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दो पल

अलग अलग चेहरे
-अश्विन गांधी

एक बेटा शादी के लिये लड़की देखने जा रहा था।
"बेटा, गुण को देखना, सिर्फ चेहरे को नहीं," पिताजी सलाह दे रहे थे, बेटे को सजते धजते देखकर।
"मगर, पापा, ये गुण–वुण तो थोड़ी देर में पहचानना काफी मुश्किल है। अगर चेहरे को जाने दिया तो हो सकता है, मैं दोनों जहाँ से लटक जाऊँ!!

कहते है, शादी मालिक के हाथ है, और किस्मत के साथ है। चेहरा जनम से मिलता है, कुछ सजधज ठीकठाक कर सकते हैं, मगर दुनिया के बाज़ार में चेहरे पर टिकाई हुई पहली नज़र के भाव भारी रहते हैं। चरित्र ऐसी चीज़ है जो जल्दी से, बाहर से नहीं दिखती। एक ऐसी चीज़ जिसका अहसास होना जरूरी है। चेहरा समय की रफ्तार में बुढ़ापे से और मौत से डर सकता है, चरित्र जिंदगी का सफर निर्भयता से पार कर सकता है।
चेहरा या चरित्र? क्या सुंदर चेहरा सुंदर चरित्र का पुराव है? क्या चरित्र की रोशनी चेहरे पर दिख सकती है? क्या ये सच है, 'जो दिखता है वो नहीं, जो नहीं दिखता, वो है? शायद इस जंग में चरित्र की विजय हो सकती है, अगर विश्वास हो तो...हकीकत में जिस चेहरे के हम मालिक है उसे हमें सुंदर फूल की तरह रखना चाहिये और ये विश्वास रखना चाहिये कि अंदर के गुल बाहर के फूल में महक भर देंगे, शोभा में अभिवृद्धि कर देंगे।

अभिव्यक्ति ने एक साल में अलग अलग चेहरे ग्रहण किये। मुखपृष्ठ पर, कला के जरिये, अपनी सज–धज दिखाई। इनमें से कुछ ऐसे थे जिन्हें आपने याद रखा और पत्र लिख कर अपनी खुशी व बधाई को अभिव्यक्त किया। आज उन विशेष चेहरों को हम एक साथ यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं —

कला दीर्घा में...

मकबूल फिदा हुसेन
जलरंग कागज़ पर

बाटिक
 
निकिता मोदी

कहानियों में...



गौरव ग्रंथ में...



उपहार में...


दोस्त तुम हो एक गीत और कहो साथ साथ जानेमन नराज़ ना हो

आज अभिव्यक्ति एक साल की हो चुकी है, अनंत खुशी है कि अभिजनों ने अभिव्यक्ति के अलग–अलग चेहरे पसंद किये, चेहरे के पीछे का अस्तित्व स्वीकार किया और, अलग–अलग तरह से अभिव्यक्त करने का प्रोत्साहन दिया।

इसी आशा में अभिव्यक्ति
फूल पीले तेरे
सुंदर रहें महकते रहें...

१५ अगस्त २००१

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