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माटी की गंध

भारतवासी लेखकों की कहानियों के संग्रह में इस सप्ताह प्रस्तुत है
चंडीगढ़ से डा. नरेश की कहानी 'ममता'


ताई बचनी ने कथा पर जाने के लिए अपने घर का दरवाजा खोला तो उसकी भवें तन गईं। एक बीमार पिल्ला उसकी दहलीज़ से सिर टिकाए पड़ा था। ताई की कैंची–सी ज़बान तुरन्त चल निकली,
"मरें हरामज़ादे, सुअर की औलाद। इस मुहल्ले के लड़कों को सोकर जागना नसीब न हो। पैदा करने वाली हरामनें भी नहीं दिखती कि औलाद मुहल्ले में क्या खाक उड़ाती फिरती है। कोख से निकाला, फेंक दिया गली में। कर गए मुए मेरा धर्म भ्रष्ट।"

मुहल्ले वालियाँ ताई के स्वभाव से भली–भाँति परिचित थीं। अतः उसकी आवाज़ पर किसी ने ध्यान न दिया। एक भी चेहरा किसी मकान की खिड़की से यह झाँकने तक को न निकला कि माजरा क्या है। ताई ने कुशल योद्धा की तरह इधर–उधर देखा और अनुमान लगाया कि तलवार हवा में चल रही है तो उसने अपना ध्यान पिल्ले पर केन्द्रित कर लिया।

"चच्–चच्–चच् . . .हट।" ताई ने दाएँ हाथ से उसे भगाते हुए रट लगाई।
"दुर . . .दुर . . .अबे हट जा।"
लेकिन पिल्ला टस से मस नहीं हुआ। यहाँ तक कि उसने आँख उठाकर भी नहीं देखा कि उसे कौन पुकार रहा है। कुछ क्षण अहिंसात्मक प्रयत्न कर के ताई के भीतर हिंसात्मक भावना जाग उठी। वह भीतर से झाडू उठा लाई। झाडू चलाने से पहले उसने एक बार फिर कोशिश की कि पिल्ला बिना मार खाए ही उठ जाए।

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