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कलम गहौं नहिं हाथ  

 

 

 

आपो भवन्तु पीतये

२२ मार्च अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस है। जल की महत्ता को स्वीकार करते हुए यूनाइटेड नेशंस की जनरल असेंबली ने १९९३ में इस दिन की घोषणा की थी। लेकिन इससे हज़ारों वर्ष पहले भारतीय विद्वानों ने शुद्ध जल की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए "आपो भवन्तु पीतये" कहकर इसका सम्मान किया था। भारतीय संस्कृति में प्रचलित प्रार्थनाओं, यज्ञों, संस्कारों और पूजाओं में जल की उपस्थिति हमें आज भी यह स्मरण कराती है कि समय रहते साधनों के महत्त्व को समझने, सम्मान देने और संरक्षण प्रदान करने वाली प्राचीन भारतीय संस्कृति कितनी विकसित थी। ये अमूल्य संस्कार कैसे मिट गए यह वाद-विवाद और विश्लेषण का विषय हो सकता हैं लेकिन यह तो स्पष्ट है कि संस्कार बनाने का महत्त्वपूर्ण काम शिक्षा करती है और जिस देश की शिक्षा प्रणाली को (तक्षशिला पर आक्रमण से मैकाले के प्रत्यारोपण तक) लगातार विध्वंस झेलना पड़ा हो उसकी दिशा का खो जाना अस्वाभाविक नहीं है।

आज की शिक्षा पूँजीवादी व्यवस्था का अंग है, जहाँ हम पैसे खर्च कर के पैसे कमाने की विद्या प्राप्त करते हैं और पूँजी के चक्रव्यूह में लगातार घूमते हुए, उसे पाने की कमरतोड़ होड़ का हिस्सा बन जाते हैं। विज्ञापन के बल पर आम आदमी को पूँजीवादियों द्वारा निर्धारित किसी भी निश्चित उद्देश्य की ओर हाँका जाता है। ये उद्देश्य व्यापारिक और राजनैतिक स्वार्थ व लालचों से भरे हुए होते हैं, जिसके कारण,  संस्कृति के विकास तथा संरक्षण का काम कहीं पीछे छूट जाता है। ऐसी अवस्था में पंच तत्त्वों पर संकट आ पड़ना स्वाभाविक ही है। पहले समृद्धि के नाम पर जल स्रोतों को पाटकर, उनमें अवशिष्ट बहाकर या उनकी दिशा बदलकर गरीबों को बेघर किया जाता है, उनकी सम्पत्ति को लूटा जाता है, फिर विपत्ति का डर दिखाकर उन्हें पुनः जलप्लावित करने के नाम पर यह व्यापार दोहराया जाता है। तरह तरह से रूप बदलकर यह सब चलता ही रहता है। दरअसल प्रकृति के इस सुंदर उपहार के नाम समर्पित इस दिन मुझे कुछ अच्छा कहना था, यह सब नहीं कहना था, पर मन कहीं भटक गया...

पानी के विषय में लोकप्रिय लेखक डॉ. श्रीराम परिहार का एक बड़ा ही भावभीना ललित निबंध है- "प्राचीरों में कैद पानी"। कविता की तरह कोमल इस निबंध के एक अंश से ही मन पानी की तरह तरल हो उठता है, तो मन का स्वाद सुधारने के लिए प्रस्तुत हैं- डॉ. श्री राम परिहार के इस निबंध से कुछ आस्था से भरी पंक्तियाँ-
"पानी से जुड़ा आदमी का धरम-करम है। पानी से जुड़ा ईमान है। पानी से जुड़ा मन है। तन है। पानी से जुड़ा संस्कार है। पानी से जुड़ा मान-सम्मान है, जीवन की आभ है। तरलता है। सरसता है। आँखों में ओज है। प्राणों में शक्ति है। उम्मीदों में हरापन है। धूप-छाँह के बीच कहीं प्यास के बुझने की अनसुलगती आस है। पास में पानी है तो बीहड़ों को पार कर जाने की हिम्मत है। जीवन में पानी है तो संघर्षों का परास्त करने का विश्वास है। यह विश्वास, यह आस, यह शक्ति, यह हरापन, यह ओज, यह आभ सब कुछ पानी से मिला है। वह पानी किसी की कृपा से नहीं, बल्कि प्रकृति से मिला है। मुफ्त और पर्याप्त। इसलिए कि यह सृष्टि चलती रहे। सृष्टि में संतुलन बना रहे। पंच तत्व रचित सृष्टि हँसती रहे। बूँद-बूँद से जलाशय भरें, नदियाँ बहें और समुद्र लहराएँ। बदरा बरसे और जीवन सरसे। पाप तरसे और पुण्य हरसे। धरती की प्यास गहाराये और आकाश में घटा मंडराए। कोटि-कोटि कंठ पुकारें और आकाश से नर्तित जल बूँदें उनकी आरती उतारें।"

प्रकृति के इस वरदान की स्फूर्तिदायक मिठास सबके जीवन को अनंत काल तक सरसाती रहे, इसी मंगल कामना के साथ,

पूर्णिमा वर्मन
२२ मार्च २०१०
 

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