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थकी आँखों से उसने मोटे शीशों का चश्मा ऊपर खिसकाया
था। कोट उतार कर कुर्सी पर रखा और हाथों के दस्तानें निकाल कर नीचे टोकरी में फेंके
थे। वाशबेसिन में हाथ धोए दो बार-तीन बार। आँखों पर ठंडी हथेलियों का स्पर्श सुहाया
था। अपना बैग उठाकर बाहर आया था। ड्राइवर ने उसे देखते ही उचक कर उसके हाथों से बैग
लिया। गाड़ी का दरवाज़ा खोला। उसका बैग रखा और दरवाज़ा बंद करके अपनी सीट पर बैठ गया।
स्टार्ट की थी।
'साब घर चलूँ?'
'हाँ भाई।'
उन्होंने घड़ी देखी, '10' बज चुके थे। अब और कहाँ जाएगा? वैसे भी कहाँ जाता है वह।
उसने सोचा था। इतना लंबा दिन, पाँच घंटे का कांप्लीकेटेड ऑपरेशन। उफ! सारा दिन
खड़े-खड़े उनकी टाँगें दुख रही थी। सिर और आँखें पथरा-सी गई थीं। जल्दी से घर पहुँच
कर सोया जाए। भूख भी अब तो मर चुकी थी। झटके से अचानक गाड़ी रुकी तो उन्होंने आँखें
खोली थीं। शायद उन्हें झपकी आ गई थी। इतना ट्रैफ़िक इस समय। कुछ समझ में नहीं आया
कि वे कहाँ हैं। क्या बजा होगा? उसने दुबारा घड़ी देखी थी। सड़कों पर भीड़ थी।
ट्रैफ़िक धीमी गति से रुक-रुक कर खिसक रहा था। दुकानें अभी खुली थीं। दुकानों पर और
सड़कों की पटरियों पर अनेकानेक वस्तुएँ सजी थीं। ख़रीदने वालों और बेचने वालों की
भीड़-भाड़ और चहल-पहल थी। दुकानों पर और सड़कों के बीचो-बीच दिल के आकार के गुब्बारों,
रंग-बिरंगे चमकीले काग़ज़ों की लतरें बड़े-बड़े पोस्टर और बैनर चिपकाए और लटकाए गए
थे। छोटे-बड़े रेस्तराँ में खूब भीड़ थी।
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