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शिवानी की कहानियों में
चिकित्सकीय संवेदनाओं का संसार
डॉ. आशुतोष
सिन्हा
शिवानी एक लब्धप्रतिष्ठ, अत्यंत लोकप्रिय और
वस्तुनिष्ठ लेखिका थीं। मुख्यतः कुमाऊँ और अल्मोड़ा को
आत्मसात् करने वाली शिवानी का जन्म तो गुजरात में हुआ
था किंतु प्रवृत्ति और परिस्थितिवश वह यायावर थीं।
हिमालय के दक्षिण में स्थित शिवालिक घाटियों अर्थात्
भगवान शिव की जटाओं में विद्यमान कुमाऊँ और अल्मोड़ा
सदा पर्यटकों और भक्तों के आकर्षण का केंद्र रहे। साथ
ही, इसका रमणीक वातावरण, खूबसूरत वादियाँ और स्वर्गिक
अनुभूति—रोगियों के बीच आशा की किरण जगाते थे। रोगियों
और उनके परिवार को विश्वास था कि इस देवभूमि में उनका
रोग, जो मैदानी माहौल में पला और बढ़ा है, इस बदले
माहौल में जीवित नहीं बच पाएगा और वे रोगमुक्त हो
जाएँगे। यह वह समय था, जब तत्कालीन चिकित्सा के पास
दवाओं का आधुनिक भंडार और तकनीकी ज्ञान का अभाव था तथा
परिस्थितियाँ बिल्कुल प्रतिकूल थीं। जब गंभीर बीमार
लोगों का समूह पहाड़ों की ओर मुड़ा, तब मैदानी भाग
बीमारियों के बोझ से अवश्य थोड़ा मुक्त हुआ किंतु
पहाड़ के लिए यह अत्यंत कष्टप्रद साबित हुआ।
यह
किंवदंती कि पहाड़ की स्वच्छ वादियों में रहने वाले
लोगों को रोग नहीं हो सकता—एक मिथक साबित हुई। इन
रोगियों की सेवा का मुख्य भार स्थानीय निवासियों पर ही
था। रोगी और कुमाऊँ निवासी आपस में मिले, साथ ही
ज़िंदगी जिए और फिर रोगों का आदान-प्रदान किया।
धीरे-धीरे कुमाऊँ की बड़ी जनसंख्या रोगग्रस्त हुई और
कई बार काल-कवलित भी। रोगों का समूह किसी न किसी रूप
में पूरे कुमाऊँ में घुल-मिल गया। इससे पारिवारिक और
सामाजिक विकृतियाँ पैदा हुईं। सूक्ष्म दृष्टि की धनी
शिवानी इनकी निरपेक्ष दर्शक बनी थीं। उन्होंने उन
परिस्थितियों के अंतर्मन को समझा, उन्हें याद रखा और
खूबसूरती से अपनी लेखनी में पिरोया—यही शिवानी की
महानता है।
चिकित्सा के संसार से शिवानी की निकटता अपार थी। उनकी
सामान्य कहानियों में भी व्याधियों की
यत्र-तत्र-सर्वत्र परिचर्चा है। यदा-कदा यह वर्णन
अत्यंत रोचक एवं समसामयिक है:— "सहसा उनका स्वर चुप्पी में डूब गया—जैसे कठिन मधुमेह
का रोगी पुनः कोमा में चला गया हो।" शिवानी को उस समय
भी कुमाऊँ में व्याप्त मधुमेह की दुर्दशा का भान था।
उन्हें अनुभूति थी कि मधुमेह में कोमा में चला जाना
संभव है, यदि रक्त में शर्करा (चीनी) की मात्रा
अनियंत्रित हो।
शिवानी का सर्जरी-ज्ञान भी कम रोचक नहीं था। "सधे
हाथों से वह गठरी की गाँठ खोल दाना ऐसे निकालते जैसे
कोई ख्यातिप्राप्त सर्जन अपेंडिक्स निकाल रहा हो।" उस
समय अपेंडिसाइटिस एक गंभीर बीमारी थी, जिसका उपचार था
सर्जरी—अपेंडिक्स निकालना एक सर्जिकल खूबसूरती थी—ऐसी
समझ थी उनकी। अनुपम प्लास्टिक सर्जरी और गज़ब स्वास्थ्य लाभ—"रात के
ढाई बजे माघी विभावरी में कुशल सर्जन ने बिना किसी
सहायक के—मोमबत्ती के उजाले और ढेर सारी शिकारी टॉर्च
के प्रकाश में २–३ घंटों में शल्य-क्रिया संपन्न की।
किसी घसियारे की नाक भालू ने चबा ली थी, जिसे उसकी
पत्नी ने तिपली के पत्ते में खून से सनी नाक सर्जन को
दी थी। मरीज ठीक हो गया।"
आधुनिक सुविधाओं और मृत्युंजय औषधियों से विहीन सर्जरी
सफल होती भी क्यों नहीं? प्रकृति ने बर्फ़ की चादर
बिछाकर पूरा परिवेश इम्यून कर दिया था—ज़हर फैलता तो
फैलता कैसे? सर्जिकल ज्ञान की नूतन दृष्टि—एक-एक शब्द
स्वावलंबित— शिवानी-वर्णिता टिटनेस—"छोटा घाव है, ठीक हो जाएगा;
यही लापरवाही उसकी रीढ़ की हड्डी को धनुष की भाँति
निर्ममता से तोड़ने लगी। इसीलिए इसे धनुषाकार कहते हैं।
उसकी भयंकर यंत्रणा वह संपूर्ण चेतनावस्था में ही
भोगती रही। प्रकाश की किरण भी उसकी असह्य वेदना को
प्राणांतक बना देती—सिसकियों से काँपता उसका शरीर
बाज़ीगरी का तमाशा दिखा रहे किसी जमूरे की कटी रहस्यमय
देह की भाँति तड़पने लगा। तीव्र ज्वर की तपन से तड़पती
लड़की उस असहाय और भयंकर अवस्था से छुटकारा पाने की
प्राणपण चेष्टा कर रही थी—नायिका डॉक्टर थी, इसलिए
आसन्न मौत को समझने लगी थी।" चिकित्सा की दृष्टि से यह
वर्णन आदर्श है। अस्पताल में लंबे अंतराल के बाद
नायिका स्वस्थ हो पाई थी; तत्कालीन परिस्थितियों में
यह लगभग असंभव था किंतु शायद सत्य!
चिकित्सकों पर भी टिप्पणी करने में शिवानी नहीं चूकती
थीं— सर्जन ऐसा दिखता था मानों कोई अंग्रेज़ चला आ रहा
हो। हाथ में ऐसा यश कि मुरझाया मरीज भी चंगा हो जाए।
फ़ीस भी उनके व्यक्तित्व जैसी रोबीली थी—थोड़ी कम तभी
होती, जब रोगी की बीमारी मौलिक हो या मरीज़ा सुंदरी
हो—दुर्भाग्यवश, असंख्य रोगियों को जीवनदान देने वाला
यह अनोखा मसीहा अपनी पत्नी का ही इलाज नहीं कर सका था। "कौन चिकित्सक अपनी संतान पर सर्जन की छुरी चलाने का
दुःसाहस कर पाता है।"
कुमाऊँ निम्नलिखित तीन महान
रोगों के लिए परिचर्चा में रहा और अपनी ओर रोगियों को
आकृष्ट किया— (क) यक्ष्मा / क्षय / तपेदिक / सूखा
/ सफेद प्लेग) — अर्थात् टी.बी. जब
हरमन ब्रेमर (१८५४) ने अपने पीएच.डी.
थीसिस में बताया कि उनका यक्ष्मा रोग हिमालय की
वादियों में रहने के कारण ठीक हो पाया है, सारी दुनिया
में सैनेटोरियम की बाढ़ आ गई। भारतवर्ष में सर्वाधिक
सैनेटोरियम कुमाऊँ और आसपास बने।
ये सैनेटोरियम भारत के समृद्ध लोगों को
ही नसीब हुए—अपेक्षा थी कि हिमालय की वादियों में रोग
अपनी तीव्रता खो देगा—उन्हें गहन और विशेष चिकित्सा
मिलेगी—परिवार और समाज के कोलाहल से दूर रोगी शांति
में रहेगा—परिवार और समाज रोगी से होने वाले संक्रमण
से बच जाएगा—कई बार इस परिवेश ने रोगी को अध्यात्म,
कला और साहित्य की ओर प्रेरित किया— क्षय-वर्णन में शिवानी ने इसके विशेष रूपों का भी
वर्णन किया, जैसे गैलोपिंग टी.बी. —यक्ष्मा का
सर्वनाशी रूप था यह—गैलोपिंग टी.बी. अर्थात् निश्चित
और तत्काल मृत्यु— शिवानी ने तपेदिक की भयावहता, उसकी
व्यापकता और सामाजिक विश्वास की निष्फलता पर चर्चा की
है— विलक्षण किशोरी की प्रेम-समाधि व्याधि के संग—दरिद्र
पिता की पुत्री का विवाह जान-बूझकर क्षय रोगी से कर
दिया। यह वह समय था, जब रानीधारा क्षय रोगियों का
प्राकृतिक सैनेटोरियम था—टी.बी. सैनेटोरियम से लाइलाज
वापस किए गए गंभीरतम मरीज रानीधारा में बंगला लेकर
मृत्यु का इंतज़ार करते थे।
क्षय रोगी की ख्याति तब कैंसर से भी ज़्यादा कुख्यात थी—जिसे हुआ, वह गया। इन
परिस्थितियों में किशोरी का समय—"दिन में ख़ून उगलते
पति के साथ और रात में कठोर सास के संग बीतता। जब पति
की मृत्यु आसन्न दिखी, किशोरी ने श्रृंगार कर स्वयं आग
लगा ली और सती हो गई। कुमाऊँ की प्रथम और अंतिम
सती—पति-पत्नी की चिता एक साथ सजी और उठी—लेकिन न कोई
चौराह, न सिंदूरी हाथों की छाप"—शिवानी कहती हैं—"सतीत्व
और सती-प्रथा के पाखंडी विलास में अंतर होता है। वह रोगिणियों की पसलियाँ ठोक-पीटकर दवाएँ लिखती थीं। माँ की ख़ाँसी उन्हें व्यग्र कर देती
थी। उस ख़ाँसी को कुमाऊँ की कौन सी लड़की नहीं पहचानती
थी! क्षयरोग उनके मातृकुल का अभिशाप था। कई पूर्वज
भवाली सैनेटोरियम गए तो सही, लेकिन वापस नहीं लौटे।
कहीं उन्हें राजरोग (क्षय) तो नहीं पकड़ लिया? माँ को
सांत्वना देती हुई कहती—ब्रोंकाइटिस नहीं है, एक्स-रे
करा लेते हैं। एक्स-रे में दोनों फेफड़ों में पैच—फिर,
भवाली सैनेटोरियम की तैयारी—"
"कुलगोत्र एवं संबंध देखकर पिता ने अपनी सुंदरी कन्या
का ब्याह दरिद्र परिवार में कर दिया। सींक से दुबले,
खाँसते-खाँसते दोहरे हो रहे जामाता के पैर पूजते
श्वसुर गश खाकर गिर पड़े, क्योंकि दामाद सैनेटोरियम से
तीन दिनों की छुट्टी लेकर सेहरा बाँधने आया था। फिर भी
कन्यादान किया—दामाद तो हनीमून अधूरा ही छोड़ चल बसा
(घातक यक्ष्मा में हनीमून!) किंतु दुल्हन को भी घातक
रोग का उपहार दे गया। उसके यक्ष्मा की अस्वाभाविक
लालिमा के रंग में रँगे कपोलों की स्मृति स्पष्ट एवं
दुखद थी।"
उपर्युक्त लालिमा क्षय रोगियों में सामान्य थी।
पाश्चात्य संप्रदाय ने क्षय रोग को 'रुमानिक रोग' की
संज्ञा दी थी। इसके रोगियों में कला और साहित्य के
प्रति एक विशेष अभिरुचि पैदा हो जाती थी—क्षय रोग से
प्रभावित होने वालों में जॉन कीट्स, शेली, स्टीवेन्सन,
दोस्तोवस्की आदि शामिल हैं। अनेक चिकित्सकों को भी
आहुति देनी पड़ी—टी.बी. की समझ में महती योगदान देने
वाले लेनेक (१७८१–१८२६) - स्टेथोस्कोप और
ऑस्कल्टेशन के जनक इसी रोग से अल्पायु में स्वर्ग
सिधार गए। यक्ष्मा-जनित हल्का बुख़ार और विषाणु से
दिमाग़ ज़्यादा तेज़ चलता था और विचार ज़्यादा शुद्ध
दिखते थे। अनेक रुमानी कलाकृतियाँ भी बनाई गईं। शिवानी
के यक्ष्मा-जनित कथा-संसार में भी प्रेम-रोग की कमी न
थी। दो कहानियाँ विशेष उल्लेखनीय हैं:—
प्रथम में, क्षयग्रस्त पत्नी अपनी दुरावस्था, पति की
परेशानियों और उसके प्यार से व्यथित होकर नदी में कूद
जाती है। किस्मत उसे मरने नहीं देती—साधुओं का समूह
उसे आत्मसात कर लेता है। ख़ून उगलती लड़की ठीक तो हो
जाती है, लेकिन दिमाग़ और जिह्वा-विहीन। उसी जगह पर अब
साध्वी बैठी है और बस में उसका पति—प्रौढ़ पत्नी और
नवयुवक बच्चों के साथ। पति पहचान तो लेता है, लेकिन
परिस्थिति की विवशता—समय आगे बढ़ जाता है।
द्वितीय, नवयौवना अपने यक्ष्मा-पीड़ित प्रेमी से रात
के अँधेरे में मिलती और लिपट जाती है। शादी नहीं
होती—कौन यक्ष्मा-पीड़ित से शादी करे! लेकिन फिर
किस्मत—नायक लाहौर के मज़ार पर जाकर ठीक हो जाता है।
नायिका स्वस्थ हड्डे-कट्टे से ब्याही गई—उसे यक्ष्मा
ने स्वर्ग भेज दिया। सालों बाद विधवा नायिका मिली नायक
से—नायक ने पहचान लिया—कोई वार्तालाप नहीं—पीछे लौटना
नामुमकिन—समय फिर आगे बढ़ गया। इतिहास में सर्वाधिक काल-कवलित करने वाली यह व्याधि
अपने अंदर अनंत कहानियाँ समेटे है—हमारे यहाँ
कथावाचकों की ही कमी रह गई।
(ख) कुष्ठ रोग— यह भी यक्ष्मा की तरह
पुराना रोग है। भगवान कृष्ण के पुत्र सांब को भी यह
रोग हो गया था। यह रोग व्यक्ति को मृत्यु (Rare) भले न
दे, लेकिन अपंग बना देता है। कुमाऊँ इसका भी आश्रयदाता
बना। यह रोग शरीर को कुत्सित बना देता है, इसीलिए इसे
कुष्ठ रोग कहा गया; किंतु शरीर से अधिक यह मन को
कुत्सित बना देता है।-
"कुष्ठाश्रम के नए महिला वार्ड में उसके निवासियों ने
अपने विकृत हाथों से ताली बजाकर उनका स्वागत किया।
उन्होंने उसे पहचान लिया—उसका चेहरा बिल्कुल बदल गया
था। चमड़ी मोटी होकर कटहल के छिलके-सी खुरदरी हो गई
थी—रेशमी पलकें झड़ने से आँखें फटी लग रही थीं।" "उसको गलित कुष्ठ रोग था—भयावह छूती (पॉज़िटिव)
लेप्रोसी। अंग-अंग से कोढ़ फूटने लगा था—नोड्यूल वाला
होता, तब भी चिंता की कोई बात नहीं थी।" "चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से घिरी नीची घाटी में
टिन के कई बैरक हैं—सामने है एक गिरिजाघर—ऊँचे-ऊँचे
देवदार के पेड़ों से साँय-साँय करती हवा चल रही है"—यह
तो अल्मोड़ा का कुष्ठाश्रम है—मैंने कहा। "एक अँधेरी बैरक में वह बैठा है—पास ही उसकी बंशी पड़ी
है—पर वह न उसे उठा सकता है, न बजा सकता है; क्योंकि
उसके दोनों हाथों की उंगलियाँ झड़कर दो अधूरी
मुट्ठियाँ मात्र रह गई हैं। होंठ-विहीन चेहरा बीभत्स
बन गया है। नाक नहीं है—पलकहीन अँगार-सी दो आँखें ही
दप-दप कर जल रही हैं।"
व्याधि के असीम संसार में लेप्रोसी एक अलग विधा है।
रोगी रोग से ही नहीं, सामाजिक तिरस्कार से भी ग्रस्त
है। चिकित्सा में देर हो जाने की इतनी बड़ी सज़ा!
लेकिन शिवानी ने उन्हें भी अपने कथा-संसार में स्थान
दिया, इस दरियादिली के लिए शिवानी को साधुवाद।
(ग) मानसिक उन्माद — उस समय अल्मोड़ा में
पागल और भिक्षुक हर गली, हर मोड़ पर दिख जाते थे।
कुमाऊँ-अल्मोड़ा असाध्य मानसिक उन्माद के रोगियों का
अंतिम पड़ाव था। बीमारियों से कोई भाग नहीं सका; वे सामाजिक अवस्थाओं
का ध्यान नहीं करतीं। साक्षात् अप्सरा दिखने वाली
युवराज्ञी ब्याही गई—गर्भवती हुई, पुत्र-सुख की
प्राप्ति हुई; लेकिन दुर्भाग्य, गर्भावस्था के दौरान
हुए ख़सरे ने मानसिक रूप से विक्षिप्त कर दिया।
भावनाएँ मृत हो गईं—वात्सल्य भी। असीम सुंदरी
नारी—नितांत अस्वस्थ होकर अकेली विकारग्रस्त, किसी
प्रेतात्मा-सी, किले के बंद कपाटों के पीछे भटक रही
थी। अंततः एक उन्माद के दौरे में मृत्यु का वरण कर
बैठी।
"बड़े-बड़े लोहे के सींकचे पकड़े वह खड़े हैं। उनका
निचला बदन एकदम नंगा है, लुंगी को सिर पर लपेटे हैं,
दाढ़ी बढ़ी है, ख़ी-ख़ी कर हँस रहे हैं।" उनकी ही तरह
वहाँ पर और लोग भी हैं—कोई हँस रहा है, कोई गा रहा है,
कोई नंगा घूम रहा है। इस अवस्था से पूर्व ही गंभीर
दार्शनिक-सी आँखों में भावीबद्ध उन्माद की स्पष्ट
रेखाएँ वह कई बार उनमें देख चुकी थीं।
मनोरोगियों की पूरी कहानी अत्यंत मार्मिक और भयावह थी।
कुमाऊँ समाज में भी उनके प्रति दया की कमी थी। महिलाएँ
कहतीं—"अरी ओ बोडम, घड़ा मत छू लेना!" वह खिलखिलाकर
भरे घड़े को पैर की ठोकर से उलट देती—फिर ऐसे भागती
जैसे मैराथन रेस की धाविका—मजाल कि कोई पकड़ ले! उसका
उन्माद अद्भुत था—कृष्ण पक्ष में वह बिल्कुल शांत हो
जाती थी। अपने पालक के साथ वह छाया की तरह घूमती, उसके
सांन्निध्य का मोह नहीं छोड़ती थी। शुक्ल पक्ष की
पंचमी और चतुर्दशी को बिल्कुल बौरा जाती। जहाँ कहीं भी
बैठती—न शरीर की फ़िक्र और न कपड़ों का ध्यान—सबसे
अनभिज्ञ। किंतु समाज के लिए वह कौतूहल का नहीं,
मनोरंजन का साधन थी। जब युवकों ने उस पर अश्लील सीटी
और कुत्सित वाणी की बौछार कर दी, तब शांत संभ्रांत
महिला का बाँध टूट गया। वह तब चिल्लाई—"अरे ह……
के
जनों! क्या तुम्हारे घर में माँ-बहनें नहीं हैं? अगर
कल तुम्हारी जवान बहनें ऐसे पगलाकर नंगी-उधड़ी सड़कों
पर भागने लगें, तो ना………………, क्या तुम ऐसे ही सीटी
बजाओगे? अरे! कुछ तो शर्म करो!" सचमुच! है न कुत्सित
विचार और शर्मसार होने वाली बात!
शिवानी का कथा-संसार बहुत विशाल था। उसमें सिर्फ़
व्याधियाँ ही नहीं, संपूर्ण समाज था। नारियों के प्रति
वह विशेष प्रतिबद्ध और आसक्त थीं। नारी की समस्याओं के
प्रति उनका विशेष झुकाव था—चाहे वह किसी भी वर्ग या
वर्ण की हो। विशुद्ध नारीवादी लेखिका थीं शिवानी।
"अल्मोड़ा का संकीर्ण समाज असमय ही उसे वैरागिन बना
देगा—एक वक्त का खाना, मंदिरों की असंख्य परिक्रमाएँ
और पहाड़ आए संत महाराज का प्रवचन या फिर भागवत-सप्ताह
की नीरस दिनचर्या।"
"नायिका की रासलीला पूरे रंग में थी। लेकिन फिर डेविड
को यक्ष्मा हो गया—वह भवाली सैनेटोरियम में घूम रहा
था। इधर हेनरी ख़ाँसने लगा था। उसके प्रेमियों की पूरी
कतार का जनाज़ा निकल चुका था; कारण? व्याधियाँ!! फिर
भी वह व्यक्ति-विशेष पर दिल से आसक्त थी। लेकिन भोली
किशोरी यह नहीं जानती थी कि उसके पेशे में वह पुरुष को
नहीं ख़रीद सकती, उसे ही बिकना होता है।"
कुमाऊँ भी सर्वगुण संपन्न था—अच्छाइयाँ-बुराइयाँ सभी
विद्यमान थीं। वहाँ जुआ खेला जा रहा था। पति ने पत्नी
को ₹२,००० में दाँव पर लगा दिया और हार गया। युधिष्ठिर
और द्रौपदी सिर्फ़ महाभारत में ही नहीं मिलते। दयालु
महिला ने रुपये देकर महिला को मुक्त कराया। पत्नी
पतित्यक्ता हुई; आश्रयदायिनी अस्पताल में शरण ली, नर्स
बनी और फिर मानवता की सेवा।
शिवानी के कथा-संसार में सिर्फ़ दुःख और व्याधि नहीं
हैं, उसमें चटकीले प्रकरण भी हैं। शिवानी नारी-सौंदर्य
का विस्तृत वर्णन करती दिखती हैं; वह तुलसीदास के "मोह
न नारी नारी के रूप" को नाकाम कर देती हैं। मानव
अंतर्मन उभयलिंगी है—नारी में थोड़ा नर और नर में
थोड़ी नारी। जब भी शिवानी ने नारी-सौंदर्य का वर्णन
किया, वह ज़्यादा पौरुषेय हो गया है। यदा-कदा वर्णन
अत्यंत अंतरंग और सांगोपांग हो गया है... अतिरेक भी!
"इलाहाबाद में कुंभ के माघ स्नान हेतु संगम के नीलाभ
जल में अधडूबी उस जलपरी की अनुपम रूप-छटा को मैं
स्त्री होकर भी आज तक नहीं भुला पाई हूँ। भागलपुरी
इलायची रंग की साड़ी उसके सुडौल वक्षस्थल की एक-एक
रेखा उभार गई थी। भीगे काले बालों की बिखरी लटों के
कुंडल-किरीट इधर-उधर लटक आए थे। दोनों हाथों की लंबी
उंगलियों का अर्घ्य संजोए वह सूर्य को संगम-जल की
अंजलि दे रही थी—देवदुर्लभ सौंदर्य!"
"उनका चेहरा विधाता ने अवकाश में ही गढ़ा होगा। खड्ग
की धार-सी नाक, छोटे रसीले अधर और मदभरी आँखें। न
मेकअप, न सज्जा—फिर भी अष्टभुजा-सा दिव्य रूप।"
अब जब देखा, धक्का लगा—न वह रंग, न रूप! जब वह
असंख्य छात्रों के हृदय अपनी फ़िरोज़ी आँखों की चिलमन
में दावे, ग्रीवा उठाए, राजमहिषी की चाल में घूमती
थी—मगन दंत-पंक्ति, काल-धूसर गौर वर्ण, जिसकी पीताभ
आभा पर सुदीर्घ व्याधि ने स्याही फेर दी थी। कभी आश्रम
की सर्वश्रेष्ठ सुर-सुंदरी थी, पर आँखें अब भी रसीली
थीं; जैसे किसी ऐतिहासिक खंडहर में अनूठे कंगूरों से
विभूषित झरोखे ज्यों के त्यों हों। आँखें याद दिलाएँ
रीतिकालीन कवि रसलीन की— "अमिय हलाहल मद भरे, सेत स्याम रतनार। जियत मरत झुकि
झुकि परत, जेहि चितवत एक बार॥"
कहानियाँ अनेकानेक हैं, मेरी लेखनी ही थक गई है। हमारे
मधुरतम गीत वे हैं, जो हमारे अंतर्मन के गहरे अवसाद को
व्यक्त करते हैं। समकालीन चिकित्सालय और उसका विशाल
वातावरण अपने अंदर दुःख के अबाध संसार को समेटे रहता
है। वहाँ दुःख ही दुःख है और हैं दुःख से जुड़ी अनंत
मार्मिक कथाएँ। चिकित्सक, चिकित्सा-शास्त्र और उसका
समग्र परिवार इस असह्य दुःख को खुशी में परिवर्तित
करने की प्रक्रिया का दूसरा नाम है। यह दुखद है कि
भारतीय लेखक इस कथा-संसार को इस लायक नहीं समझते कि
इसे लिपिबद्ध किया जाए।
पाश्चात्य सभ्यता बिल्कुल विपरीत है—वहाँ इसका विस्तृत
संसार है—कथा, उपन्यास, डॉक्यूमेंट्री, सिनेमा,
चित्रकला आदि सभी संचार माध्यम शामिल हैं। चिकित्सीय
रोमांच (मेडिकल थ्रिलर) की एक अलग साहित्यिक दुनिया
है। भारतीय वाङ्मय में ऐसा साहित्यकार जिसने चिकित्सा
की दुनिया और उसके पात्रों का आद्यंत वर्णन किया है,
तो संभवतः एक और एकमात्र शिवानी हैं। उनकी बहुत कम
कहानियाँ और उपन्यास ऐसे हैं, जहाँ रोग और उससे
उत्पन्न विवशता का वर्णन न हो। इस दुनिया से न केवल
आत्मीय निकटता थी शिवानी की, अपितु इन संवेदनाओं के
प्रति वह आसक्त भी थीं। चिकित्सीय संसार, कुमाऊँनी
समाज और शिवालिक की वादियाँ—शिवानी, आपकी ऋणी हैं,
आभारी हैं और शुक्रगुज़ार हैं।
१ सितंबर २०२६ |