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आरा शहर। भादों का महीना। कृष्ण
पक्ष की अँधेरी रात। ज़ोरों की बारिश। हमेशा की भाँति बिजली का
गुल हो जाना। रात के गहराने और सूनेपन को और सघन भयावह बनाती
बारिश की तेज़ आवाज़! अंधकार में डूबा शहर तथा अपने घर में
सोये-दुबके लोग! लेकिन
सचदेव बाबू की आँखों में नींद नहीं। अपने आलीशान भवन के भीतर
अपने शयन-कक्ष में बेहद आरामदायक बिस्तरे पर अपनी पत्नी के साथ
लेटे थे वे। पर लेटनेभर से ही तो नींद नहीं आती। नींद के लिए -
जैसी निश्चिंतता और बेफ़िक्री की ज़रूरत होती है, वह तो उनसे
कोसों दूर थी।
हालाँकि यह स्थिति सिर्फ़
सचदेव बाबू की ही नहीं थी। पूरे शहर पर खौफ़ का यह कहर था। आए
दिन चोरी, लूट, हत्या, बलात्कार, राहजनी और अपहरण की घटनाओं ने
लोगों को बेतरह भयभीत और असुरक्षित बना दिया था। कभी रातों में
गुलज़ार रहनेवाला उनका यह शहर अब शाम गहराते ही शमशानी सन्नाटे
में तब्दील होने लगा था। अब रातों में सड़कों और गलियों में
नज़र आनेवाले लोग शहर के सामान्य और संभ्रांत नागरिक नहीं,
संदिग्ध लोग होते थे। कब किसके यहाँ क्या हो जाए, सब आतंकित
थे। |