आज सिरहाने


लेखक
सूर्यबाला
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प्रकाशक
सुनील साहित्य सदन
३३२०–२१ जटवाड़ा, दरियागंज
नई दिल्ली ११०००२
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पृष्ठ २०८
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मूल्य : २०० रूपये
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इक्कीस कहानियाँ (कहानी संग्रह)

'इक्कीस कहानियाँ' सूर्यबाला का नवीनतम कहानी–संग्रह है जिसमें 'निर्वासित' से लेकर 'बकौल कात्या' तक की उनकी कहानी–यात्रा की कुछ महत्वपूर्ण कहानियाँ संगृहीत हैं। इन कहानियों से जिस कोलाज की रचना हुई है उसके प्रत्येक टुकड़े का अपना रंग है, आकार है, सौदर्य है। इन सभी टुकड़ों के मेल से जो आकृति बनी है उसमें जीवन है, जीवन की आशाएँ, आकाक्षाएँ हैं तो हताशा और अवसाद भी है। एक ओर कोमल संवेदनाएँ हैं तो दूसरी ओर उन संवेदनाओं को लीलता बाजारवाद भी है। लगता है, कोई खोयी–सी, अवसन्न मनःस्थिति में अपने सामने पसरे जीवन को गहरे सरोकार के साथ, पर साथ ही उतने ही निःसंग भाव से भी देख रहा है। उसकी एक आँख में आँसू की एक बूँद ठिठकी हुई है तो होठों पर एक झीनी–सी मुस्कान भी झिलमिला रही है।

'एक
इंद्रधनुष जुबेदा के नाम' में आसमान में खिला मौसम का पहला इंद्रधनुष अपने सारे रंगों के साथ उस्ताद की आँखों में उतर आता है और उन्हीं रंगों के साथ उन्हें भूला–बिसरा सबकुछ याद आ जाता है – शामियानों में सजी इत्र बसी महफिलें, उस्ताद की कामयाबी के लिये मन्नत माँगती जुलेखा, इंद्रधनुष के माथेवाली जुलेखा से बिछड़न, उस बिछड़न के दर्द से सुन्न पड़ते उस्ताद का उजली दमकती महफिलों से किनारा कर बेटी जुबेदा पर उसकी मृत माँ की ममता लुटाने की कोशिश और इस कोशिश में अकेले पड़ते जाते स्वयं वे। बदले हुए हालात में जब उस्ताद के पुराने सिद्ध गले से आकारहीन स्वरों का सोता फूटता है तो पूरे आकाश पर इंद्रधनुष ही इंद्रधनुष फैल जाते हैं।

'संताप' कहानी का शोक संताप बनता है तो उस बाजारवाद के चलते जहाँ अपाहिज होते हुए भी निर्भीक जल में कूद जानेवाली बच्ची की मृत्यु को माता–पिता का उद्धार बताया जा रहा है। 'बाऊजी और बंदर' में व्यंग्य की पैनी तराश बाजारवाद को उसके ढके–मुँदे रूप से उघाड़कर सामने खड़ा कर देती है। बेटे और बहू, बाऊजी और शोनू–शौनक की नोंकझोंक गुदगुदाती है पर कहानी के अंत तक आते–आते हास्य के ये हल्के–फुल्के क्षण तिलमिला देनेवाले व्यंग्य में बदल जाते हैं।

लेखिका की जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि, उसकी जिजीविषा, उसकी मूल्यचेतना बाजारवाद के प्रबल आघात के पश्चात् भी धुँधली नहीं हुई है। बाजारवाद आत्यंतिक संताप के इन क्षणों में भी शोक प्रकट करने आये बॉस के आगमन पर मृत बच्चों के पिता का चेहरा आत्मदर्प से रोशन कर स्थितियों की निष्ठुरता और करूणा दोनों को साकार सामने खड़ा कर देता है।

'निर्वासित' कहानी में यही हावी होता बाजारवाद एक समूची पीढ़ी को निर्वासन का दंश झेलने के लिये विवश करता है। अपने जोश में उफनती नयी पीढ़ी यह महसूस ही नहीं करती कि अपने 'थोड़े से में मगन' माता–पिता को बेटे–बहू के घर आकर अपना सुराज खो देने पर कितनी घुटन अनुभव होती है। अंततः यह बाजारवाद उन्हें उस बिंदू पर ले जाकर खड़ा कर देता है जहाँ दोनों बेटे माता–पिता को भी आपस में बाँट लेते हैं। आधुनिकता की यह स्वकेंद्रित दृष्टि और उपयोगितावाद 'गुफ्तगू' कहानी में भी दिखायी पड़ते हैं जब कैंसर से मर रहे जिंदादिल के.के. और उसकी असहाय संतान के पास, आवश्यकता के चरम क्षणों में भी, उनके मित्र–परिवार नहीं पहुँच पाते।

'होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन' सपाट सूने मैदान के बीचोंबीच खड़े अरुण वर्मा की उस उद्विग्नता की कहानी है जो इस अहसास से उपजी है कि जो इतने–इतने लोग अरुण वर्मा को समझाने आये उनमें से एक ने भी, नितांत निजी क्षणों में भी, अरुण के रास्ते के सही होने की बात को स्वीकार नहीं किया है। जिस सच को बड़े–बड़े लोग स्वीकार नहीं कर पाते हैं उसे शब्द देता है छुटका–सा बेटा 'पाऽऽपा! वह जो कल आप बता रहे थे अपने पापावाली बात, आज फिर से ठीक–ठीक बताइये ... मैं अपने दोस्तों को बताऊँगा।'

'बाउजी और बंदर' में भी यही सकारात्मक दृष्टि दिखायी देती हुई उनकी कहानियों में समर्थ ढँग से चित्रित हैं। ताता और दादी के मध्य जो अनूठा रिश्ता बना है वह कहीं भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करता है, सदा स्वयं को महिमामंडित करने और दूसरे का सबकुछ खसोट लेने की आपाधापी के बीच कात्यायनी का स्वयं को देते ही जाना एक अन्य भावभूमि पर ले जाता है, तब लगता है कि यद्यपि बहुत कुछ खोया जा चुका है तथापि अभी भी बहुत कुछ मूल्यवान शेष भी है, और इसी शेष से इन आलोकजीवी पात्रों का सृजन हुआ है।

ये सारे कथा पात्र हमारे जीवन के आसपास से उठाए गए ऐसे चरित्र हैं जो न केवल पाठक की पूरी सहानुभूति से तादात्म्य स्थापित करते हैं अपितु अपने दिल में उसके लिए एक ऐसा कोना ढूँढ लेते हैं जैसे वे उसके अपने सगे हों।

सुमित्रा अग्रवाल
१६ मार्च २००४