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कहानियाँ   

समकालीन हिन्दी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
भारत से तरुण भटनागर की कहानी— ढँकी हुई बातें


उस रोज जब बीजू आया, मैं पहले पहल उसे पहचान नहीं पाया। मैं उसके इस तरह आने के लिये तैयार नहीं था। ऐसा कोई कारण भी नहीं था कि वह दुबारा आता। वह भी पूरे बारह सालों के बाद एक दिन अचानक। पर ऐसा भी नहीं सोचा था कि वह इतना विस्मृत हो जाएगा कि वह मेरे सामने खड़ा हो और मैं कुछ क्षणों को उलझ जाऊं कि वह कौन है? उस दिन तेज गर्मी पड़ रही थी। वह शायद देर तक बाहर खड़ा रहा था। कॉलबेल खराब हो गई थी और कुंडी खड़खड़ाने की आवाज़ कूलर की आवाज़ में गुम हो गई थी।
"क्यों डाल दिया न चक्कर में ...।"

मैं उसे पहचानने के असमंजस में था। पर उसकी सहजता ने मुझे सतर्क कर दिया। मैं उसे पहचाने बिना मुस्कुरा दिया।
"क्यों भूल गए।"
"तुम, अरे ...।"
"मुझे बीजू कहते हैं।"
"अरे यार तुम भी ...।"
वह मेरा असमंजस जान चुका था। वह पहले भी ऐसा ही था। वह भाँप लेता था कोई मुखौटा लगाएँ तब भी वह जान जाता था। मुखौटा लगाने पर भी आँख कान बाल वगैरा खुले रहते हैं। बीजू के लिए इतना पर्याप्त होता था ...भाँपने के लिए।

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