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कहानियाँM  

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से
रवीन्द्र बत्रा की कहानी- 'जिंदगी जहाँ शुरू होती है'


इस दुनिया में रोटी कमाने के लिए जो काम आमतौर पर किए जाते हैं, वैसा कोई काम भजनी नहीं करता था। पहले–पहले भजनी को देखने वाला सोच सकता था, कि उसकी जिंदगी के कुछ ही दिन शेष बचे हैं। उसका शरीर इतना अशक्त था, कि मुश्किल से वह अपने काम करता। अक्सर उसके हाथ काँपते रहते और कमर झुकी होती। बाल अस्त–व्यस्त रहते और आँखों पर चश्मा चढ़ा होता, जिसे भजनी बार–बार ठीक करके इस तरह देखता, जैसे देखने के लिए उसे बहुत मेहनत करनी पड़ती हो।

दिन भर भजनी का यही हाल रहता। पर रात की महफिल में ढोलक की थाप पड़ते ही, भजनी के मरियल जिस्म में जैसे बिजली कौंध जाती। हारमोनियम पर सुर छेड़ते हुए रागों और रागिनियों के आकाश में भजनी यहाँ से वहाँ उड़ता रहता। न आसपास की खबर होती, न पास–पड़ोस की। तब भजनी को न तो किसी सहारे की जरूरत रहती और न ही बार–बार अपना चश्मा ठीक करने का खयाल आता। उसके गले की नसें सितार के तार की तरह तनी होतीं और उसकी आवाज समुंदर की लहरों की तरह उठती–बैठती।

मजाल है महफिल में कोई गलत सुर लगा दे, भजनी उसके रुआँसा होने तक
लताड़ लगाता रहता। फिर आइंदा गलती न करने की हिदायत देता और महफिल फिर से शुरू हो जाती।

यह गायन–वादन का सिलसिला सुबह तक चलता और उगते सूर्य की रौशनी जैसे भजनी की फिर से सारी ताकत सोख लेती। दिन भर अशक्त–सा और चलने से लगभग लाचार भजनी, शाम को मंडली के आते ही जैसे शेर हो जाता।

खूबसूरत तो भजनी किसी सूरत में नहीं था, बल्कि कहना चाहिए कि सुंदर होने के जो पैमाने होते हैं, उसके हिसाब से बहुत कुछ कुरूप था भजनी। पर उसकी यही कुरूपता मानो उसके संगीत में सुंदरता भरती थी। जब संगीत की मस्ती उस पर छा जाती, तो उस समय उसका चेहरा ऐसे दपदपा रहा होता, कि लगता दुनिया में सबसे सुंदर वही है। पैसा भी उसके पास इतना ही होता था कि बस किसी से माँगने की जरूरत नहीं होती थी। लेकिन एक संतोष था, एक शांति थी। हाँ, एक उतावलापन भी था और आवेश भी। वह तब, जब वह गा या बजा रहा होता। एक पागलपन भी था भजनी में, जिसके एक छोर पर उसकी बेटी सुमित्रा खड़ी थी और दूसरे छोर पर उसका संगीत था। शायद उसे खुद से इतना प्यार नहीं था,
जितना सुमित्रा और संगीत से।

एक तरह से, उस हवेली और भजनी की स्वामिनी उसकी बेटी ही थी। भजनी ठीक उसी तरह से रहता, जैसे उसकी बेटी चाहती। वही काम करता जो बेटी कहती। बेटी ने जो कहा, सब सच। बेटी ने जो कहा, वही ब्रह्मवाक्य। बस संगीत के मामले में वह कभी–कभार बेटी का कहना भी टाल जाता। लेकिन बाप–बेटी में इतना सामंजस्य था कि सुमित्रा भी संगीत के मामले में कभी भजनी को न टोकती। बल्कि सहयोग ही करती। जितना लगाव भजनी को संगीत से था, उतना ही लगाव बेटी को नृत्य से था। भजनी को बेटी का नृत्य पसंद था और बेटी को पिता का संगीत।

साँझ ढले जब सूरज अपनी गुफ़ाओें में जा रहा होता और धरती पर अँधेरा अपने पैर पसार रहा होता, भजनी के शरीर में जैसे जान आ रही होती। उसकी बेटी के पाँव धरती पर थाप देने लगते। महफिल जमने से पहले ही अनजाना–सा संगीत हवाओं में बहने लगता और महफिल जमने के कुछ समय बाद ही भजनी और उसकी बेटी किसी और ही दुनिया के हो
जाते। हो सकता है, आपका मनोविज्ञान भजनी को कुछ विक्षिप्त समझे, पर न जाने क्यों मुझे उसका यह सूफियाना स्वभाव अच्छा लगता। भजनी का यह पागलपन बार–बार मुझे आकर्षित करता।

भजनी के दादा इस छोटी–सी रियासत के राजा थे और यह रियासत उसके पिता से होती हुई उस तक पहुँची थी। आज़ादी के बाद जब राजे–रजवाड़े खत्म कर दिए गए, रामधन ने भी इसे चुपचाप स्वीकार कर लिया। वैसे भी राजा होना रामधन के स्वभाव में नहीं था। माँ–बाप की इकलौती संतान थे और बचपन से ही सबके लाड़ले रहे। कुछ जमीन थी, जो बटाई पर दी हुई थी और इसी से भजनी का खर्च चलता था। शाम को जब संगीत की महफिल जमती, तो चाय–पानी का इंतज़ाम सुमित्रा के ही जिम्मे होता। भजनी अपनी बेटी को दीदी कहता और देखा–देखी सुमित्रा मानो सबकी दीदी हो गई थी। भजनी अक्सर चिरौरी करता, दीदी एक कप चाय मिलेगी। अक्सर सुमित्रा चाय ले आती, पर कभी–कभी इनकार भी कर देती। तब काँपते हाथों से भजनी दो कप चाय बनाता, एक कप सुमित्रा को देता और एक कप खुद पीता। शाम के समय जब महफिल जमती, सुमित्रा उनींदी आँखें लिए तब तक बैठी रहती, जब तक नींद बेसुध न कर दे। कभी–कभार जब वह खुश होती, वह भजनी के संगीत पर नाचती रहती और तब संगीत की गंभीर बैठक, हँसी–मज़ाक की महफिल में बदल जाती। भजनी अपनी भुजाएँ फड़का–फड़का कर ढोलक बजाता और सुमित्रा से नाचने के लिए विनय करता। हालाँकि सुमित्रा खुद बड़ी मुश्किल से अपने पाँव रोक पाती, पर पिता से चिरौरी कराने में उसे मज़ा आता। वह जानबूझ कर तब तक खुद को रोके रखती, जब तक भजनी गिड़गिड़ाने न लग जाता। उसके बाद तो महफिल में कभी नृत्य और संगीत की बिजलियाँ
कौंधती, कभी तूफ़ान की गड़गड़ाहट और कभी नदियों की कल–कल गूँजती।

आस–पास के गाँवों में जब भी कोई संगीत की महफिल जमती, भजनी उसका मुख्य हिस्सा होता। जहाँ सुर और ताल का कोई विवाद होता, फैसला भजनी को ही करना पड़ता। भजनी के बाद कहीं अन्याय की गुंजाइश न रहती। किसी को शिकायत न होती। मानो संगीत का उद्भव भजनी ने ही किया हो। दुनियादारी से दूर भजनी का मन करता, तो अपने साजिंदों के साथ किसी उत्सव या बच्चे के मुंडन संस्कार पर भी पहुँच जाता। रात भर महफिल वहीं जम जाती। मन न करता तो लाख बुलाने पर भी किसी के यहाँ न जाता। भजनी की संगीत की महफिल का मुख्य स्थान तो उसकी हवेली ही थी।

आमतौर पर भजनी उन सभी कामों से दूर ही रहता था, जो चाहे–अनचाहे आम आदमी को करने होते हैं। लेकिन एक काम तो भजनी को करना ही था। वह था, अपनी बेटी सुमित्रा की शादी। हालाँकि भजनी का बस चलता, तो कभी बेटी को खुद से दूर न करता। भजनी जब भी शादी के बारे में बात करता, सुमित्रा नाराज हो कर कहती, "खबरदार आपने मेरी शादी के बारे में बात भी की तो! मेरे बाद आपकी देखभाल कौन करेगा!" पर यह भी संभव नहीं कि सुमित्रा आजीवन इसलिए शादी न करे, कि भजनी की देखभाल के लिए कोई दूसरा नहीं है।

सो भजनी बेटी की शादी के लिए चिंतित था। हालाँकि भजनी में बेटी के लिए दुल्हा तलाशने जैसे दुनियादारी के काम की कोई योग्यता नहीं थी। न ही उसे मालूम था, कि आज के हिसाब से लड़के में क्या गुण देखे जाने चाहिए, ताकि वह उसकी बेटी का ख्याल रख सके। शायद यह भजनी के लिए दुनिया का सबसे कठिन काम था। न तो भजनी आजकल के तथाकथित अमीर और कमाऊ लड़कों को पसंद करता था, जो पत्नी को दासी समझते हैं, न ही उन नकारा लड़कों को, जो काम–धाम कुछ करते नहीं, बस डींगें हाँका करते हैं। भला अपनी रोटी जितना तो कमाना ही चाहिए। फिर भजनी का वास्ता तो संगीत से था। सो लड़का ऐसा भी होना चाहिए, जिसे संगीत की कुछ थोड़ी–बहुत तो तमीज हो। अब भला जो संगीत में बेसुरा हो, उसके साथ सुरीली जिंदगी की कल्पना कैसे की जा सकती है! इतनी दूर भी न हो कि भजनी अपनी बेटी से मिलने का मोहताज हो जाए।

अब इन सब शर्तों का पालन करने वाले लड़के का मिलना कोई आसान काम तो था नहीं। सो एक तरफ जहाँ भजनी की चिंता बढ़ती जा रही थी, वहीं दूसरी तरफ वह यह भी सोच रहा था, कि अगर एक–आध गुण न भी मिले तो कोई बात नहीं, वह समझौता कर लेगा। लेकिन ठीक–सा लड़का मिले तो सही! इधर सुमित्रा से जब भी इस मामले पर बात करता, उसकी एक ही तोता रटंत होती, "मेरे बाद आप का ख्याल कौन रखेगा?"

भजनी का बस चलता तो अपने किसी साजिंदे से ब्याह देता सुमित्रा को। पर दुनिया का दस्तूर ऐसा कहाँ है। लोग क्या कहेंगे। रियासत न रही तो क्या हुआ, नाम के साथ राजा तो आज भी जुड़ा है। कई बार भजनी सोचता कि काश! उसके नाम के साथ यह नाममात्र की रियासत न जुड़ी होती तो किसी तरह के आडंबर की जरूरत न रहती। कहीं भी एक भला–सा लड़का देखता और उससे सुमित्रा को ब्याह देता। यह बड़े नाम का ही प्रताप है, कि कोई भला–सा लड़का उसकी बेटी का हाथ माँगने की हिम्मत नहीं करता।

फिर पता नहीं दामाद कैसा हो! कहीं वह सुमित्रा के नाचने, गाने और हँसने पर ही पहरे न लगा दे! बहुत हैं ऐसे आदमी, जो खुद चाहे जहाँ गुलछर्रे उड़ाते रहें, पर पत्नी को सात पर्दों के पीछे रखना चाहते हैं। हो सकता है, भजनी के पास भेजने में भी आनाकानी करते रहें। इस तरह तो उसका बेटी से मिले बिना जीवित रहना ही कठिन हो जाएगा।

दूसरे, भजनी को विवाह से पहले लड़की देखने आने वाले लड़के के परिवार की हरकतों का भी कुछ आभास था। भजनी को पता था कि लड़के वाले, लड़की देखने के नाम पर कैसी–कैसी बेहूदा हरकतें करते हैं। मानों विवाह न कर रहे हों, कोई
माल खरीद रहे हों। एक भरी–पूरी स्त्री को दासी की शक्ल में देखा जाता है। उसके कौशल की परीक्षा ली जाती है। जैसे कोई नौकर रख रहे हों। नख–शिख देखेंगे, कहीं कोई कमी तो नहीं। बाल लंबे हैं या छोटे। चाल कैसी है, लँगड़ाती तो नहीं, आँखें ठीक हैं या भैंगी हैं। खाना कैसा बनाती है, सीना–पिरोना जानती है या नहीं! चाहे खुद बंदर जैसे दिखते हों, दुल्हन के रूप में हूर ही चाहिए। यही सब बातें थीं, जो भजनी की सहनशक्ति से बाहर थीं।

इन्हीं दिनों भजनी से मिलने उसका पुराना शिष्य सारंग आया। सारंग हालाँकि भजनी के गाँव का नहीं था, पर एक दोस्त के कहने पर भजनी ने कुछ समय अपने साथ रख कर संगीत सिखाया था। सारंग बहुत ज़्यादा होशियार छात्र तो नहीं था, पर धीरे–धीरे उसने संगीत की तमाम बारीकियाँ सीख लीं थीं। संगीत सीखने के दौरान वह भजनी के यहाँ रहा। परंपरा में जैसा गुरु का मान किया जाता है, वह वैसा ही मान भजनी का करता था। बाद में उसने शहर में संगीत विद्यालय खोल लिया था। हालाँकि सारंग के आते ही एक बार भजनी के मन ख्याल आया था कि वह उससे सुमित्रा के बारे में बात करे, लेकिन दो दिन यों ही निकल गए और भजनी उससे इधर–उधर की बात ही कर पाया।

सारंग से बातचीत से पता चला कि उसका स्कूल ठीक से चल रहा है, हालाँकि धनवर्षा उस पर नहीं हो रही, पर गुज़ारा अच्छे से हो रहा है। भजनी ने यह भी महसूस किया कि सुमित्रा के सामने पड़ने पर सारंग कुछ हकबका जाता है। लेकिन भजनी भी संकोच करता रहा और अंततः तीसरे दिन सारंग ने जाने की इज़ाजत माँगी।

भजनी सोच ही रहा था कि सारंग से सुमित्रा के बारे में बात करे या न करे, तभी सारंग ने हिचकिचाते हुए कहा, "हालाँकि अपने गुरु से मुझे यह बात करते हुए संकोच भी हो रहा है, पर क्या करुँ कहना तो पड़ेगा ही। जब मैं यहाँ संगीत सीख रहा था, तभी से सुमित्रा को चाहता हूँ और उससे शादी करना चाहता हूँ!"

भजनी के तो जैसे मन की बात कह दी थी सारंग ने। इससे पहले कि भजनी पूछता, खुद सारंग ने ही बता दिया कि चाहे वह ज़्यादा अमीर नहीं है, लेकिन वह सुमित्रा को ठीक उसी तरह खुश रखेगा, जैसे वह भजनी के यहाँ रह रही है। न तो वह स्त्री को दासी बनाने में यकीन रखता है और न ही उसकी स्वतंत्रता खंडित करने में। सुमित्रा जब भी चाहेगी, वे भजनी से मिलने आते रहेंगे।

शायद भजनी को यही सब चाहिए था। आँसू भरी आँखों से उसने एक बार सारंग को देखा और फिर पीछे हवेली के मुख्यद्वार पर खड़ी सुमित्रा को। भजनी का सवालिया चेहरा देख, सुमित्रा झट से शरमा कर अंदर भाग गई। सुमित्रा के इस तरह भागने से भजनी को उसका जवाब मिल गया था। भजनी ने सारंग को इस शादी के लिए हाँ कह दी।

शादी दिन की रखी गई थी। चार–पाँच बजते–बजते, सुमित्रा डोली में बैठ अपने सुसराल विदा हो गई। आज पहला मौका था जब भजनी घर पर अकेला था। जैसे ही शाम ढली और रात का पहला प्रहर शुरू हुआ, भजनी के महफिल के साथी इकट्ठे होने शुरू हो गए थे। महफिल शुरू हुई। पर आज चाय पूछने और नृत्य के लिए सुमित्रा नहीं थी। कुछ ही देर बाद भजनी, जो दूसरों के बेसुरा होने पर चिल्लाता था, आश्चर्य की बात थी कि खुद ही बेसुरा होने लगा था। उसे समझ भी आ रहा था कि वह बेसुरा हो रहा है। अंततः न जाने क्या हुआ कि भजनी फफक–फफक कर रोने लगा।

महफिल में शरीक सभी लोग जान सकते थे, कि आज भजनी की हालत ठीक नहीं है। लेकिन क्या किया जा सकता था! एक–न–एक दिन सुमित्रा की शादी होनी ही थी। एक–न–एक दिन तो उसे अपने ससुराल जाना ही था। लेकिन भजनी भी अब कैसे जिएगा, जिस बेटी ने अब तक उसका ख्याल रखा, बल्कि जीवित रखा, अब वह यहाँ नहीं है। कभी आएगी भी, तो एकाध दिन के लिए। इस मौके पर दूसरों को समझाने के लिए जो भाषा बनी है, उस भाषा में भजनी को समझाया नहीं जा सकता था। साधारण भाषा और साधारण शब्द! घिसे–पिटे और बार–बार दोहराए गए शब्द। वे शब्द भला भजनी को सांत्वना कैसे दे सकते हैं! भजनी के साथी भी यह बात जानते थे। भजनी की समझदारी उनसे कुछ कम नहीं थी, कि उसे समझाना पड़े। फिर समझने से भी क्या होगा। बेटी से बिछुडने की पीड़ा सहने की तो भजनी को धीरे–धीरे आदत पड़ेगी। हालाँकि सुमित्रा की ससुराल कुछ ज़्यादा दूर भी नहीं थी। पर आज शादी का दिन और सुहागरात। यह संभव ही नहीं था, कि भजनी इन क्षणों में अपनी बेटी से मिल पाता।

भजनी के साथी अभी यह सोच ही रहे थे, कि हवेली के बाहर कोई वाहन आकर रुका। छम–छम पायल बजाती सुमित्रा आगे–आगे और सारंग पीछे–पीछे, लगभग भागते हुए, हवेली की सीढियाँ चढ़ते हुए, वहाँ तक पहुँचे जहाँ वे सब बैठे हुए थे। एक क्षण के लिए वहाँ बैठे सब लोग अचंभित रह गए। लेकिन अगले ही क्षण जब खिलखिलाती हुई सुमित्रा आकर भजनी के गले से लिपट गई, तो सबने राहत की साँस ली। तब सारंग ने बताया कि शाम से ही सुमित्रा उदास थी। सारंग को पता था कि सुमित्रा को भजनी की चिंता सता रही होगी। दूसरी तरफ यह शादी की पहली रात थी। सो सारंग ने निश्चय किया कि वह अपनी सुहागरात ख़ास तरीके से मनाएँगे। वह ख़ास तरीका यह होगा कि वह सुमित्रा की वह इच्छा पूरी करेगा, जिसके बारे में वह सारंग को बता नहीं पा रही।

थोड़ी ही देर में महफिल फिर शुरू हो गई। दुल्हन के लिबास में ही सुमित्रा ने खूब नृत्य किया। एक तरफ जहाँ भजनी अपनी भुजाएँ फड़का–फड़का कर ढोलक बजा रहा था, वहीं दूसरी तरफ सारंग ने हारमोनियम सँभाल लिया था। सारंग जब भी सुरों से भटकता, भजनी उसे ठीक उसी तरह डाँट भी रहा था, जैसे किसी छात्र को डाँटते हैं और सारंग भी अपनी गलती उसी तरह सुधार रहा था, जैसे कोई छात्र सुधारता है। पता नही क्यों सारंग संगीत का मास्टर होते हुए भी गलतियाँ करता रहा और भजनी भी सुधारता रहा। सुबह के चार बज चुके थे। भजनी ने भीगी आँखों से सारंग और सुमित्रा को विदा किया। आज भजनी को यकीन हो गया था, कि सुमित्रा के लिए सारंग का उसका चुनाव गलत नहीं था।

९ जुलाई २००६

 
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