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कलम गही नहिं हाथ  


 

प्रकृति के राज में

कदंब के तले यह कुटिया  है। कुटिया का नाम है वृंदा। आश्रम में वृंदा के सामने पड़ी सहारनपुर की कुर्सियों पर बैठे हुए वातावरण में बिखरी वृंदावन जैसी पवित्रता का अनुभव किया जा सकता है। पेड़ पौधों से लदे धरती के इस अंचल पर एक प्राकृतिक चिकित्सालय है। ज्यादा लोग यहाँ नहीं हैं हमारे बगल वाली कुटिया में कैटेलीना नाम की एक महिला बेल्जियम से आकर ठहरी हुई हैं। वे पेट की बीमारियों के इलाज के लिए यहाँ आई हैं।

आचार्य जी कहते हैं कि जो वस्तु जिस पदार्थ से बनती है उसकी सही मरम्मत उसी पदार्थ से की जा सकती है। जिस प्रकार टूटी हुई लकड़ी की मरम्मत लकड़ी से ही की जाती है, टूटी हुई दीवार की मरम्मत गारे और ईटे से ही की जाती है उसी प्रकार शरीर पंच तत्त्वों से बना है इसलिए उसकी ठीक से मरम्मत केवल पंच तत्वों से ही की जा सकती है। मुझे लगता है कि यह प्रकृति चिकित्सा का मूल दर्शन है। प्रातःकालीन योग, जड़ी बूटियों के ताज़े काढ़े या गोलियाँ तथा तरह तरह के पैक, सेंक और मालिशें यहाँ स्वास्थ्य की देखरेख के लिए प्रयोग में लाई जाती हैं। लगता है हम सुख-सुविधा और स्नेह की उस दुनिया में वापस लौट रहे हैं जिसमें हमारे माता पिता ने हमें पाला था। ऊपर के चित्र में फूल पौधों से लदे इस प्रातःकालीन सैर के मार्ग को देखें। ऐसा सौंदर्य किसे आकर्षित नहीं करेगा। प्रकृति के सान्निध्य में स्वास्थ्य की देखभाल का यह सपना सहारनपुर के एक नागरिक का है। इस विषय में विस्तार से फिर कभी आज समय हो रहा है रात के खाने का। प्रकृति के राज में आश्रम में उगी सब्जियों का मज़ा कुछ और ही है। यहाँ बनी हुई कुटियों में रहते गाँधी जी के सादा जीवन उच्च विचार की परिकल्पना भी रूप लेती दिखाई देती है।

दो अक्तूबर अभी ही गया है। गाँधी जी प्राकृतिक चिकित्सा के प्रबल समर्थकों में से एक थे लेकिन जिस प्रकार केरल में पंचकर्म का विकास और विस्तार हुआ है वैसा प्राकृतिक चिकित्सा का विस्तार उत्तर भारत में देखने को नहीं मिलता। ऐसे में इस आश्रम को देखकर सुखद लगना स्वाभाविक ही है।

हमारा अगला अंक दीपावली विशेषांक होगा अतः उसे देखना न भूलें।

पूर्णिमा वर्मन
५ अक्तूबर २००९

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