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दिवाली का दिन। चीना पीक की जानलेवा चढ़ाई को पार
कर जुआरियों का दल दुर्गम-बीहड़ पर्वत के वक्ष पर दरी बिछाकर बिखर गया था। एक ओर एक
बड़े-से हंडे से बेनीनाग की हरी पहाड़ी चाय के भभके उठ रहे थे, दूसरी ओर पेड़ के
तने से सात बकरे लटकाकर आग की धूनी में भूने जा रहे थे। जलते पशम से निकलती भयानक
दुर्गंध, सिगरेट व सिगार के धुएँ से मिलकर अजब खुमारी उठ रही थी।
नैनीताल से चार मील दूर, एक बीहड़ पहाड़ी पर जमा यह अड्डा आवारा रसिकजनों का नहीं
था। सात-आठ हज़ार से कम हस्ती का आदमी वहाँ प्रवेश भी नहीं पा सकता था। टेढ़ी खद्दर
की टोपी को बाँकी अदा से लगाए तरुण नेता महिम भट्ट, भालदार कुंदन सिंह, कुँवर
लालबहादुर, सुंदर जोशी आदि एक से एक गणमान्य व्यक्ति, महालक्ष्मी का पूजन-प्रसादी
ग्रहण कर अपने गुप्त अड्डे पर पहुँच जाते। छाती से ताश की गड्डी चिपकाकर। टेड़ी
आँखों से दूसरे खिलाड़ी के पत्तों की ग्रह स्थिति भाँपना, झूठी गीदड़ भभकियाँ देकर
चालें चलना, उन सिद्धहस्त पारंगत खिलाड़ियों के बाएँ हाथ का खेल था। उस दायरे में प्राय: आठ-दस ही खिलाड़ी रहते, क्योंकि चीना पीक के उस बादशाही खेल की चालें चलना
हर किसी के लिए संभव नहीं होता।
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