आज सिरहाने


लेखक
गिरिराज किशोर
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प्रकाशक
राजकमल प्रकाशन
नयी दिल्ली
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पृष्ठ ३४१
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मूल्य 
१५० रूपये

जुगलबंदी (उपन्यास)

कथा और उपन्यास के अलावा नाटक – साहित्य की दुनिया के लिए गिरिराज किशोर का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। हिन्दी–साहित्य में गिरिराज किशोर एक बड़ा नाम है। हिन्दी–साहित्य में दिए जाने वाले सभी छोटे–बड़े पुरस्कार भी गिरिराज किशोर को मिल चुके हैं। गिरिराज किशोर की इस प्रतिष्ठा के पीछे उनके उपन्यास "जुगलबंदी" की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

अपने समय का भारी–भरकम यह उपन्यास अपनी सामग्री की वज़ह से इतना चर्चित हुआ कि एक लम्बे समय तक पाठकों की उनसे यही अपेक्षा रही कि वे "जुगलबंदी" की तरह का कोई दूसरा उपन्यास फिर लिखें। इन दिनों 'पहला गिरमिटिया' से विशेष चर्चा में उपस्थित गिरिराज किशोर के भीतर के उभरते उपन्यासकार की क्षमता को जानने के लिए 'जुगलबंदी' की औपन्यासिकता को समझना ज़रूरी है। सन १९७३ में यह उपन्यास पहली बार राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। मैंने इसे जब १९७५–७६ में पढ़ा तब तक यह बहुचर्चित हो चुका था। अपनी भाषा, चलते मुहावरों, जीवन्त दृश्यांकनों और यथार्थपूर्ण चित्रण के कारण उपन्यास न केवल बांधता गया बल्कि उपन्यास–लेखन के भविष्य को भी तय करने की दिशा में मार्गदर्शक की भूमिका बनता गया।

'अभिव्यक्ति' के लिए 'आज सिरहाने' स्तम्भ के अन्तर्गत नई–पुरानी पुस्तकों की समीक्षा का दायित्व लेते समय मुझे पुरानी पुस्तकों में सबसे पहले 'जुगलबंदी' का ख़याल आया और लगभग २८ साल बाद मैंने इसे दुबारा पढ़ा। 

ढहते मूल्यों के साथ ढहती हुई एक जमी–जमाई व्यवस्था के उखाड़ कर नेस्तनाबूद होने की दुर्दशा को शब्दों का जामा पहनाने में गिरिरज किशोर की कलम खूब चली है। 'जुगलबंदी' का कथ्य इतना स्पष्ट है कि उपन्यास पढ़ने के बाद पाठक के आगे कोई भ्रम नहीं रहता। अगर रहता है तो एक सवाल कि लेखक ने सचाई के दस्तावेज़ को लिखा कैसे? अनुभव का जगत क्या इतना विस्तृत भी हो सकता है कि कई स्थितियों का भोक्ता हो सके? घर–परिवार का चित्रण तो शायद सभी रचनाकार कर सकते हैं और वह अधिकांश पाठकों के लिए प्रामाणिक भी हो सकता है। 

लेकिन जेल के भीतर का जीवन, पुलिसवालों के व्यवहार, सामान्य हिन्दू और मुसलमान की एक–दूसरे के प्रति धारणा और ज़रा सी बात पर बमक उठने का दृश्य इतना स्वाभाविक है कि पाठक ठहरकर न केवल दृश्य की वास्तविकता के बारे में सोचता है बल्कि वह लेखक की क्षमता पर भी चमत्कृत होता है। ऐसे अनेक दृश्य हैं जो व्यंग्य उभारते हुए भी भावनात्मक रूप से बांधते हैं। ऐसे दृश्यों में एक वह है जब दो पुलिसकर्मी धर्म को तो उतना नहीं किन्तु परस्पर लगाए गए आक्षेपों पर लड़ पड़ते हैं तो एक दरोगा उनके बीच–बचाव में कहता है " माँ की गाली का दुनिया में कोई मतलब होता है। पुलिस में तुझे यही ट्रेनिंग मिली। ट्रेनिंग देने वाले ने नहीं बताया, पुलिस में भर्ती होने के बाद न किसी के माँ रहती है और न बहन। न कोई मुसलमान होता है और न कोई हिन्दू।" 

इस दृश्य में हालांकि दोनों धर्मों के लोगों के बीच घर बनी संकीर्णता भी एक झलक दिखाती ज़रूर है। आदमी अपने पलने–बढ़ने की संस्कृति को नहीं भूल पाता। मैंने ऊपर लेखक की क्षमता की बात कही है। यह सवाल हर लेखक पर लगता है और लगना भी चाहिए। एक बड़ी रचना न केवल पाठक के लिए बल्कि उसके रचयिता के लिए भी चुनौती बन जाती है। 'जुगलबंदी' सचमुच एक चुनौती उस दौर के पाठक को लगी थी और आज भी यह एक चुनौती है।

उपन्यास में माँ और बुआ का चरित्र बहुत सही चित्रित हुआ है। गिरिराज किशोर फेन्टेसी के भी उस्ताद माने जाते हैं मगर इस उपन्यास में यथार्थ इतना चढ़कर बोलता है कि फेन्टेसी की गुंजाइश ही नहीं थी। कुंवर शिवचरण का परिवार इलाके का सम्मानित परिवार है। नौकरों की भीड़ है, टहलुए हैं, दिखावा है, यह सब हवेलियों की निजता में आता है। चिलम भरने के विशेषज्ञ भी हवेलियों में ही पाए जाते थे और आज भी मिलते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अगर एक अर्थतंत्र चरमरा रहा था तो बड़े घरों को दीवालिया बनाने के लिए उनकी हवेलियों में उस वक्त भी चिराग जलते थे जब सूरज सिर पर चढ़ा होता था। यह उनकी अपनी हवेलियों में भीतर ही भीतर चलने वाला वह युद्ध था जिसके जिम्मेदार वे खुद थे।

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान और जर्मनी ही नहीं हारे, अंग्रेज भी हारे। और हारे भी तो इस तरह कि उनका खेमा ही दुनिया के हर हिस्से से उखड़ना शुरू हो गया।अंग्रेजों का जीत कर हारना हिन्दुस्तान के उन लोगों को बहुत अखरा जो उनके खैरख्वाह थे। कुँवर शिवचरण को अंग्रेजों की हार बुरी लग रही थी। मगर उनके सामने अपनी ज़िन्दगी भी उन्हें भारी पड़ रही थी। जिन संस्कारों में वे पले थे उनमें अपने कर्म उन्हें हर मामले में दोषी मान रहे थे .यहाँ तक कि एक मात्र बेटे के अपाहिज़ होने में भी उन्हें अपने ही कर्म दोषी लगते हैं।

उपन्यास में समलैंगिकता का भी ज़िक्र है जो अपने वास्तविक रूप में उभरा है। एक बात जो बरबस सामने आती है वह यह कि क्या लेखक सचमुच एक द्रष्टा बनकर उभरा है? कांग्रेस नामक संस्था पर उसकी सन ७३ में बनाई गई राय आज क्या अक्षरशःसही नहीं उतरती—

"इन लोगों में सधे हुए लोग नहीं हैं। एकदम भुरभुरे। मुल्क़ आज़ाद भी हो जाएगा तो भी संभलने में पचासों साल लगेंगे। कांग्रेस आज भी बंटी हुई है...आगे भी बंटी रहेगी। गाँधी का नाम कहाँ तक जोड़ेगा? सोने–चाँदी के सिक्के घिस जाते हैं , यह तो नाम ही है..."

उपन्यास में कई चरित्र हैं जिनमें शिवनाथ, वीरू बाबू, अशर्फीलाल आदि प्रमुख हैं जिन्हें पढ़कर ही तादात्म्य स्थापित किया जा सकता है। निश्चित रूप से यह वह पठनीय उपन्यास है जिसने इस विधा को बदलने की ज़मीन तैयार की।

कुंवर शिवचरण का आत्महत्या करना अंग्रेज राज की खुदकुशी है .यद्यपि उपन्यास में एक से वाक्यों का दुहराव बहुत है। शायद वह आज नज़र आता है। सन ७५–७६ में वही मुझे गुण नज़र आया था। इसके बावजूद यह एक पठनीय उपन्यास है। इसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।

---कृष्ण बिहारी