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आज
पाँच साल पुरानी बात खत्म हो जाएगी। अब नीरज अपना नया खाता फिर
खोल सकता है। वह पिछला सब हिसाब साफ़ कर देगा। न एक पाई उधर, न
एक पाई इधर।
२१ फरवरी है आज। आज से पाँच साल पहले उसने यहीं, इसी वेटिंग रूम
में कुछ देर ठहर कर बनारस वाली गाड़ी पकड़ी थी। ठीक ही कहा गया
है, इतिहास अपने को दुहराता है।
चित्रा से उसकी पहली भेंट भी इसी
२१ फरवरी को हुई थी। उन दिनों ये यहाँ कॉलेज के एक ही वर्ष में
थे। विषय था दर्शन शास्त्र। एम. ए. के अंतिम वर्ष तक पहुँचते हुए
उन्होंने सारा जीवन एक साथ व्यतीत करने का निर्णय कर लिया था।
नीरज का घर बनारस में था। पिता
वहाँ बनारसी साड़ियों का अच्छा-ख़ासा कारोबार करते थे। यहाँ पटना
में वह मौसा-मौसी के घर में रहकर पढ़ रहा था। वे उसे बहुत चाहते
थे। मैट्रिक बनारस में उसने कर लिया, तो मौसी ने वहीं बुलाकर
कालेज में नाम लिखा कर अपने घर में रखा। उसकी मौसरे भाई-बहनों से
अच्छी पटती थी। वहीं से उसने एम. ए. किया और चित्रा का प्यार भी
प्राप्त किया। |