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दशहरे की छुट्टियों में मैं गाँव
में था। घर-बार, बाग़-बगीचे, ताल-तलैये, बँसवारी अपनी जगह थे,
थोड़ी-बहुत आकार-प्रकार की भिन्नता के साथ। पुराने
संगी-साथियों में कुछ थे, कुछ काम-धंधे के वास्ते बाहर गए थे।
धान की कटाई हो चुकी थी। समीप के बाज़ार में बजते दुर्गापूजा
के नगाड़े, देर रात तक सुनाई देते। बरसात से धुले मौसम का
रंग-रूप निखरा हुआ था।
इस बार गाँव पहुँचने पर पहले जैसा उल्लास नहीं दिखा बाबू जी
में और न पट्टीदारी की भौजाई चहकती हुई आई थीं। दोनों मामा
मिलने नहीं आए थे। बहनें और जीजा भी नहीं।
यह नई बात थी। पता चला कि
रिश्तेदार और पट्टीदार मुँह फुलाए हैं। माँ-बाबू जी पर दोनों
मामा और बहनों की सोच का प्रभाव दिखाई दे रहा था। शायद उन
लोगों ने माँ-बाबू जी को भड़काया हो या दुनियादारी के कुछ
पाठों का पुनर्पाठ किया हो।
पट्टीदार की भौजाई के व्यंग्य
बाणों की चुभन इधर-उधर से महसूस कर मैं अंदर ही अंदर आहत होता
और कभी-कभी गुस्सा भी। मैं अफ़सर हूँ तो अपने लिए। अपने बीवी
बच्चों के लिए। मेरे लिए किसी ने क्या किया है? मैं स्वयं से
सवाल करता। |