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कहानियाँ

वरिष्ठ कथाकारों की प्रसिद्ध कहानियों के इस स्तंभ में इस सप्ताह
प्रस्तुत है भारत से चित्रा मुद्गल की कहानी— गेंद


"अंकल...ओ अंकल ! ... प्लीज सुनिए न अंकल...!
सँकरी सड़क से लगभग सटे बँगले की फेंसिंग के उस ओर से किसी बच्चे ने उन्हें पुकारा।

सचदेवा जी ठिठके, आवाज कहाँ से आयी भाँपने लगे। कुछ समझ नहीं पाए। कानों और गंजे सिर को ढके कसकर लपेटे हुए मफलर को उन्होंने तनिक ढीला किया। मधुमेह का सीधा आक्रमण उनकी श्रवण-शक्ति पर हुआ है। अकसर मन चोट खा जाता है जब उनके न सुनने पर सामने वाला व्यक्ति अपनी खीज को संयत स्वर के बावजूद दबा नहीं पाता।

सात-आठ महीने से ऊपर हो रहे होंगे। विनय को अपनी परेशानी लिख भेजी थी उन्होंने। जवाब में उसने फोन खटका दिया। श्रवण-यन्त्र के लिए वह उनके नाम रुपए भेज रहा है। आश्रम वालों की सहायता से अपना इलाज करवा लें। बड़े दिनों तक वे अपने नाम आने वाले रुपयों का इन्तजार करते रहे। गुस्से में आकर उन्होंने उसे एक और खत लिखा। जवाब में उसका एक और फोन आया। एक पेचीदे काम में उलझा हुआ था। इसीलिए उन्हें रुपए नहीं भेज पाया। अगले महीने हैरो के एक भारतीय मित्र आ रहे हैं। घर उनका लाजपत नगर में है। फोन नम्बर लिख लें उनके घर का।

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