साहित्य


फैंटम हुआ पचहत्तर का

--प्रभात रंजन


फैंटम का नाम आते ही इंद्रजाल कॉमिक्स के उस महानायक की तस्वीर मन में उभरने लगती है जो शरीर को रंगीन नकाब से ढंककर रहता था, और आँखों को काले चश्मे से, खोपड़ी जैसी गुफा में रहता था, घोड़ा और बाज़ जिसके वफादार साथी थे। जिसका असली चेहरा किसी ने नहीं देखा था। कहा जाता था कि जिसने नकाबपोश फैंटम का असली चेहरा देख लिया उसकी मृत्यु निश्चित है। वह जिसको अपना दोस्त समझता था उसके ऊपर एक खास तरह का निशान अंकित करता था, जिसको दुश्मन उसके ऊपर खोपड़ी के निशान वाली अँगूठी से निशान बना देता था, जिसने अन्याय, लोभ ज्यादती से लड़ने का संकल्प लिया था। कहते हैं कि दशकों तक उसने दुनिया भर के किशोरों के मन में बुराई से लड़ने का आदर्श स्थापित किया। वह फैंटम ७५ साल का हो गया। मानवता को शोषण और बुराई से मुक्ति दिलवाने का एक सपना ७५ साल का हो गया।

१९३६ में जब लेखक-कार्टूनिस्ट ली फाक ने इसकी कल्पना को साकार रूप दिया तब उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि दस करोड़ लोग उसे दुनिया भर के अखबारों में रोज पढेंगे। कॉमिक्स की दुनिया के इस पहले सुपरहीरो फैंटम के जन्म की दास्तान बड़ी दिलचस्प है। ली फाक ने सबसे पहले ‘मैन्ड्रेक’ जादूगर की कहानी को अखबार में कॉमिक्स पट्टी की तरह प्रस्तुत करना शुरु किया, जब वह चल निकली तो अमेरिका के एक प्रसिद्ध फीचर एजेंसी ने उनसे कहा कि वे अगर वे कॉमिक्स का कोई नया किरदार इजाद करें तो वह उसे कई अखबारों में शुरु करवा सकते हैं। वह अमेरिका में महामंदी का दौर था। उस दौर में उन्होंने एक ऐसे पात्र की कल्पना की जो हमारी-आपकी तरह इंसान था। लेकिन उसके आदर्श ज़रा ऊँचे थे। वह समाज को अपराध और अपराधियों से मुक्ति दिलाना चाहता था, जिनको मित्र समझता था उनकी रक्षा में तत्पर रहता था। मंदी के उस काल में उसमें अमेरिका के लोगों को एक महानायक दिखाई देने लगा जो उनकी रक्षा कर सकता था, मुक्ति दिला सकता था। प्रसंगवश, वह किस्से-कहानियों की दुनिया का पहला ऐसा चरित्र था जो अमानवीय नहीं था। वह तो एक सामान्य मनुष्य था जो अपनी बुद्धि और कौशल से ऐसे काम कर जाता था कि लोगों को वह अतिमानवीय प्रतीत होता। कहते हैं कि मंदी के उस दौर में फैंटम ने अमेरिकी किशोरों में आत्मविश्वास
भरने का काम किया। उनको भविष्य के प्रति आशावान बनाया।

देखते ही देखते फैंटम का चरित्र इतना लोकप्रिय हो गया कि दुनिया के अनेक देशों की अनेक भाषाओं में यह चरित्र अपने मूल रूप में लेकिन अलग-अलग नामों से अवतरित होने लगा। एक ज़माने तक यह सबसे अधिक पढ़े जाने वाले कॉमिक्स किरदार में शुमार किया जाता रहा। अफ्रीका के जंगलों में कहीं बंगाला कबीले में रहने वाले इस शांतिदूत में ऐसी रहस्मय वास्तविकता थी कि जो भी इसे पढता सहज भाव से इसकी ओर आकर्षित हो जाता। अमेरिका में वह उपयोगितावादी दर्शन का ज़माना था, जिसका उद्घोष था कि मनुष्य ही प्रत्येक वस्तु के केंद्र में है। वैसे में मानवीय संभावनाओं से भी परे के इस मानवीय चरित्र ने घर-घर में अपने को स्थापित कर लिया। इस कदर कि १९९९ में अपनी मृत्यु तक ली फाक बिला नागा फैंटम के इक्कीसवें अवतार की कहानियों से पाठकों को रूबरू करवाते रहे। न जाने कितनी पीढियाँ उसके सम्मोहन के साथ बड़ी हुई और बाद में उसकी यादों में जीती रही।


जब संसार में इसकी धूम मच रही थी तो भारत कैसे इसके आकर्षण से अछूता रहता। पहले ४० के दशक में इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इण्डिया में धारावाहिक पट्टी के रूप में इसका आगमन हुआ। लेकिन इसका असली जादू छाया १९६४ में इंद्रजाल कॉमिक्स के प्रकाशन के साथ। मार्च १९६४ में जब इंद्रजाल कॉमिक्स के माध्यम से फैंटम अपने भारतीय अवतार में आया तब भारतीय मानस पर चीन युद्ध की हताशा-निराशा छाई हुई थी। ऐसे वातावरण में बुरी ताकतों को दूर भगाने वाले फैंटम में पाठकों ने शायद एक नया अवतार देखा। आखिर अवतार समय-समय पर मनुष्य रूप में ही तो आते हैं, मनुष्य को दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए। कहा जाने लगा कि असल में फैंटम के चरित्र पर कहीं न कहीं भारतीय मिथकों की छाया है। इसके सूत्र भी ढूंढे जाने लगे। कहा गया कि फैंटम को इजाद करने से पहले ली फाक पूरब की यात्रा पर आया था, कि जिस तरह का जादुई माहौल, रहस्यमयता उसके किस्सों में है वह तो पूरब के देशों की लोककथाओं में पाया जाता है। अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी इसका प्रकाशन होने लगा।

हिंदी में इसके पात्रों के नाम बदल गए। फैंटम हिंदी संस्करण में वेताल हो गया। फैंटम का क़स्बा बेंगाला हिंदी में देंकाली हो गया। लेकिन इससे फैंटम का जादू कम नहीं हुआ। पहले इसका प्रकाशन कॉमिक्स के रूप में मासिक स्तर पर होता रहा, ३-४ सालों में ही इसकी माँग इतनी बढ़ी कि इसकी कहानियाँ हर पखवाड़े आने लगी। देखते-देखते इनका प्रकाशन साप्ताहिक होने लगा। ७० के दशक और अस्सी के दशक के पूर्वार्ध में बड़े हो रहे किशोरों के आदर्श की तरह है फैंटम का यह मायावी दिखने वाला लेकिन इंसानों जैसा वास्तविक चरित्र। हिंदी के अलावा कन्नड़, तमिल, मराठी, बंगाली, गुजराती, मलयालम अदि भाषाओं में भी फैंटम की कहानियाँ पहुँचीं। यह बात अलग है कि भारत में सबसे अधिक लोकप्रिय यह हिंदी और अंग्रेजी में ही रहा तथा इन्हीं दो भाषाओं में यह सबसे दीर्घजीवी भी साबित हुआ। सबसे अधिक फैंटम कॉमिक्स
भी इन्हीं दोनों भाषाओं में छपे।

फैंटम के अलावा ली फाक के दूसरे कॉमिक्स पात्र मेंड्रेक जादूगर का भी प्रकाशन अंग्रेजी-हिंदी में हुआ। इनके अलावा इंद्रजाल कॉमिक्स में फ्लेश गोर्डन और बहादुर नामक दो और चरित्रों की कहानियाँ भी स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत की जाने लगीं। १९९० तक इनका प्रकाशन अबाध रूप से होता रहा। इस दौरान इंद्रजाल कॉमिक्स के कुल ८०३ अंक प्रकाशित हुए, जिनमें से ४१४ अंक फैंटम या वेताल के थे। तब आज की तरह हर चीज़ का बाज़ार खड़ा करने का चलन नहीं शुरु हुआ था लेकिन फैंटम के प्रतीक-चिह्न दुकान में बिका करते थे। यहाँ तक खोपड़ी के निशान वाली वह अँगूठी भी जिसे फैंटम अपने दुश्मनों के ऊपर जड़ दिया करता था (चित्र नीचे)। टेलीविजन के दौर में २१ पीढ़ियों से बुराई को मिटाने का संकल्प लिए इस महानायक की कहानियाँ गुम होने लगी, टीवी ने बच्चों की कल्पना को अति-मानवीय पंख लगा दिए। ‘कुछ भी संभव कर देने वाले ‘सुपरमैन’ का ज़माना आया। लेकिन आज भी इसका प्रकाशन अमेरिका में कॉमिक पट्टी के रूप में जारी है,
उसके पाठक सीमित भले हो गए हों लेकिन आज भी उसके किस्सों का आकर्षण बना हुआ है।

तकनीक-आधारित मनोरंजन के दौर में उसके कथा-रूप भी बदलते जा रहे हैं। फैंटम एक ऐसा काल्पनिक चरित्र है जो अलग-अलग माध्यमों में सबसे अधिक बार प्रकट हुआ है। ४० के दशक में फैंटम की कहानियों पर उपन्यास लिखे गए। डेल रॉबर्टसन का लिखा हुआ ‘द सन ऑफ द फैंटम’ ऐसा ही एक उपन्यास है। यह एक ऐसा कॉमिक्स-चरित्र साबित हुआ जिसे फिल्म और टेलीविजन माध्यमों ने सबसे अधिक आजमाया। १९४३ में पहली बार इसकी कहानियों को लेकर छोटे-छोटे सिनेमाओं की शृंखला का निर्माण हुआ। १५ कड़ियों वाली यह फिल्म भी कॉमिक्स की तरह ही सफल रही। अनेक टेलीविजन धारावाहिक भी बने। १९९४ में टीवी धारावाहिक आया ‘फैंटम: २०४०’, जिसमें २४ वें फैंटम के कारनामे दिखाए गए हैं। उसे चोरों, डकैतों, समुद्री लुटेरों से लड़ते हुए नहीं दिखाया गया है। उसे धरती का पर्यावरण बिगाड़ने का प्रयास करने वाले दुष्ट वैज्ञानिकों से लड़ना पड़ता है। फैंटम के परंपरागत सहयोगी घोड़ा, बाज़ उसके साथ नहीं होते लेकिन बुराई
से लड़ने का वही संकल्प जिसके लिए फैंटम की २३ पीढियाँ कुर्बान हुईं।

१९९७ में दूरदर्शन पर वेताल-पचीसी’ नामक धारावाहिक का प्रसारण हुआ। सुनील अग्निहोत्री निर्देशित इस धारावाहिक के आधे-आधे घंटे के करीब ५० एपिसोड प्रसारित हुए। बाद में कुछ और फ़िल्में भी बनी। बाद में जब इंटरनेट का ज़माना आया तो अनेक उत्साही लोगों ने फैंटम के कॉमिक्स कथाओं को ऑनलाईन उपलब्ध करवाना शुरु किया। आज फैंटम कॉमिक्स को फुर्सत में ऑनलाईन पढ़ा जा सकता है। किसी न किसी रूप में फैंटम बार-बार आ जाता है। इसकी कल्पना को साकार करने वाले ली फाक ने कहा था कि असल में रॉबिनहुड की कहानियों से प्रेरित होकर उन्होंने फैंटम की कहानी के ताने-बाने को बुना था। समाज में असमानता, अपराध बढता गया है और हर दौर में एक ऐसे पात्र की आवश्यकता बनी रही है जो रक्षा करे, आगे बढ़ने का संकल्प मन में पैदा करे। अकारण नहीं है कि फैंटम से प्रेरित चरित्र भी बड़ी संख्या में आये।

हालाँकि हाल में ही फैंटम के चरित्र का विश्लेषण करते हुए एक विद्वान ने लिखा कि फैंटम अगर आज के दौर में हुआ होता तो शायद इतना सफल नहीं हुआ होता। उसने कई कारण गिनवाए। एक तो उस तरह के आदर्शों का समाज से धीरे-धीरे अंत होता जा रहा है जिसके साथ फैंटम जीता रहा। सबसे बढ़कर यह कि अपनी तमाम सच्चाई, ईमानदारी, निष्ठा के बावजूद फैंटम आखिरकार गोरी नस्ल का था। अस्मिताओं के संघर्ष के ज़माने में गोरी चमड़ी वाले रक्षक नायक को तीसरी दुनिया के देशों में शायद ही वह लोकप्रियता मिल पाती जो दुनिया भर में करीब ५० सालों तक उसे किसी न किसी रूप में उस ज़माने में मिली थी। बहरहाल, ७५ साल हो गए, बड़े-बड़े नायकों का अंत हो गया, लेकिन फैंटम है कि आज भी अपनी काल्पनिकता में किसी न किसी रूप में नायक की सम्भावना को बनाये हुए है।

४ अप्रैल २०११