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दशहरे का दिन था। सुबह से ही परिवार में उत्साह था। माँ पड़ोस से गोबर ले आई थी।
उससे रावण के दस सिर बनाए जाने थे। पिता पिछली शाम को ही गन्ना और लौकी ले आए थे।
गन्ना दशहरे के दिन पूजा में रखा जाता है। लौकी रायते के लिए आई थी। माँ ने रात में
ही दही जमा दिया था। दही के बर्तन को उन्होंने आटे के कनस्तर में रखा था ताकि थोड़ी
गर्मी मिले और दही अच्छा जम जाए।
हम भाई बहनों को उठते ही उन्होंने दही के दर्शन कराए और फिर कहा, "आया जो भैया
पायता, राम खिलाए रायता।" हम सब भाई बहनों ने समवेत स्वर में यह दोहराया। हल्की-सी
खटास लिए मीठी दही का स्वाद हमारे मुँह में भर गया। छोटा तो सचमुच अपने नन्हें
होठों पर जीभ फिराने लगा।
सर्दियाँ शुरू नहीं हुई थीं। दिन में धूप अब भी चुभती थी, लेकिन रात होते ही
हल्का-सा जाड़ा बढ़ने लगता। हम लोग स्वेटर पहनकर रामलीला देखने जाते। तभी
मूँगफलियों का मौसम शुरू होता। भड़भूजे रामलीला स्थल के बाहर मूँगफलियों का ढेर
लगाए बैठे रहते। ढेर के बीचोबीच एक कुज्जे में हल्की आँच रहती। भड़भूजा गरम
मूँगफलियाँ ग्राहकों को देता। हम मूँगफलियाँ खाते हुए रामलीला देखते। तब हमारा
सोने और उठने का ढर्रा गड़बड़ा जाता और देर से उठने पर हम पिता से डाँट खाते।
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