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अपनी व्हील चेअर पर
आहिस्ता-आहिस्ता हाथ चलाता वह आर्मी अस्पताल के वार्ड, कमरों
में ज़ख्मी-बीमार जवानों के पलंग के साथ-साथ हालचाल पूछता
आगे बढ़ता रहता। यह उसका अस्पताल में प्रवेश के बाद पहला काम
होता। कोई पत्र न लिख सकने की स्थिति में होता तो कह देता
"चाचा, मैं ठीक हूँ, लिख देना"। चाचा गोद में रखी डायरी
उठाता, पेन उठाता पता लिख लेता।
वह यहाँ चाचा व्हील चेयर वाला चाचा ही जाना जाता है उसका कोई
नाम, रैंक, गाँव, कोई रिश्तेदार है, कोई नहीं जानता।
जब से कारगिल में घुसपैठियों
से फौज की मुठभेड़ हो रही है वह बहुत चिंतित हो गया। उसके
कानों से छोटा-सा ट्रांजिस्टर लगा ही रहता।
टी.वी. पर भी देखता रहता, बर्फ़ीले शिखर, खाइयाँ, बन्दूकें
उठाए वीर जवान देख उसकी आँखों में वैसे ही दृश्य तैर जाते
कानों में धमाके समा जाते। उन शिखरों खाइयों से उसका भी गहरा
नाता है। वहाँ दुश्मन घुस आए। उसकी बाहें इस उम्र में भी
झनझना उठती हैं, उसकी आधी जांघों में भी हरकत हो जाती है।
ज़ख्मी अस्पताल में आ रहे
हैं... शहीदों के शव लाए जा रहे हैं बड़े हौसले से माँ बाप
कहते हैं, ''''एक बेटा क्या, सब न्योछावर कर सकते हैं देश
पर'' ''धन्य हो धन्य हो'''' वह बड़बड़ाता रहता। ''जाने मेरा
शेर पुत्तर आर्मी में गया या नहीं। |