|

बौद्ध काल में गणतंत्र
ओम कश्यप
बौद्ध एवं जैनधर्म चूँकि समाज के जाति आधारित विभाजन
का निषेध करते थे, अतएव उनके प्रभाव के चलते समाज में
समानता आधारित तंत्र की स्थापना का काम सरल एवं
व्यावहारिक था। बौद्ध धर्म की सफलता का एक कारण यह भी
था कि उसने राजसत्ता के सहारे धार्मिक विजय का सपना
देखा था। मौर्य कालीन चंद्रगुप्त से लेकर सम्राट अशोक
आदि अनेक भारतीयता के प्रतीक हिंदु सम्राट बौद्धधर्म
को मानने वाले थे। बल्कि अशोक ने तो बौद्धधर्म को
राजधर्म घोषित करते हुए उसके प्रचार-प्रसार में अपने
पुत्र एवं पुत्री को भी लगा दिया था।
भारतीय दर्शन परंपरा की दृष्टि से वह युग कई मायने में
अविस्मरणीय है। इस युग को भारतीय चेतना के नवोन्मेष का
स्वर्णकाल भी कहा जाता रहा है। क्योंकि इस युग में
तर्क एवं विज्ञानाधारित दर्शन को स्वीकार्यता मिलने
लगी थी। बौद्धिक आंदोलनों का प्रभाव तत्कालीन राजनीति
पर पड़ना स्वाभाविक ही था। परिणामस्वरूप राजनीति को और
अधिक लौकिक तथा मानवीय बनाने के प्रयास किए जाने लगे
थे। परंतु इस कार्य में सफलता तभी संभव थी, जब निर्णय
के स्तर पर ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहभागिता हो।
इसलिए शासन-प्रशासन के स्तर पर अधिकतम लोगों की
हिस्सेदारी की जरूरत महसूस की जाने लगी।
लिच्छवी और वैशाली जैसे गणतांत्रिक राज्यों का उदय इसी
समय में हुआ। पालि, संस्कृत, ब्राह्मी लिपि में उपलब्ध
साहित्य में ऐसे बहुसमर्थित राज्य के बारे अनेक संदर्भ
मौजूद हैं। जनतांत्रिक पहचान वाले गण तथा संघ जैसे
स्वतंत्र शब्द भारत में आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले
ही प्रयोग होने लगे थे। प्राचीन ग्रंथों से ज्ञात होता
है कि भगवान महावीर और बुद्ध के काल में उत्तर पूर्वी
भारत में अनेक गणराज्य भी विद्यमान थे। इस समय
लिच्छवि, विदेह, शाक्य, मल्ल, कोलिय, मोरिय, बुलि और
भग्ग जैसे दस गणराज्य तिरहुत से लेकर कपिलवस्तु तक
फैले हुए थे। बुद्धकालीन प्रमुख गणराज्यों में
कपिलवस्तु के शाक्यों एवं वैशाली के लिच्छवियों के
अलावा सुमसुमार पर्वत के भग, केसपुत्र के कालाम,
रामग्राम के कोलिय, कुशीनारा के मल्ल, पावा के मल्ल,
पिप्पलिवन के मोरिय और अलकल्प के बुलि महत्त्वपूर्ण
थे।
सिकंदर के भारत अभियान को इतिहास में रूप में प्रस्तुत
करने वाले डायडोरस सिक्युलस तथा कारसीयस रुफस ने भारत
के सोमबस्ती नामक स्थान का उल्लेख करते हुए लिखा है कि
वहाँ पर शासन की ‘गणतांत्रिक प्रणाली थी, न कि
राजशाही।’ ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के दौरान गणतंत्र
भारत में लोक प्रचलित शासन प्रणाली थी। डायडोरस
सिक्युलस ने अपने ग्रंथ में भारत के उत्तर-पश्चिमी
प्रांतों में अनेक गणतंत्रों की मौजूदगी का उल्लेख
किया है। एक अन्य स्थान पर वह लिखता है कि—
‘अधिकांश नगरों (राज्यों) ने गणतांत्रिक
शासन-व्यवस्था को अपना लिया था और उसको बहुत वर्ष बीच
चुके थे, यद्यपि कुछ राज्यों में भारत पर सिकंदर के
आक्रमण के समय भी राजशाही कायम थी।
ईसा
पूर्व छठी शताब्दी तक भारत में गणतांत्रिक राज्यों का
चलन आम हो चुका था। हालाँकि ये राज्य राजशाही द्वारा
नियंत्रित राज्यों की अपेक्षा आकार में छोटे थे। किंतु
उनके वैभव एवं समृद्धि के कारण बड़े राज्य भी उनकी ओर
सम्मान की दृष्टि से देखते थे। उन राज्यों में कृषि
व्यवस्था उन्नत थी। प्रायः सभी राज्य उपजाऊ,
शस्यश्यामला भूमि पर विकसित हुए थे। व्यापार एवं
उद्योग-धंधों के मामले में वे आत्मनिर्भर थे।
बौद्धधर्म ने समाज को उन बंधनों से मुक्त करने का काम
किया था, जो वर्णव्यवस्था के कारण सामाजिक ऊंच-नीच का
पर्याय बने हुए थे। प्रश्न किया जा सकता है
साम्राज्यवादी व्यवस्था के दौर में जब बड़े राज्य छोटे
राज्यों पर अपनी गिद्धदृष्टि जमाए रखते थे, अपेक्षाकृत
छोटे गणतांत्रिक राज्य अपनी स्वतंत्रता एवं समृद्धि को
कैसे सुरक्षित रख पाते थे?
उल्लेखनीय है कि कथित छोटे गणतांत्रिक राज्य
सुख-समृद्धि के मामले में देश के बाकी राज्यों से कहीं
आगे थे। वहाँ के नागरिकों को अपनी रुचि एवं
कार्यक्षमता के अनुसार अपना व्यवसाय चुनने की आजादी
थी। जिससे वहाँ का समाज अपेक्षाकृत अधिक खुला था।
उसमें तनाव भी न्यूनतम थे। परिणामतः समाज की ऊर्जा का
सकारात्मक उपयोग संभव था। वी. एस. अग्रवाल और ए. के.
मजुमदार के हवाले से डॉ. स्टीव मुलबर्गर लिखते हैं कि—
‘प्राचीन भारत में जनतांत्रिक ‘कार्यकलापों का
स्वतंत्र रूप से संचालन करने वाले समूहों और उनकी
विशेषताओं को अभिव्यक्त करने के लिए एक सुदीर्घ
शब्दावली थी। निश्चित रूप से उसमें बहुत से शब्द ऐसे
थे जो वीरता का गुणगान करते समय प्रयुक्त किए जाते थे,
किंतु उनमें से अधिकांश का प्रयोग शांतिकाल में तथा
आर्थिक समूहों और उनकी गतिविधियों की व्याख्या के लिए
प्रयुक्त किया जाता था। जैसे कि किसी संगठन को उसके
कार्य के आधर पर गण अथवा संघ का नाम दिया जा सकता था।
उससे कम महत्त्वपूर्ण, केवल आर्थिक मामलों से जुड़े
संगठनों को श्रेणि, पूग, व्रात, गण आदि नामों से
पुकारा जाता था। इन संगठनों की प्रमुख विशेषता थी,
इनके लक्ष्यों की एकता। छठी शताब्दी तक इन स्वशासित
संगठनों-समितियों का चलन आम हो चला था। इनके सभी
निर्णय आमसहमति के आधर पर लिए जाते थे। दूसरा वर्ग
सर्वसम्मति अथवा आमसहमति के आधर पर शासन की जिम्मेदारी
संभालता था। आधुनिक शब्दावली में इन संगठनों के लिए
सर्वाधिक उपयुक्त शब्द ‘गणतंत्र’ ही हो सकता है।’
गणतांत्रिक भारत में संपन्नता और समृद्धि समाज के
बहुसंख्यक वर्ग तक फैली हुई थी। हालाँकि आर्थिक स्तर
में विभिन्न समुदायों, व्यवसायकर्मियों के बीच भारी
अंतर तब भी था। बावजूद इसके समाज में जागरूकता एवं
अवसरों की समानता अधिक थी। इसी कारण छोटे-छोटे
उद्यमियों/व्यापारियों ने अपने संगठन खडे़ कर लिए थे,
जिनके माध्यम से वे संगठित व्यापार के लाभों में
हिस्सेदारी की संभावना बढ़ाते थे। इस बात का प्रमाण उस
समय के साहित्य तथा अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों में
उपलब्ध है। वैशाली और कौशांबी जैसे संपन्न राज्य और
कुशावती जैसी संपन्न नगरी का वर्णन जातक कथाओं तथा
पालि साहित्य में अनेक स्थान पर हुआ है।
ये
सभी राज्य गणतांत्रिक प्रणाली द्वारा शासित थे। जे।
पी। शर्मा की पुस्तक ‘प्राचीन भारत में गणतंत्र’ के
माध्यम से मुलबर्गर महोदय लिखते हैं कि—
‘छह सौ ईस्वी पूर्व से दो सौ ईस्वी बाद तक,
भारत पर जिन दिनों बौद्ध धर्म की पकड़ थी, जनतंत्र
आधारित राजनीति यहाँ बहुत लोकप्रचलित एवं बलवती थी। उस
समय भारत में नागरीकरण की प्रक्रिया बहुत तीव्रता से
चल रही थी। पालि साहित्य में उस समय की समृद्ध नगरी
वैशाली का विवरण मिलता है। उसमें उपलब्ध विवरण के
अनुसार वहाँ ७७०७ बहुमंजिला इमारतें, ७७०७
अट्टालिकाएँ, ७७०७ ही उपवन तथा कमलसरोवर शोभायमान थे।
इनके अतिरिक्त वहाँ पर लोगों का एक कार्यकारी संघ भी
था, जिसपर वहाँ की शासन-व्यवस्था का अनुशासन चलता था।
आम्रपाली जैसी अनिंद्ध सुंदरी, अद्वितीय नर्तकी थी,
जिसकी सुंदरता और कला के चर्चे दूर-दूर तक फैले हुए
थे। आम्रपाली न केवल वैशाली की समृद्धि का प्रतीक थी,
बल्कि वहाँ का गौरव भी थी।
वैशाली के अतिरिक्त कपिलवस्तु तथा कुशावती जैसे नगरों
का विवरण भी बौद्ध साहित्य में ससम्मान उपलब्ध है, जो
व्यापार, कला एवं संस्कृति के महान केंद्र थे। पाँच सौ
से हजार गाड़ियों तक के काफिले उन नगरों से व्यापार के
सिलसिले में गुजरते रहते थे, जिसके कारण वहाँ पर किसी
आधुनिक शहर जैसी भीड़-भाड़ तथा शोरगुल मचा रहता था।
आवश्यकता पड़ने पर ये काफिले जहाँ भी पड़ाव डालते तो
महीनों तक एक ही स्थान पर जमे रहते। चैमासे में तो यह
अक्सर होता था। इन काफिलों के साथ-साथ धार्मिक संवाद,
सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रचार-प्रसार का काम भी चलता
रहता था।’
वस्तुतः उस समय भारत में छोटे-छोटे गणतंत्रों के रूप
में स्वतंत्र आर्थिक समूहों के उदय हो रहा था। वे
आर्थिक समूह इतने शक्तिशाली थे कि जिस क्षेत्र में
होते, वहाँ कि राजनीतिक सत्ता पर अपना अधिकार स्थापित
कर लेते थे। हालाँकि राजशाही की अपेक्षा वह एक मुक्त
समाज था, जहाँ राजनीतिक निर्णय परस्पर सहमति और सम्मान
के आधार पर लिए जाते थे। एक श्रेष्ठी वर्ग उस समाज में
पनप रहा था, जिसके आर्थिक संबंध दूर-दराज के क्षेत्रों
से बने थे। उन राज्यों के पास अपनी सेना थी और संकट का
सामना वे सभी मिलकर पूरी ताकत और एकजुटता के साथ करते
थे। वहाँ के श्रेष्ठीगण आवश्यकता के समय बड़े सम्राटों
को ऋण देकर, समाजकल्याण के कार्यों के लिए मुक्त हस्त
से दान लुटाकर समाज पर अपना प्रभुत्व जमाए रखते थे।
उनकी एकता और समाज पर उनके प्रभाव के कारण बड़े-बड़े
सम्राट उनपर हमला करने से बचते थे।
धन-संपत्ति का बाहुल्य कई बार सामाजिक बुराइयों का
कारण भी बन जाता है, इस दोष से वे भी अछूते नहीं थे।
उन्हें न केवल अपनी आर्थिक समृद्धि का गुमान था, बल्कि
उनमें दिखावे की प्रवृत्ति भी जोर पकड़ती जा रही थी।
अपनी अकूत धन-संपदा को खर्च करने के लिए वहाँ के
नवधनाढ्य वर्ग के बीच निरर्थक स्पर्धाएँ अक्सर चलती
रहती थीं। आम्रपाली जैसी नगरवधुओं का चलन तात्कालिक
समाज में निरंतर बढ़ते उपभोक्तावादी कुसंस्कारों की ओर
संकेत करता है। उन नगरवधुओं को राज्य का समर्थन और
सरंक्षण प्राप्त था। नगरवधुओं के ठिकाने राज्य की कमाई
के बहुत बड़े स्रोत थे, इससे समाज के बुद्धिजीवी वर्ग
में उन गणतंत्रों के भविष्य को लेकर चिंता व्यापने लगी
थी। वे अपने नागरिकों को समय-समय पर सावधान भी करते
रहते थे। हालाँकि मद और मदिरा में तेजी से डूबता जा
रहा नवधनाढ्य वर्ग उसकी शायद की परवाह करता था।
महात्मा गौतम बुद्ध स्वयं गणतांत्रिक राज्यों के उद्भव
के पक्ष में थे। |