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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से कामतानाथ की कहानी— 'संक्रमण'


 

एकः बयान पिता

कहो तो स्टांप पेपर पर लिखकर दे दूँ, यह घर बरबाद होकर रहेगा, कोई रोक नहीं सकता। ज़िंदा हूँ इसीलिए देख-देखकर कुढ़ता रहता हूँ। इससे अच्छा था, मर जाता। या फिर भगवान आँखों की रोशनी छीन लेते। वही ठीक रहता। न अपनी आँख से देखता, न अफ़सोस होता।

मुझको क्या? मेरी तो जैसे-तैसे कट गई। क्या नहीं किया मैंने इस घर के लिए! बाप मरे थे तो पूरा डेढ़ हज़ार का कर्ज़ छोड़कर मरे थे। और यह आज से चालीस-पैंतालीस साल पहले की बात है। उस ज़माने का डेढ़ हज़ार आज का डेढ़ लाख समझो, लेकिन एक-एक पाई चुकाई मैंने। माँ के ज़ेवर सब महाजन के यहाँ गिरवी थे। उन्हें छुड़ाया। जवान बहन थी शादी करने को। उसकी शादी की। मानता हूँ, लड़का बहुत अच्छा नहीं था। बिजली कंपनी में मीटर रीडर था। लेकिन आज? बेटे-बेटियाँ अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे हैं। फूलकर कुप्पा हो रही है। पूरी सेठानी लगती है। मकान तो अपना है ही, बिजली फ्री सो अलग। जितनी चाहो, जलाओ। तीन-तीन कूलर चलते हैं गर्मियों में। जाड़ों में हर कमरे में हीटर। तनख़्वाह से ज़्यादा ऊपर की आमदनी होती है। दो-दो गाड़ियाँ हैं। एक स्कूटर और एक मोटर साइकिल। शादी हुई थी तो साइकिल भी नहीं थी घर में। इसी को कहते हैं, भगवान जिसको देता है, छप्पर फाड़कर देता है।

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