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माटी की गंध

भारतवासी लेखकों की कहानियों के संग्रह में इस सप्ताह प्रस्तुत है
इलाहाबाद से राजेन्द्र यादव की कहानी 'अक्षय धन'


मुंशी निरंजन लाल शान्त प्रकृति के व्यक्ति थे। दुनिया की रफ्तार के साथ उनका कोई तादात्म्य नहीं था। उनकी तो बस अपनी ही रफ्तार थी। यद्यपि बाबू किशन लाल की मृत्यु के बाद से घर की सारी जिम्मेदारी उनके ऊपर ही आ पड़ी थीं, किन्तु उनका जीवन जीने का अपना तरीका था। बाबू किशन लाल पटवारी के रूप में ख्याति के साथ ही लक्ष्मी के भी काफी निकट थे किन्तु मुंशी निरंजन लाल स्थितप्रज्ञ थे।

मुंशी निरंजन लाल की शिक्षा विभाग में प्रथम तैनाती डिप्टी साहब के रूप में हुई। घर वालों की बाँछे खिल गयी थीं। सभी ने सोचा था कि परिवार के मुखिया बाबू किशन लाल का जमाना इस परिवार में पुनः लौट आयेगा, पर ऐसा नहीं हो सका। कुछ सालों तक तो यह पता ही नहीं चला कि लक्ष्मी जी इस परिवार से रूष्ट हो गयी है। किन्तु डिप्टी साहब की बाइस सालों की सेवा में पूरे परिवार का उत्साह आखिरकार ठण्डा पड़ ही गया था।

डिप्टी साहब निर्विकार भाव से नौकरी करते। समय–समय पर विभाग की कम–अधिक रफ्तार का उनके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। नौकरी के शुरूआती दिनों में ही उन्हें यह विभाग जम गया था। उनके साथ के कई डिप्टी साहब अफसर बन कर आ गये थे, किन्तु इससे भी उन्हीं के भाव को स्थायित्व मिला था। किसी में इनकी रफ्तार बढ़ाने की हिम्मत ही नहीं थीं। डिप्टी साहब का पद उन्हें ईश्वर प्रदत्त लगता, फिर दूसरे पद की चाह मन में आना उनके लिए पाप के सदृश्य था।

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