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उसे धीरे-धीरे होश आ रहा था। उस ने जल्दी-जल्दी
अपनी आँखें खोलीं और बंद कीं, सिर अभी भी फिरकनी की तरह घूम
रहा था। उस ने कसकर अपने सीने को दोनों हाथों से दबा लिया। उसे
लगा कि कहीं दिल उछल कर बाहर न जा पड़े। यह क्या हो रहा है उसे.
. .क्या वह डर गया है? मंज़िल के इतने क़रीब आकर क्या वह हथियार
डाल देना चाहता है?
सिंगापुर छोड़ते समय पंद्रह अगस्त को उस ने
अपने सैनिकों से कहा- ''दिल्ली पहुँचने के अनेक रास्ते हैं और
दिल्ली अभी भी हमारा अंतिम लक्ष्य है।'' उस के बाद ही वह
सेगौन
जाने वाले विमान पर सवार हो गया था। सेगौन में उसे महत्वपूर्ण
कार्य निबटाने थे, कुछ ऐतिहासिक निर्णय लेने थे। वहाँ पर ही एक
ख़ुफ़िया योजना के तहत वह एक लड़ाकू विमान में जा बैठा था, जिस
की मंज़िल अज्ञात थी। दूसरे दिन हवा में एक ही ख़बर थी और
अख़बार की सुर्खियों में वह लड़ाकू विमान पहाड़ियों के बीच कहीं
दुघर्टनाग्रस्त हो गया। उस में सवार यात्रियों में से कोई भी
बचा होगा, इस की संभावना नगण्य थी। तब उस का दूसरा जन्म हुआ- 'रमाकांत
देशबंधु'।
यही तो था उस का नया नाम। पानी के जहाज़ से
वह बंबई पहुँचा। वहाँ एक कार पहले से ही तैयार थी। सैमसन के
साथ जो कि वास्तव में ड्राइवर तथा कुछ भी बन सकता था। उन की
मंज़िल दिल्ली थी- दिल्ली का लाल किला जहाँ हाथ में तिरंगा लेकर
उन्हें विजय परेड करनी थी। |