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गांधर्व विद्या सिखाने के बहाने उदयन - वासवदत्ता को
मिलाने की योजना प्रद्योत ने बनाई। प्रद्योत के दबाव डालने
पर वासवदत्ता को वीणा सिखाने की स्वीकृति उदयन ने दे दी।
यहाँ भी प्रद्योत ने कपट चाल चली। कथा सरित्सागर लिखता है
कि, उदयन को बताया गया था कि उसकी शिष्या कुबड़ी है और
वासवदत्ता से कहा गया कि उसका वीणावादक गुरू कोढ़ी है।
श्री हेमचंद्र सूरी त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित' में
लिखते हैं कि वत्सराज से कहा गया कि शिष्या एक चक्षु
अर्थात कानी होने से सम्मुख आने में लज्जित होगी अत: पर्दा
लगा कर शिक्षण प्रारंभ हुआ।
जिस समय प्रद्योत गर्व और गौरव का अनुभव कर रहा था, उस समय
कौशांबी के प्रासाद और नगर दु:ख सागर में डूब गया था। तब
महामात्य यौगंधरायण ने अपने स्वामी को छुड़ाने की योजना बनाई।
उज्जयिनी में कौशांबी के गुप्तचर छा गए। एक पागल के वेश में
यौगंधरायण ने महाकाल मंदिर में शरण ली।
उदयन को पहले साधारण वीणा देने पर उसके तार टूट गए। तब
उन्हें उनकी हस्तिदंत वाली घोषवती वीणा दी गयी। प्रशिक्षण
के दौरान जब एक दिन कठिन बोलों को दोहराने में वासवदत्ता
असफल रही तो क्रोधित उदयन ने डाँटा, "अरी कुब्जे! तेरी
बुद्धि तो जड़ दिखाई देती है।" अपमानित राजकुमारी ने तैश
में उत्तर दिया, "हे कोढ़ी! राजकुमारी को कुब्जा कहते हुए
तुझे लज्जा नहीं आती?"
रोष में भरे उदयन ने जब पर्दा खींच दिया तो आमने सामने
अनिंद्य सुंदरी राजकुमारी और सुदर्शन राजपुरुष थे। पहली ही
दृष्टि में वे एकदूसरे को दिल दे बैठे। बंदीगृह में गुरू
शिष्या की पहली ऐतिहासिक प्रणय गाथा घटने लगी। शिष्या प्रेयसी
बन गयी। वासवदत्ता की सहमति से षडयंत्र का उत्तर षडयंत्र से
दिया गया। यौगंधरायण भी अपने नरेश से सम्पर्क साधने में सफल
हुआ। तब एक राजकुमारी साधारण प्रेमिका के समान भद्रवती नामक
हथिनी पर बैठ अपने प्रेमी उदयन के साथ कौशांबी के लिये भाग
निकली। उनके पीछे नलगिरि हाथी पर स्वर्णमुद्राएँ लिये महामात्य
यौगंधरायण और अंगरक्षक थे।
अवंति के युवराज पालक के नेतृत्व में सैनिकों ने उनका पीछा
किया। तब यौगंधरायण के स्वर्णमुद्राएँ फेकने पर अवांति के
सैनिक पीछा करने के बजाय उन्हें लूटने में व्यस्त हो गए।
कथासरित्सागर के अनुसार युवराज गोपालक ने पिता का आदेश
बताकर पालक को पीछा करने से रोक दिया।
उदयन अपनी प्रेमिका के साथ सकुशल कौशांबी पहुँच गये।
सुमधुर वाद्यसंगीत और आनंदोत्सव के मध्य इतिहास के पहले
प्रेमी उदयन और प्रेमिका वासवदत्ता का प्रेम विवाह संपन्न
हुआ।
ईसापूर्व की छठी शताब्दी की यह प्रणय कथा इतनी लोकप्रिय
हुई कि सदियों तक साहित्यिक कृतियों, लोकगीतों, लोक-कथाओं
और चौपालों की चर्चा में गरम रही। महाकवि भास ने इस पर
प्रतिज्ञा यौगंधरायण नाटक लिखा। स्वप्न वासवदत्ता नामक
नाटक भी लिखा गया। एक हज़ार वर्ष बाद कवि कालिदास ने
मेघदूत में इसका उल्लेख करते हुए लिखा है कि उज्जयिनी के
गाँव की चौपालों पर ग्रामीण जन आज भी वासवदत्ता उदयन की
प्रेमकथा रस ले लेकर गाते हैं।
ईसा के बाद की छठी सदी में बाणभट्ट ने हर्ष चरित में भी
इसका उल्लेख किया है। ग्यारहवीं सदी के आचार्य हेमचंद्र
सूरी ने भी इसे अपनी रचना का विषय बनाया। विष्णु पुराण,
ललित विस्तार, कथा सरित्सागर, वृहत्कथा मंजरी, नेपाली
वृहत्कथा, लोक भाषा पाली के 'उदेनवत्थु' एवं तित्थोगलि
पन्नई भी इससे अछूते नहीं रहे। वासवदत्ता उदयन के पलायन
दृष्य को एक कलाकार ने नागार्जुन कोंडा के एक गुफा मंदिर
में उत्कीर्ण कर अमर कर दिया है।
इस प्रकार पहली सत्य प्रेमकथा इतिहास, साहित्य और कला की
धरोहर बन गयी। |