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गौरव गाथा 

हिन्दी साहित्य को अपने अस्तित्व से गौरवान्वित करने वाली विशेष कहानियों के इस संग्रह में प्रस्तुत है- हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक मोहन राकेश की कहानी-''आद्रा''।

बचन को थोड़ी ऊँघ आ गई थी, पर खटका सुनकर वह चौंक गई। इरावती डयोढ़ी का दरवाज़ा खोल रही थी। चपरासी गणेशन आ गया था। इसका मतलब था कि छ: बज चुके होंगे। बचन के शरीर में ऊब और झुंझलाहट की झुरझुरी भर गई। बिन्नी न रात को घर आया था, न सुबह से अब तक उसने दर्शन दिए थे। इस लड़के की वजह से ही वह परदेस में पड़ी हुई थी, जहाँ न कोई उसकी जबान समझता था, न वह किसी की जबान समझती थी। एक इरावती थी, जिससे वह टूटी-फूटी हिन्दी बोल लेती थी, हालाँकि उसकी पंजाबी हिन्दी और इरावती की कोंकणी हिन्दी में ज़मीन-आसमान का अन्तर था। जब इरावती भी उसकी सीधे-सादे शब्दों में कही हुई साधारण-सी बात को न समझ पाती, तो वह बुरी तरह अपनी विवशता के खेद से दब जाती थी और इस लड़के को रत्ती-भर चिन्ता नहीं थी कि माँ किस मुश्किल से दिन काटती है और किस बेसब्री से मेरा इन्तज़ार करती है। आए तो घर आ गए, नहीं तो जहाँ हुआ पड़े रहे।

एक मादा सुअर अपने छ: बच्चों के साथ, जो अभी नौ-नौ इंच से ऊँचे नहीं हुए थे, कुएँ की तरफ़ से आ रही थी। तूते के बुड्ढ़े पेड़ के पास पहुँचकर उसने हुंफ्-हुंफ् करते हुए दो-तीन बार नाली को सुँघा और पेड़ के नीचे कीचड़ में लोटने लगी। उसके नन्हें आत्मज उसके उठने की राह देखते हुए वहीं आस-पास मंडराने लगे।

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