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पद की पूँछ और साढ़े पाँच इंच की गद्दी
- अनंत सहाय
आज के दौर में मनुष्य की
पहचान उसके गुणों से नहीं, बल्कि उसके नीचे दबी 'कुर्सी'
के प्रकार से होती है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि
आदिमानव के पास पूँछ थी, जो कालांतर में लुप्त हो गई।
लेकिन मेरा मानना है कि वह पूँछ लुप्त नहीं हुई, बल्कि वह
'पद' और 'प्रतिष्ठा' के रूप में पुनर्जीवित हो गई है। फर्क
बस इतना है कि पहले वह शरीर के पीछे लटकती थी, अब वह
व्यक्ति के 'विजिटिंग कार्ड' और सोशल मीडिया बायो में
कुंडल मारकर बैठी रहती है।
मेरे एक परम मित्र हैं—श्रीमान् लल्लन प्रसाद 'लौहपुरुष'।
वे पिछले २० वर्षों से 'अखिल भारतीय स्वयंभू साहित्य मंडल'
के निर्विरोध अध्यक्ष हैं। उनकी विद्वत्ता का आलम यह है कि
वे 'हँसना' और 'हंसना' के बीच का अंतर नहीं जानते, लेकिन
'पद' का व्याकरण उन्हें कंठस्थ है। कल वे मंच पर विराजमान
थे। मंच की पहली पंक्ति में लगी ५ कुर्सियाँ विशेष थीं।
बाकी दुनिया के लिए सामान्य कुर्सियाँ थीं, पर शुक्ल जी और
उनके चेलों के लिए वे साढ़े पाँच इंच की अतिरिक्त गद्दी
वाली 'सिंहासन' नुमा सीटें थीं।
शुक्ल जी जब उन पर बैठते हैं, तो उनकी रीढ़ की हड्डी में
अचानक एक ऐसा 'विस्मयादिबोधक' चिह्न (!) प्रकट होता है कि
वे सीधे तन जाते हैं। मैंने धीरे से पूछा, "शुक्ल जी,
साहित्य की दशा पर कुछ कहिए।"
वे बोले, "भाई साहब, साहित्य की दशा तो वह 'पूर्ण विराम'
(.) है जिसे हम पिछले १० सम्मेलनों से ढो रहे हैं। असली
चीज़ तो यह गद्दी है। देखिए, इस पर बैठते ही शब्द अपने आप
'अनुस्वार' की तरह सिर पर चढ़कर बोलने लगते हैं।"
मैंने गौर किया कि उनकी बातचीत में व्याकरण नहीं, बल्कि
'अधिकार' की गूँज थी। जहाँ चंद्रबिंदु की कोमलता होनी
चाहिए थी, वहाँ वे 'सत्ता' का कठोर डंडा चला रहे थे। वे कह
रहे थे, "देखो, अगर तुम्हें बड़ा रचनाकार बनना है, तो २
बातें याद रखो। पहली—कभी अपनी आलोचना मत होने दो।
दूसरी—दूसरों की रचनाओं में इतने 'प्रश्नचिह्न' (?) लगा दो
कि बेचारा लेखक अपने अस्तित्व पर ही शक करने लगे।"
आजकल की साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं का गणित भी बड़ा
निराला है। यहाँ २ + २ = ४ नहीं होता, बल्कि यहाँ १
चाटुकार + १ अध्यक्ष = ११ पुरस्कारों की गारंटी होती है।
यदि आप किसी रसूखदार व्यक्ति की ५ कमियाँ नज़रअंदाज़ कर
दें, तो वह आपको ५० मंचों पर 'युग प्रवर्तक' घोषित कर सकता
है। यह 'पाँच' और 'पचास' का खेल ही आज की बौद्धिक नैतिकता
है।
विराम चिह्नों का प्रयोग भी अब पदों के हिसाब से बदल गया
है। छोटे कार्यकर्ता के लिए 'अल्पविराम' (,) भी मयस्सर
नहीं, जबकि रसूखदारों के नाम के आगे 'कोलन' (:) लगाकर उनकी
प्रशंसा की लंबी सूची टाँग दी जाती है। शुक्ल जी जैसे लोग
तो 'अर्धविराम' (;) पर भी विश्वास नहीं करते। वे सीधे
'जयघोष' करते हैं। उनके लिए वर्तनी की अशुद्धि कोई मायने
नहीं रखती, बशर्ते वह अशुद्धि किसी 'मंत्री' या 'सेठ' के
सम्मान में की गई हो।
एक बार मैंने उनसे कहा, "शुक्ल जी, आपकी संस्था के लेटरहेड
पर 'अभिव्यक्ति' की जगह 'अभिवयक्ति' छपा है।"
वे अट्टहास कर उठे। बोले, "मूर्ख! जब पद बड़ा हो, तो
छोटी-मोटी 'इ' की मात्राएँ अपने आप विलीन हो जाती हैं।
सत्ता की वर्तनी हमेशा शुद्ध होती है, चाहे वह कितनी ही
अशुद्ध क्यों न लिखी जाए।"
यह सुनकर मैं अवाक रह गया। मुझे लगा कि शायद भाषा का
व्याकरण अब पाणिनी नहीं, बल्कि 'पद' की ऊँचाई तय करती है।
आज हर व्यक्ति के भीतर एक 'अध्यक्ष' छुपा बैठा है, जो बस
एक ५ फुट चौड़ी मेज और १ घूमने वाली कुर्सी का इंतज़ार कर
रहा है। जैसे ही उसे वह स्थान मिलता है, उसके भीतर का
'कोमल कांत' व्याकरण लुप्त हो जाता है और वह 'आदेशात्मक'
भाषा बोलने लगता है।
अंततः, निष्कर्ष यही निकलता है कि समाज में 'शुद्धता' की
तलाश व्यर्थ है। यदि आपके पास पद है, तो आपकी हर 'गाली' भी
सूक्ति वाक्य मान ली जाएगी। यदि आप निर्पद हैं, तो आपका
'कालिदास' होना भी 'पूर्ण विराम' के समान निष्प्राण है।
शुक्ल जी जैसे लोग तो अमर हैं, क्योंकि उन्होंने समझ लिया
है कि साहित्य और समाज की नाव कागज़ के पन्नों से नहीं,
बल्कि कुर्सी के पायों से चलती है।
आज जब मैं घर लौट रहा था, तो रास्ते में एक कुत्ता अपनी
पूँछ हिला रहा था। मुझे लगा, शायद वह मुझे चिढ़ा रहा है कि
"मूर्ख! मेरे पास तो एक ही पूँछ है, तुम्हारे नेताओं और
साहित्यकारों के पास तो पदों की ५-५ पूँछें हैं, जिन्हें
वे बड़ी शान से लहराते हैं!" |