आज सिरहाने


रचनाकार
श्रीलाल शुक्ल

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प्रकाशक
 किताबघर प्रकाशन
दिल्ली-१०० ००२

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पृष्ठ - ११२

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मूल्य : १०० रुपए

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राग विराग (उपन्यास)

श्रीलाल शुक्ल का राग विराग अपने पुराने विवरणात्मक स्वरूप को तोड़कर एक नए शिल्प में मितव्ययी लेखक की समर्थ कृति के रूप में पाठकों तक पहुँचा है। शिल्प और इसकी बुनावट पर पाठकों के अलग अलग मत हो सकते है लेकिन अगर शुक्ल जी के 'राग दरबारी' को कोई 'राग विराग' के बाद पढ़े तो वह लेखक के प्रति न केवल चमत्कृत होगा वरन एकशेष श्रद्धा से नत हो जाएगा।

श्रीलाल शुक्ल की कलम शहरों के चित्र जिस प्रकार से खींचती है उससे उनके सूक्ष्म अवलोकन और समर्थ चित्रण की सामर्थ्य पहले ही अनुच्छेद से जानी जा सकती है। राग विराग और राग दरबारी दोनों ही उपन्यासों के प्रथम अनुच्छेद इस दृष्टि से पठनीय हैं।

राग विराग उपन्यास आधुनिक युवती और उसके सेना से सेवानिविृत्त कर्नल पिता के बीच संवादों से शुरू होता है . बातचीत का विषय युवती के मित्र शंकरलाल से जुड़ा है। वह उसे जीनियस समझती है पर पिता उसे लगभग सिरफिरा। इतना ही नहीं वह उसे नीची जाति का भी मानता है। शंकरलाल है भी दलित। सुकन्या नाम्नी युवती और शंकरलाल दोनों ही चिकित्सा से संबधित क्षेत्र में शोध कर रहे हैं। पिता और पुत्री की बातचीत में अजीब सी निर्लिप्तता है जो आजकल के शहरी जीवन का एक अंग सी होती जा रही है। शंकरलाल और सुकन्या के बीच लगाव या भावनात्मक उद्वेलन के दृश्य नहीं के बराबर हैं।

सुकन्या अपने पिता के सहकर्मी या कि कहें पूर्व परिचित के पुत्र से शादी कर लेती है जो कि मद्यव्यसनिक है। यह जानकारी सुकन्या को विवाह के बाद हो पाती है। शंकरलाल अपने परिवेश को बेचकर विदेश चला जाता है। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं। मोहब्बत के अंदाज़ बदले हैं मगर मोहब्बत तो नहीं ही बदली है। स्वरूप बदलना वजूद का बदलना नहीं होता। लेकिन नये ज़माने की उदासीनता नायक और नायिका संबंधों पर अंत तक छायी रहती है। सुकन्या का पति सुवीर अगर मद्यव्यसनिक न होता तो शायद उसे कभी शंकरलाल की याद भी न आती। उपन्यास हर समस्या के प्रति महानगरीय मौन धारण किये रहता है।

सुवीर का चरित्र स्वाभाविक लगता है। शराबी आदमी दयनीयता, झक्कीपन, बीमारी और आत्मदया को अपनी विशेषताएं बना लेता है। सुवीर की आत्महत्या भी पाठक के मन में कोई भावुकता या सहानुभूति पैदा नहीं कर पाते हैं। एक मानसिक रोगी को उसके निकटतमों का सहयोग चाहिए न कि उनकी उपेक्षा। उपन्यास में सुवीर को उपेक्षा ही मिली है। किसी का सहयोग नहीं। उसके पिता ने झूठ बोलकर शादी कराई यह कोई नई बात नहीं है । लेकिन राग विराग की नायिका में कोई हलचल नहीं होती। शायद प्रेम और संबंधों के प्रति यह नये युग की संवेदनहीनता है।

राग विराग ने पुराने सभी उन नियमों और परम्पराओं को तोड कर यह कहने की कोशिश की है कि अपनी बात को कहने के लिए अधिकतम शब्दों की ज़रूरत कतई नहीं है। जो अपनी बात कम से कम शब्दों में नहीं कह पाता उसे मुँह खोलने की भी जरूरत नहीं। आज की दुनिया इतनी व्यस्त है कि उसे फालतू कुछ भी पढने का समय उसी तरह नहीं जिस तरह देश के मुख्य पदों पर बैठे लोग केवल अपने सहायकों द्वारा लगाए और चिह्नित किए गए समाचार ही पढते हैं। प्रेम अब फालतू हो गया है। यह मात्र टाइम पास है। इस पर रोने वाला न केवल मूर्ख है बल्कि वह अहमक है जो अपनी बीमारी भी नहीं जानता। नए समय ने यही कुछ नए समाज को दिया है 

अंत में उपन्यास एक प्रश्न छोड़ जाता है – घटिया होती हुई इस दुनिया में क्या अब ऐसा कुछ सचमुच नहीं बचा जो प्यार जैसी भावना के पक्ष में खड़ा हो सके? दो में से कोई एक तो प्यार करता होगा?

— कृष्ण बिहारी
१६ जनवरी २००३