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कहानियाँ  

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
भारत से  मीरा कांत की कहानी— विसर्जन

शहर छोड़ने से पहले एक अंतराल आता है, जब असल में हम वह स्थान छोड़ चुके होते हैं। बस वहाँ होते हैं क्योंकि होना होता है। वह समयावधि 'नो मेन्स लैंड' की तरह होती है। कभी-कभी ज़िंदगी का एक ख़ासा बड़ा टुकड़ा कोई 'नो मैन्स लैंड' की तरह ही जी रहा होता है और जीता चला जाता है।

बंसी ने जरा उचककर खिड़की से बाहर झाँका तो बॉटल ब्रश की झुकी शाखाओं को छूकर आती हवा ने उनके बाल छितरा से दिए। वह खड़े हुए। नाक पर चश्मा कुछ ठीक किया और ठहरकर पेड़ को देखा। उन्हें चिढ़ाने के लिए बॉटल ब्रश को कबीर हमेशा वीपिंग विलो कहता था, विपिंग विलो, आपका रोंदू! हवा के अगले झोंके के साथ ही एक परास्त-सी मुस्कान उनकी सारी देह को स्पर्श कर वापस खिड़की से बाहर हो गई - पेड़ के उस पार तक, जहाँ आज तलक वह लगभग पच्चीस साल पुराना एक दृश्य ठिठक खड़ा है।

एक विशालकाय हाथी की गर्दन पर बैठा तीन-चार साल का कबीर, जो लगभग लेटकर हाथी के पंखों जैसे कानों को छूने की कोशिश कर रहा है। कभी यह कान तो कभी वह कान। नन्हें-नन्हें हाथ उत्साह और विस्मय से कभी इस ओर जा रहे हैं, तो कभी उस उर। आँखें एकटक हाथी के उन हिलते कानों को देख रही हैं।

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