आज सिरहाने

 

रचनाकार
भावना कुंअर

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प्रकाशक
अयन प्रकाशन, १/२० महरौली,
नई दिल्ली-११००३०

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पृष्ठ - १६७

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मूल्य: १९.९५ डॉलर
(कूरियर से)

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प्राप्ति-स्थल
भारतीय साहित्य संग्रह

वेब पर दुनिया के हर कोने में

'साठोत्तरी गजल में विद्रोह के स्वर' (शोध प्रबंध)

गज़ल लम्बे अर्से तक सौन्दर्य अनुभूति एवं उसकी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम रही है। जीवन-अनुभव की तीव्रता को स्वतन्त्र शेर में अभिव्यक्त करना वाणी की शक्ति का परीक्षण है। कालान्तर में ग़ज़ल ने व्यष्टिगत हित की अपेक्षा समष्टिगत हित को अपना क्षेत्र बनाया, तब से इसकी भूमिका भी परिवर्तित होती गई।

जनसाधारण की व्यथा-कथा उकेरने और प्रतिगामी शक्तियों से टक्कर लेने में ग़ज़ल ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया ।ग़ज़ल अपने पुराने अर्थ (प्रेमिका से बातचीत) से हटकर हर संतप्त के आँसू पोंछने में आगे आई। सामाजिक विकास के साथ ग़ज़ल के वर्ण्य विषय में परिवर्तन होता गया। सामाजिक परिवर्तन एवं चिन्तन की पृष्ठभूमि में ग़ज़ल की भूमिका भी बदल गई। ग़ज़ल ने शृंगार रस की प्रधानता और स्थूल प्रेम के नाज़-नखरों से हटकर दैनन्दिन परिवर्तन को भी वाणी दी।समाज के प्रत्येक क्षेत्र में हुए परिवर्तनों और विद्रूपताओं ने ग़ज़ल की धार को प्रखर बनाया। प्रेम की मृदुल कल्पनाएँ
व्यंग्य और विद्रोह की निशित धार में परिवर्तित हो गईं।

लोकसेवा के लिए समर्पण-भाव से संलग्न होनेवाला वर्ग धीरे-धीरे सुविधाभोगी और भ्रष्ट होता गया । भ्रष्टाचार के अन्धेपन ने लोकसेवक को लोकशोषक बना दिया। लोकसेवक का उदार चेहरा सामन्त की हृदयहीन भूमिका में बदल गया। लोकसत्ता और रामराज का सपना देखने वाली जनता का धीरे-धीरे मोहभंग होता गया। मोहभंग की हताशा और निराशा ने हारकर अन्तत:विद्रोह का रूप धारण कर लिया। बदले हुए
दायित्व के साथ ग़ज़ल ने इसी मुखर विद्रोह को सशक्त वाणी प्रदान की।

ग़ज़ल की विषयवस्तु को लेकर बहुत कम शोध हुए हैं। डॉ. भावना कुँअर का शोध-ग्रन्ध ‘साठोत्तरी हिन्दी ग़ज़ल में विद्रोह के स्वर’ इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। सहृदय कवयित्री भावना कुँअर ने ग़ज़ल की मार्मिकता और वाग्वैदग्ध्य की बारीकी से पड़ताल की है। लेखिका ने प्रस्तावना में (अ) गज़ल की परिभाषा,आशय एवं तत्त्व (आ) साठोत्तरी हिन्दी ग़ज़ल की पृष्ठभूमि एवं परिवेश, (इ) विद्रोह का आशय, कारण एवं विविध आयाम-पर अपने और इस क्षेत्र के चर्चित हस्ताक्षरों के विचार प्रकट किए हैं। नवीन प्रतीक विधान और बिम्ब-विधान ने ग़ज़ल का रूप सँवारने में मुख्य भूमिका का निर्वाह किया है।

शोध के पाँच अध्यायों में क्रमश:विद्रोह के राजनैतिक,आर्थिक ,प्रेमपरक,धार्मिक-सांस्कृतिक एवं साहित्यिक रूपों की परिस्थितियों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। ‘उपसंहार’ में ’हिन्दी ग़ज़ल का भविष्य और उपलब्धियाँ’ पर संक्षिप्त और सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए गए हैं। ग़ज़ल विधा के शास्त्र से अनजान भीड़ इस क्षेत्र में पैठ बनाने लगी है ,जिसे रदीफ़ , काफ़िया और बह्र का तनिक भी ज्ञान नहीं है। सृजनात्मकता ग़ज़ल का प्राण है। भीड़ का यह अपरिपक्व रचना-संसार लेखिका की सबसे बड़ी चिन्ता है। ‘परिशिष्ट’ में ‘सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची’ दी गई है, जो भावना कुँअर के गहन अध्यवसाय से आश्वस्त करती है।

‘राजनैतिक विद्रोह’ की पड़ताल करते हुए लेखिका का कहना है कि छठे दशक के बाद ऐसे राजनेता राजनीति में आए ,जो आज़ादी के लिए किए संघर्ष और बलिदान के महत्त्व से अनजान थे ।ये लोग न तो लोक-चेतना को समझ सकते थे ,न लोक- सेवा को। ये स्वार्थ सिद्ध करना ही सर्वोपरि समझते रहे।इनके लिए वोट ही मुख्य था , चाहे वह किसी भी तिकड़म से मिले। हुल्लड़ मुरादाबादी ने इनकी नीयत और नियति तथा राजनीति की क्रूरता को इन शब्दों में व्यक्त किया है-
दुम हिलाता फिर रहा वो चन्द वोटों के लिए।
इसको जब कुर्सी मिलेगी, भेड़िया हो जाएगा।

जनहित की उपेक्षा इन जन नेताओं का प्रमुख हथियार रहा है, जिस जनता ने इनको शक्ति दी थी ,उसका उपयोग इन्होंने जनमर्दन के लिए किया है। डॉ कुँअर ‘बेचैन’ के शब्दों में-
माँग ली थी रोशनी, अपना यही अपराध था।
फ़ैसला उनका है-मेरा घर जलाया जाएगा।

आर्थिक विद्रोह का कारण मशीनीकरण,बेरोज़गारी ,गरीब का और गरीब होना और अमीर का और अधिक अमीर होना, गाँवों के बल पर शहरी सुविधाओं का बढ़ना, सहायता राशि की बन्दरबाँट,अभाव की खाई का निरन्तर गहरा होना है। आज़ादी के समय जो सुनहरे सपने दिखाए गए थे , जनता का उनसे भी मोहभंग हुआ है। रोटी कपड़ा और मकान की न्यूनतम सुविधा से वंचित जनसामान्य विद्रोह न करे तो और क्या करे? ग़ज़ल ने उसी पीड़ा को वाणी प्रदान की है। शिवनन्दन सिंह के शब्दों में-
शहर की बात मत पूछो, हमारा गाँव में घर है।
जहाँ पर पेट है खाली, वहाँ क्या चोर का डर है।
विकास की चाहे जितनी बातें की जाएँ, लेकिन वे तब तक बेमानी हैं ,जब तक गरीबी दूर नहीं होती। गरीबी तो नहीं हट पा रही, हाँ गरीब ज़रूर रास्ते से हटता जा रहा है ।डॉ वीरेन्द्र शर्मा के अनुसार-
रोशनी, पानी हमारे घर नहीं आते।
तुम बड़े बदलाव की चर्चा नहीं करना।
सामाजिक विद्रोह में डॉ भावना ने रिश्तों में आए बदलाव को रेखांकित किया है ।सामाजिक सम्बन्धों के क्षरण में अर्थतन्त्र की महती भूमिका होती है। सामाजिक दायित्व की उपेक्षा के साथ-साथ वैयक्तिक सुख-सुविधा की मृग-मरीचिका भी पारम्परिक सम्बन्धों में टूटन एवं दरार पैदा करती है। आपसी रिश्ते रेत की दीवार जैसे हो गए हैं । हनुमन्त नायडू ने अपनी ग़ज़ल के एक शेर में इसे बखूबी पिरोया है-
अब तो अपने हैं कि अपने नहीं लगते हमको
पहले गैरों में भी अपनों का भरम होता था ।
रिश्तों का सन्तुलन ही सुदृढ़ समाज की नींव बन सकता है ।इसके लिए हमे निराशा की खाई से निकलना होगा, न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ेगा ।वर्ना न्यायालय पूर्ववत लूट-खसोट के केन्द्र बनते जाएँगे । परिस्थितियाँ बदलने के लिए कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ेगा । अपना अस्तित्व बचाने के लिए प्रतिरोधी शक्तियों से लोहा लेना पड़ेगा और उन्हीं के बीच से अपना रास्ता बनाना होगा ।काज़ी तनवीर ने कहा है-
फूलों से रिश्ता जोड़ोगे , काँटों से कतराओगे ।
फिर सोचो, इस गुलशन में कितने दिन हँस पाओगे।

थककर बैठने और निराशा का दामन थामने से परिस्थितियाँ नहीं बदलेंगी। हमें खुले मन से सोचना होगा । कुँअर बेचैन ने इस बात की पुष्टि इस प्रकार की है-
खिड़कियाँ खोलो सुबह की रोशनी आने को है ।
फिर तुम्हारे घर तुम्हारी ज़िन्दगी आने को है।
साम्प्रदायिक सौहार्द, सांस्कृतिक सांमजस्य और मानवीय मूल्य भारत की शक्ति हैं। इनसे हटकर चलना हमारे पूरे सामाजिक परिवेश को ध्वस्त कर देगा। इधर के वर्षों में स्वार्थपरता के बढ़ने के कारण सारा सकारात्मक चिन्तन अपना आधार खोने लगा है नित्यानन्द तुषार ने इसे इस प्रकार बयान किया है-
क्या लिखा है किस धरम में ,ये कभी जाना नहीं।
हाँ धरम के नाम पर लड़ना -लड़ाना आ गया।

खोखली धार्मिकता और कर्मकाण्ड निरन्तर पाखण्ड में बदलते जा रहे हैं, क्योंकि कल्याण का केन्द्र -मानव,उसमें से गायब है। मधुप शर्मा के शब्दों में-
पत्थर की प्रतिमा पर हमने ,पकवान चढ़ाए हैं क्या-क्या।
मुट्ठी भर चावल की खातिर ,इंसान तरसते रहते हैं।

सांस्कृतिक प्रदूषण से हमारा अन्तर्मन दूषित हुआ, तो पर्यावरण प्रदूषण लगता है सब कुछ लील लेगा। कुँअर बेचैन की ग़ज़ल में यह चिन्ता सबको आगाह करती है-
जंगलों को आदमी से आज ख़तरे हैं बहुत।
शहर तो बसते गए, पर घर ये उजड़े हैं बहुत।

साहित्यिक जगत में हिन्दी ग़ज़ल ने पिछले दशकों में दुष्यन्त कुमार की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए एक मुकाम हासिल कर लिया है। इस उपलब्धि का एकमात्र कारण है- जनचेतना को वाणी प्रदान करना । हरेराम ‘समीप’ ने कहा है-
बदलते हालात बतलाना ज़रूरी हो गया।
इसलिए मुझको ग़ज़ल गाना ज़रूरी हो गया।

उपसंहार में डॉ भावना कुँअर ने ग़ज़ल की आई बाढ़ में विधागत उपेक्षा का जिक्र किया है। विधागत ज्ञान की कमी के कारण बहुत से ऐसे लेखक और सम्पादक हैं, जो किसी भी छन्दोबद्ध रचना को ग़ज़ल का नाम दे दे रहे हैं। यही करण है कि ग़ज़ल के नाम पर ढेर सारा कचरा भी इकट्ठा हो गया है। फिर भी आज की चुनौतियों को अपनी ग़ज़ल का विषय बनानेवाले समर्पित और सजग रचनाकारों की कमी नहीं है। ऐसे रचनाकार ही इस विधा के लिए आशान्वित करते हैं।

डॉ भावना कुँअर का यह श्रम-साध्य शोध एक विशिष्ट कार्य है, जो हिन्दी-जगत के गज़ल प्रेमियों और शोधार्थियों को दिशा प्रदान करेगा। डॉ भावना कुँअर, क्योंकि स्वयं सहृदय कवयित्री भी हैं, इसलिए इस शोध के बहाने ‘ग़ज़ल की दुनिया से कुछ चुने हुए अशआर के मोती सामान्य पाठक को भी तृप्त कर सकेंगे, ऐसी आशा है। अयन प्रकाशन ने इस ग्रन्थ को सुन्दर ढग से प्रकाशित किया है।

रामेश्वर कांबोज हिमांशु
३१ जनवरी २०११