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 संस्मरण


अंधड़ की अमिया
शुचि अग्रवाल

 


जेठ की तपती दोपहरिया।
सूरज आग उगल रहा है। बाहर लू चल रही है, जिसका असर घर के आँगन में भी है। माँ रसोई में हैं। माथे से पसीने की बूँदें गिर रही हैं।

अभी तो गर्मी की शुरुआत ही है। अभी से शिकायत करना ठीक नहीं। गर्मी के भी तो अपने रूप-रंग हैं। मौसमी फल और सब्जियों का स्वाद भी तो सूरज की आँच के साथ ही चढ़ता है।

वैसे बड़े-बुजुर्ग कहते हैं, गर्मी जितना जलाती-झुलसाती है उतना ही खरबूजे की मिठास चढ़ती है। और सच्ची—खरबूजे आजकल खूब मीठे आ रहे हैं। खरबूजे वाले भइया ठेले पर खरबूजे सजाए गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले घूम रहे हैं। सूरज की ताप से बचने को अंगोछे से सिर को ढाँक रखा है।

दुनिया भर में वैसे चार मौसम गिने जाते हैं, लेकिन भारत में छः ऋतु होती हैं। प्रकृति का खेल भी कैसा निराला है कि फल और सब्जियाँ भी हर एक ऋतु के अनुरूप ही आते हैं। ग्रीष्म ऋतु की सब्जियाँ पानी से भरपूर—फिर चाहे वह लौकी हो या नेनुआ या फिर खीरा।

खरबूजा और तरबूजा भी तो पानी से भरपूर मौसमी फल हैं, जो लू से बचाने वाले हैं। बस महीना-दो महीना ही आते हैं दोनों। और आम—उसका तो कोई सानी ही नहीं। ग्रीष्म ही क्यों, सभी ऋतुओं के फलों का राजा है आम। उत्तर भारत की प्रचंड गर्मी में आम की मिठास ऐसी शीतलता देती है कि तन और मन दोनों में ठंडक आ जाती है।

आज हल्की-सी बदली छाई है। आसमान पर दो-चार बादलों की टुकड़ी है। आशा की किरण कि शायद कोई प्री-मानसून वाली बारिश की आस सच्ची हो जाए।

दद्दा तो पहले ही आसमान की ओर ताक रही हैं। कह रही हैं—“लगता है आज पानी गिरेगा।” उनको कैसे पता! अभी तो जेठ ही है, जेठ में पानी कहाँ गिरता है। लेकिन दद्दा को पूरा भरोसा है कि आज बारिश होगी। शायद आज दद्दा की आस में देवी मईया की कृपा रही। शाम के पहले ही आसमान में बादल घिर आए। काले-काले मेघ तेज-तेज चल रहे हैं। बचपन में कहानी सुनाई जाती थी कि जब मेघ तेज चलते हैं तो इसका अर्थ है कि वे पानी लेने जा रहे हैं। खूब पानी बरसाते हैं चलने वाले काले मेघ। किस्से-कहानियों में कुछ सच्चाई तो छुपी ही होती है।

बादल गरज रहे हैं। बिजली भी खूब कड़क रही है। शाम से ही एकदम अंधेरा घिर आया है। खूब तेज आँधी शुरू हो गई है। अम्मा गुड़िया को आवाज दे रही हैं—“बेटा, जल्दी से अरगनी से कपड़े उतार लो, नहीं तो सब गंदे हो जाएँगे।”

दद्दा तख़्त पर बैठी खुद से ही बतिया रही हैं—“खूब अमिया गिरी होंगी आँधी में। कल सबेरे मंडी जाऊँगी। अचार की अमिया आई नहीं अभी तक। बिटियों के घर भी कुछ अचार भेज देंगे। आँधी में खूब कच्चे आम गिरते हैं। सुबह ही मंडी आम से सज जाती है। कई बार आम चुटहिल भी हो जाते हैं तो दाम भी कम लग जाते हैं। दद्दा इसीलिए आस लगाए हैं आँधी की अमिया की।”

आँधी ज़ोरों पर है। बत्ती भी चली गई है। सब तरफ खटाक-खटाक की आवाजें आ रही हैं। दद्दा कह रही हैं—“बहू, दरवाज़ों की कुंडी चढ़ा दो, नहीं तो ये ऐसे ही बजते रहेंगे।”

और लो जी, झमाझम बारिश आ गई है। बारिश और आँधी का शोर है सब तरफ। घर में बत्ती गुल। बाहर बादलों का घुप्प अंधेरा, जिसे आसमान की चमकती बिजली कुछ पल को तोड़ती।

हवा में अब मिट्टी की सोंधी खुशबू है। पहली बारिश धरती को तर कर देती है। बच्चों ने होमवर्क बंद करके रख दिया। अंधेरे में अब क्या किया जाए! सब छोटे-बड़े बच्चे एकत्रित हो गए हैं। दो टीम भी बन गईं।

समय बिताने के लिए करना है कुछ काम,
शुरू करें अंताक्षरी लेकर प्रभु का नाम।

अम्मा चाची के साथ लालटेन जलाकर शाम का खाना बना रही हैं। दो घंटे हो गए, लेकिन आँधी-पानी अभी भी जारी है। बारिश से जेठ की आग कुछ पल को हार गई। हवा में हल्की ठंड-सी आ गई। रात होने को आई। बारिश का घमासान अब कुछ थम-सा चला है। बस हल्की बूँदाबाँदी हो रही है अब। बत्ती अभी नहीं आई है। सब अपना-अपना काम निपटा कर सोने की तैयारी कर रहे हैं।

सुबह का सूरज नई ऊर्जा के साथ चमक रहा है। सब अपने काम में लग गए हैं। शाम की आँधी और बारिश ने आँगन को मैला कर दिया है। गुड़िया पानी डाल रही है और अम्मा आँगन धो रही हैं।

दद्दा स्नान-ध्यान करके तैयार हैं। सफेद मांड लगी धोती, सफेद बाल, कमर झुकी हुई। चेहरे की झुर्रियों के बीच भी दद्दा का गोरा चेहरा चमक रहा है। तीस-पैंतीस की उम्र रही होगी दद्दा की, जब उन्होंने बाबा के जाने के बाद से सफेद वस्त्र को धारण कर लिया। जाने कितने दशक गुजर गए। संयुक्त परिवार के साथ दद्दा ने अपने छोटे-छोटे बच्चों को पाला-पोसा, उन्हें पढ़ाया-लिखाया, उनका ब्याह रचाया। दद्दा परिवार को समर्पित रहीं। खुद का कभी सोचा ही नहीं। हमेशा से शांत स्वभाव—न कभी ईश्वर से शिकायत की, न कभी समाज से। घर-परिवार और रसोई के साथ ईश्वर में रमी रहतीं और भजन गातीं—

सीताराम सीताराम सीताराम कहिये,
जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये।

दद्दा ने कुछ झोले लिए, अपनी छड़ी उठाई और आवाज दी—“भइया, हम मंडी जा रहे हैं। आज अमिया लेकर आएँगे।” सब्ज़ी मंडी पास ही है। दद्दा अकेले ही जाकर सौदा ले आती हैं। कभी स्कूल की छुट्टी होती है तो गुड़िया भी दद्दा के साथ चली जाती। गुड़िया के साथ दद्दा का विशेष लगाव है। अम्मा और चाची कहती हैं—गुड़िया के होने के बाद उसके प्रेम में दद्दा के दूध उतर आया था।

सब्ज़ी मंडी से लौटते समय दद्दा कोई झल्ली वाला कर लेती हैं, जो सारा बोझा अपनी टोकरी पर सिर पर रख लेता है। आगे-आगे झल्ली वाला और उसके पीछे दद्दा। अब तो आसपास के झल्ली वाले दद्दा को अच्छे से पहचानने लगे हैं और घर का रास्ता भी जान गए हैं।

दद्दा सौदा लेकर आ गई हैं। झल्ली वाले भइया ने अम्मा की मदद से झल्ली उतारकर नीचे रख दी है। अम्मा ने पानी के साथ दो टुकड़े पेठे के भी दिए हैं झल्ली वाले भइया को। दद्दा का कहना है—पानी के साथ मीठा ज़रूर देते हैं।

शाक-तरकारी के साथ दद्दा खरबूजा, तरबूज और ढेर सारी कच्ची-कच्ची अमिया भी लेकर आई हैं। दद्दा ने कुछ अमिया धोकर अचार के लिए निकाल कर रख दीं और कुछ गेहूँ की बोरी में दाब दीं।

दद्दा के साथ चाची भी अमिया छील रही हैं। दद्दा जीरे का अचार बनाएँगी। दद्दा खरबूजे का अचार भी बहुत स्वादिष्ट बनाती हैं। जब गर्मी में कोई शाक नहीं मिलता, तब अचार के साथ रोटी में बहुत स्वाद आता है। कुछ अमिया को दद्दा नमक और लाल मिर्च लगाकर धूप दिखा लेतीं। इसमें तेल नहीं होता, फिर भी यह खट्टी अचारी महीनों ताज़ा बनी रहती। जब कभी हरी चटनी पीसनी होती तो हरा धनिया या पुदीना जो भी मिल जाता, उसे अम्मा हरी मिर्च और खट्टी अचारी के साथ सिल-बट्टे पर रगड़ देतीं। ऐसी स्वादिष्ट चटनी बनती कि चटखारे लेते रह जाओ।

दद्दा गर्मी में जब तक कच्ची अमिया रहती हैं, रोज़ दाल-चावल के साथ आम का पना ज़रूर बनाती हैं। रसोई बनाते समय चार अमिया चूल्हे के गरम कोयलों पर रख दी जातीं। जब अमिया अच्छे से भुन जातीं तो भुनी अमिया का पना बनता। इस पने का स्वाद भी सबको खूब भाता। पना काफी दिनों तक बनता रहे, इसीलिए उन्होंने पहले से आगे के लिए अमिया को गेहूँ में दाबा है।

भुनी अमिया को पानी में डालकर उसे अच्छे से मसलकर फिर नमक, जीरा, गुड़ आदि डालकर दद्दा पना बनातीं। रोटी बनाने के तवे में ही थोड़ा जीरा भूनकर उसे बेलन से चकले में दरोर देतीं। पने में सफेद नमक के साथ काला नमक ज़रूर पड़ता। साथ में ज़रा-सा गुड़। लू की ताप से बचाने के लिए और पसीने में निकले हुए खनिज की कमी को पूरा करने के लिए नमक और मीठे दोनों की ज़रूरत रहती है।

दद्दा ने विज्ञान नहीं पढ़ा, लेकिन परंपराओं में छुपे ज्ञान को वे जानती हैं। यह ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह संभाला जाता है। दद्दा को भी इस आयुर्वेदिक ज्ञान का पता शायद अपने घर की माँ, दादी, नानी से चला होगा। और उनसे अम्मा, चाची, बुआ और उसकी अगली पीढ़ी को।

दद्दा अब और बूढ़ी हो गई हैं। उनका शरीर अब नहीं चलता। शिथिल दद्दा अब बस भगवत-भजन में डूबी रहती हैं। एक दिन बुलावा आ गया। दद्दा चली गईं। उनके जाने के साथ ही अब संयुक्त परिवार भी नहीं रहा।

गुड़िया का भी विवाह हो गया। गुड़िया परदेस चली गई। वह अपने परिवार में रच-बस गई। पुरानी परंपराओं और दादी-अम्मा की सीख को गुड़िया अब भी मन से निभाती है। परदेस में न भारत के जैसी गर्मी है, न ही वैसी लू चलती है, न बचपन वाला मानसून है और न मिट्टी की वह खुशबू। न शाम के अंधेरे में अंताक्षरी की सभा जमती है, न खरबूजे में मिठास है और न अमिया में खटास।

लेकिन गर्मी के मौसम में पना अब भी बनता है। गुड़िया ने विदेशियों को भी पने के स्वाद की पहचान करवा दी। जब विदेशी आम में स्वाद नहीं होता, तब गुड़िया उसमें किसी और तरह की खटास मिलाती। साथ में दद्दा के पने के जैसे काला नमक, भुना जीरा और गुड़ तो डालना ही है।

विदेशी कभी इसको रिफ्रेशिंग ड्रिंक कहते, तो कभी मैंगो स्क्वैश। कोई इसे मैंगो मोहितो कहता, तो कोई मैंगो लैमोनेड। नाम बदलते रहे, लेकिन स्वाद वही। पने को पहचान पूरी दुनिया में मिली। गुड़िया के लिए तो पना आज भी बचपन की गर्मी का वही पारंपरिक पेय है, जो घर और दद्दा की यादों से सजा है।

१ मई २०२६

 
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