़े सलीके से दोनों गालों पर रंग
लगाया और कहा कि तैयार हो जाओ, चलो मेरे साथ। मैं तो
एकदम खुश हो गई! झटपट एक सिंथेटिक कुरता-सलवार पहना,
बालों को पीछे बाँध लिया और चेहरे, गर्दन व बाँहों पर
ढेर सारी वैसलीन लगा ली। चाचा जी अपने घर ले गए, वहाँ
पर मैंने सबको गुलाल लगाया और सबने मुझे भी गुलाल
लगाया। बड़े ही प्यार से हमने होली के रंगों का
आदान-प्रदान किया और मीठा खाया। पारंपरिक तौर पर हमारे
घर में होली पर 'घेवर' (या घियर) खाया जाता है, जो कि
एक बहुत बड़ी जलेबी की तरह होता है—एक तरह से जलेबी का
बड़ा भाई कह लीजिए। इसे शुद्ध घी में पकाया जाता है।
इसका स्वाद जलेबी से भिन्न और अधिक स्वादिष्ट होता है।
फिर अनु आ गई, हमने एक-दूसरे के गालों पर रंगीन गुलाल
लगाया। फिर मैं उसके साथ चल पड़ी, चाचा जी भी
पीछे-पीछे आ रहे थे। उनके घर के बाहर पहुँचते ही
चहारदीवारी से बड़ा शोर सुनाई दे रहा था। कोई हँस रहा
था, कोई 'आह-आह' करके चिल्ला रहा था। तेज़-तेज़ चीखने
की आवाज़ें मुझे डराने लगी थीं। मैंने अनु की ओर देखा,
उसने मेरे मन की बात पढ़ ली और मुस्कुरा कर कहा, "चलो,
कुछ नहीं होगा!"
मैं धीरे चल रही थी और धड़कनें तेज़ थीं। दरवाज़े के
भीतर जाने से पहले ही आँगन का दृश्य डरावना था। आँगन
के बीच में ढेर सारे रंगों का मिला-जुला पानी एक नन्हा
सा तरणताल (pool) बना चुका था। आँगन में ढेर सारे लोग
थे—कुछ अनु के परिवार के, कुछ उनके मित्र और कुछ
कॉलोनी के निवासी। सभी के चेहरे एकदम काले पुते हुए,
बंदरों से भी अधिक काले मुँह वाले लोग! मैं एक बार
पुनः झिझकी और ठिठकी! लेकिन अनु ने धीरे से मेरा हाथ
पकड़ कर आँगन पार किया और कमरों के बाहर वाले बरामदे
में लाकर खड़ा कर दिया कि "लो, देखो होली खेलने के
नज़ारे!"
लोग उन्हीं रंग-पुते हाथों और होठों से ठंडा या गरम
पेय पी रहे थे, कुछ मीठा या नमकीन खा रहे थे और
बार-बार एक-दूसरे को रंग में सराबोर कर दे रहे थे। कोई
पिचकारी की धार से, कोई गुब्बारे की मार से, तो कोई
एकदम पक्के वाले रंगों से एक-दूसरे को रँगे चला जा रहा
था। सिर से पाँव तक काले भूत बन चुके लोगों पर बार-बार
गुलाल लगाया जा रहा था! मैं तो देख कर ही सिहर गई कि
अब इससे कैसे बचूँगी! वह जो 'एक तरफ खड़े होकर होली की
धमाल देखने का विचार' था, वह धराशायी होता दिख रहा था।
ऐसा लग रहा था कि किसी भी पल कोई भी आकर बड़ी बुरी तरह
से मेरे गोरे मुखड़े को लाल-पीला-नीला कर देगा और मैं
कुछ कर नहीं पाऊँगी!
आँगन के दाहिनी हाथ की दीवार के पास एक बड़ा सा सीमेंट
का बना टब था, उसमें ऊपर तक रंगीन पानी भरा हुआ था। हर
आने वाले को उसमें डुबो-डुबो कर होली मनाई जा रही थी।
उस समय उस आँगन में कम से कम चालीस-पचास लोग तो अवश्य
रहे होंगे। और सबसे ज़्यादा धमाल मचाने वाली अनु की
बड़ी बहन, रश्मि थी। वह तो हर एक व्यक्ति को पकड़ कर
पानी में पटके जा रही थी। मैं डर कर कभी-कभी लोगों के
पीछे छिप जाती ताकि उसकी दृष्टि से बची रहूँ!
लेकिन जाने कैसे उसकी नज़र मुझ पर पड़ गई और उसने एक
पल भी गँवाए बिना मुझे आ घेरा और झपाक से आँगन के उस
नन्हे तरणताल में पटक दिया। मेरी तो आधी साँस ऊपर और
आधी नीचे ही रह गई! मैं कुछ कह भी न पाई! एक ही झटके
में मैं सिर से पाँव तक गीली भी हो गई और काले रंग से
रंगी हुई भी! घबराहट तो पहले ही थी, अब तो रोने वाली
हालत हो गई! बचने का तो कोई सवाल ही नहीं था, वह तो
मुझे उस रंग घुले पानी में बार-बार पटक रही थी और मैं
फिसलती ही जा रही थी! ऐसा लग रहा था जैसे कोई धोबी
कपड़े को पानी में पटक रहा हो! एक तो सिंथेटिक कपड़ा,
उस पर वैसलीन से पुता हुआ तन—दोनों ही मुझे और अधिक
फिसलने दे रहे थे। पानी में से निकलना ही मुश्किल था!
उस पर मेरी ऐसी हालत देख कर रश्मि दीदी ज़ोर-ज़ोर से
ठहाके लगाकर हँसे जा रही थीं!
इधर अनु और चाचा जी ने देख लिया कि रश्मि ने अपनी
धमाल-पटक से मेरी बड़ी बुरी हालत कर दी है, तो वे
दोनों तुरंत दौड़े आए और रश्मि से कहा, "बस, अब इसे
जाने दो!" लेकिन रश्मि तो होली के नशे में चूर थी,
उसने कहा, "ऐसे कैसे छोड़ दें? यह पहली बार हमारे यहाँ
होली खेलने आई है। अभी तो रुको, इसे उस टब में
डुबोएँगे, चेहरे पर पक्के वाले रंग लगाएँगे, फिर
छोड़ने के लिए सोचेंगे!"
यह सुनते ही चाचा जी और अनु ने उसके हाथ से छुड़ा कर
मेरे दोनों हाथ पकड़े और तुरंत उस तरणताल में से उठाया
और मुझे अपनी तरफ खींच लिया! रश्मि हँसती हुई बोली,
"आज तो बच गई बच्ची, अगली बार तुम्हें उस टब में ज़रूर
ले जाऊँगी!" मेरे साथ 'जान बची और लाखों पाए' वाली
कहावत चरितार्थ हो रही थी। मैंने चाचा जी से कहा, "अब
मुझे
और नहीं रुकना यहाँ!" चाचा जी ने हँसते हुए कहा,
"तुमने उसे क्यों नहीं खींच लिया पानी में?" मैंने
बड़ी गुस्से वाली निगाह से उन्हें घूरा! वे थोड़ा सा
और हँसे और कहा, "चलो घर!"
अनु को विदा कहा और मैं चाचा जी के साथ रंग-बिरंगी
भीगी हुई कलाकृति बनी उनके घर आ गई। तुरंत नहाया और
साफ़ सूखे कपड़े पहन लिए। लेकिन अभी तो होली चल ही रही
थी; चाचा जी के घर पर वापस सबने रंग पोत दिया!
सच कहती हूँ, वैसी भयानक होली इससे पहले और बाद में
मैंने कभी नहीं देखी। बल्कि मुझे होली खेलने से और
अधिक डर लगने लगा और मैं फिर कभी वैसी होली नहीं खेलना
चाहती!
१ मार्च २०२६ |