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हम तो इन गंदे नेटिब्ज को मालरोड पर जाने तक से नहीं रोक पाए। उन्होंने रोककर दिखा दिया था। मैं आपसे उन्नीस सौ चालीस की बात करता हूँ। तब मैं बीस बरस का जवान था। वे अंग्रेज़ी हुक्मरान तब इन हिंदुस्तानी नेटिब्ज को अच्छी तरह नहला धुलवाकर इस मालरोड को साफ़ पानी से धुलवाया करते थे। इनको तभी यहाँ पैर धरने का मौका मिलता था वरना किसी की क्या हिम्मत थी कि फूटी आँख भी इस मालरोड की तरफ़ उठाकर देखता। आप तो जानते हैं कि स्केंडल प्वाइँट के ठीक सामने मेरी दुकान है। तब यह किसी अंग्रेज़ साहब की ही थी। मेरा कोई बुजुर्ग तब वहाँ नौकर रहा होगा। पर सच कहूँ, हम लोग वहाँ दुकान करने के काबिल तो क्या चलने-फिरने के काबिल भी नहीं हैं। यह भी क्या हुआ, आज हर ऐरा-गैरा नत्थू खैरा इसी मालरोड को अपने गंदे जूतों तले रौंदता फिरे। मुझे आपको यह बताते हुए शर्म आती है कि इसी मालरोड पर यह लोग अब कुत्तों की तरह टाँग उठाकर मूतते जीभ निकालकर थूकते फिरते हैं। साहबों, तब की तो बात ही क्या थी, जिस किसी को वहाँ से गुज़रना होता था, उसे पैरों में अंग्रेज़ साहबों की दुकान से ख़रीद जूते पहन कर ही गुज़रना पडता था...

साहबों! आज अगर माल रोड की तरफ़ निकलें तो जहाँ यह मिनर्वा बुक हाउस है, ठीक उसी जगह पर तब एक अंग्रेज़ साहब सर जॉन एडवर्ग की जूतों की दुकान होती थी। मिनर्वा शूज कंपनी! लंदन में बने एक से एक जूते चार आना, छः आना में मिलते थे। वाह साहब! क्या तो उन जूतों की चमक थी और क्या तो वे मालरोड पर चलती बार खनक देते थे। क्या उस दुकान की सजावट थी। आँखें चुँधिया जाती थी। साहबों आँखें चुँधिया जाती थीं। एक जूते से दूसरे जूते पर नज़र फिसलती थी। अब बोलो तो उस रौनकदार जगह पर किसी हिंदुस्तानी नैटिव सिरफिरे ने किताबों की दुकान खोल ली। किताबों की! कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया इन लोगों ने उस अंग्रेज़ी साहबीयत की सारी संस्कृति को। उस चमचमाती दुकान की जगह किताबों की दुकान। इस पर मैं बोलूँ तो आखिर बोलूँ क्या? आप समझदार साहब हैं। खुद सोचिए और विचार करिए। क्या आपने इस उमर तक आने पर कोई किताब जूतों की तरह पहनी है।

जूते की जगह किताब का क्या मतलब? तभी तो मैं कहता हूँ यह शहर उन्हीं के काबिल था। वे ही इस शहर में इस क्लब की स्थापना कर सकते थे। वे इन्साफ़ पसंद लोग थे। अगर सच कहूँ तो हम हिंदुस्तानी ठहरे लुटेरे और खाऊ लोग। किताबों पर लूटो, फायलों में खाओ, गाली देकर कमाओ, डराओ- धमकाओं, और खाओ। खाओ-खाओ। यह है हमारी संस्कृति। हम मुफ्तखोर लोग हैं। पैदा करते चलते हैं और बसाते चलते हैं। फिर चाहे इस शहर के पूरे जुग्राफिए पर ही नज़र क्यों न लग जाए। पहाड़ दर पहाड़ हम बस्तियाँ बसाते चल रहे हैं। हर कोई गंदे गाँवों से उठता है और इधर चला आता है। बसने के वास्ते। कभी रहने का शउर नहीं सीखा, खाने-धोने की तमीज़ तक नहीं सीखी, जूते पहनने का सलीका नहीं सीखा, पर चले हैं शिमला में बस आने के लिए। शहर की सारी खूबसूरती ही ख़त्म कर दी। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। मजाल थी कि अंग्रेज़ी साहबियत के वक्त कोई बंदा यहाँ ज़मीन पर एक ईंट तक तो रख देता। उन लोगों को तो इन नेटिब्ज की गंध तक पसंद नहीं थी और आज देखो... आज वे लोग इस शहर के कार-करिंदे बने बैठे हैं जो उन अंग्रेज़ी साहबों की टट्टी तक साफ़ करने के लिए तरसते थे।

मेरे प्यार साहबो, अब आप मेरी याददाश्त की दाद तो दीजिए मत। यह तो हमेशा से ही कमाल की रही है। पचास साल पहले भी यह उतनी ही थी जितनी कि आज है। इस वक्त है बल्कि जितनी यह सत्तर साल पहले रही होगी। मेरे दादा का नाम आपने ज़रूर सुना होगा। सरदार-बहादुर सरदार शमशेर सिंह अरोडा-रब्ब उन्हें अपनी गोद में जगह दे! उन्होंने 1890 की एक तस्वीर हमारे घर की दीवार पर टाँग रखी है। आप कभी मेरे घर आइए और देखिए उस तस्वीर को। अभी तक वह वैसे की वैसी ही टंगी हुई है। उतना ही साफ़ जितना कि यह तब रही होगी। एक सौ दस साल पहले की उस तस्वीर में नंगी सफ़ेद टाँगों वाली एक अंग्रेज़ लेडी विराजमान है। उनके दाएँ हाथ की तरफ़ एक झक्क सफ़ेद घोड़े की लगाम पकड़े अपने सरदार बहादुर सरदार शमशेर सिंह अरोडा खड़े हैं। उन्होंने एक लंबा कोट पहन रखा है और उनकी कमर झुकी हुई है। कभी खुद चलकर आप देखना। वे उस अंग्रेज़ लेडी की तरफ़ नज़रे गडाए मुस्कुरा रहे हैं। आपको ठीक-ठीक मालूम हो जाएगा वे लक्ष्मण की तरह सीता-माता के कदमों में देखते चले जा रहे हैं।

वाह साहब वाह! क्या तो उसक फ़ोटो की बैक ग्राउंड है। चारों ओर सदाबहार हरे-भरे पत्तों वाले पेड़ और बीचोंबीच वह रिक्शा खड़ी है, जिस पर वे लेडी विराजी हैं और इस ओर अपने सरदार-बहादुर। मोम की बनी होती थीं यह अंग्रेज़ी लेडियाँ। पैरों के सैंडिल का डिज़ाइन ही देखते बनता है। बाकी तो आप छोड़िए। अब आप ग़ौर से देखिए, दो हिंदुस्तानी नेटिव कुली उस रिक्शा को आगे से खींच रहे हैं, और वैसे ही दो पीछे से धक्का मार रहे हैं। पर अगर उस रिक्शा पर वह मेम न होती तो यह चारों क्या लगते? गधा गाडी खींचते चार नामालूम गधों की तरह। यह तो तब हालत थी हम हिंदुस्तानियों की। आज अपने आप को जो यह गर्व से हिंदू कहने वाले हैं उन सबकी और अपने ऊपर हम फ़िल्में बनाते हैं - सात हिंदुस्तानी, दस हिंदुस्तानी... साहबों, मुझे तो हँसी आती है। मैं आपके साथ उस तस्वीर की यादें ताजा कर रहा था।

साहबों, आपको तो शायद मालूम भी नहीं रहा होगा। शिमला शहर की इन ढलानों पर रिक्शा पर रिक्शा ढोने वाले इन नेटिव कुलियों को अपने वे फिरंगी हुकमरान बाकायदा लाईसेंस जारी करते थे। बहरहाल, आपको मालूम भी कैसे होगा। आप तो इस आज़ाद खाऊ मुल्क की पैदाइश हैं। मगर उनका डिस्सीप्लिन देखिए! कुली तक बिना लाईसेंस के इधर नहीं चल सकता था। आज देखिए, जिसकी मर्जी आती है मुँह उठाए इधर चला आता है। कहाँ गया वह सारा का सारा डिस्सीप्लिन? हर कोई आता है और कुलीगिरी करने लग जाता है। जैसे यह उसके बाप का शहर हो। यह तो उन्हीं फिरंगियों का जिगरा था कि बिना लाईसेंस इधर कुली भी पाँव नहीं धर सकता था। कोई नेटिव आदमी नाम का जीव इधर रिक्शा तक नहीं खींच सकता था। इन कुलियों की तो लाइसेंसशुदा वर्दी तक रहती थी। मैंने तो खैर खुद देखी है। आपको देखनी हो तो मेरे बंगले पर आइए और उस तस्वीर को भालिए। तो साहबो, क्या तो उनकी वर्दी थी। खाकी! पूरे की पूरी फौजी जवानों की तरह। फ्रॉक और चूडीदार। ऊपर सिर पर लाल पगडी। झालरवाली! छाती पर पहचान के लिए तांबे का नंबरशुदा तगमा। नीचे नंगे पाँव। जूता-मोजा पहनने की पूरी तरह मनाही। तस्वीर देखकर ही रूह खुश हो जाती है। ऐसा सीन तो लंदन में भी कहाँ रहा होगा। एकदम खिलौने से लगते यह नेटिव कुली। वाह साहबो वाह। वाह-वाह!

साहबो, उस रिक्शा के नीचे एक जंगली-सा कुत्ता भी है। जीभ निकालकर बैठा हुआ। पहली नज़र में तो आप को ग़लतफहमी भी हो सकती है कि अपने सरदार बहादुर उस कुत्ते की हालत पर ही तरस खा रहे हैं... (सामने दीवार पर टँगी घड़ी की ओर देखने के बाद भाषण फिर चालू होता है) ... तो साहबो, बातें बहुत हो गई। बारह बजने को आए। नया साल आने ही वाला है... अब मैं अपनी बात को समेटता हूँ। मैं आखिर में आपने अनुभव से ही कह रहा हूँ कि इस हिंदुस्तान की ग़रीबी की भी एक गंध है। उस गंध को आप इस ईलीट क्लब के अंदर बैठकर नहीं पहचान सकते, कभी आप मेरी ऐनक की दुकान पर आइए। कोई एक बंदा भीतर आएगा तो आपको उल्टी हो आने का मन होगा। फटे पुराने चिथडे पहने, उलझे बाल और चप्पलों से झाँकती फटी एडियाँ... मुझे तो लगता है यह पहाड़ी कभी नहाते धोते नहीं। हमारी तरह जीने की तो क्या सोचना... साहबो मेरे पास इस शहर के इतिहास और इसकी परंपरा की इतनी यादें हैं कि आप सुनते-सुनते थक जाएँ, पर देखिए घड़ी की सुइयाँ बारह के कितना पास हैं। जो बोले सो...
सरदार आया सिंह अरोडा के भाषण के समापन पर गुरु-गंभीर खामोशी छा गई थी। हिंदी के एक महत्वपूर्ण कवि ने कहा भी है कि खामोशी छा जाए जब मैं कविता पढ़कर लौटूँ। पाँच मिनट तक वैसी ही खामोशी छाई रही थी।

शिमला क्लब के जीवन में यह ऐतिहासिक खामोशी थी। ठीक बारह बजे हो-हल्ला और जाम परिदृश्य पर चले आए थे। तब आया सिंह अरोडा को उनके भाषण पर बधाइयाँ मिलने लगी थीं. आज जब वे इस संसार में नहीं है, तो यह जानकारी रुचिकर रहेगी कि तब मैं शिमला के इतिहास पर शोध कर रहा था। लगभग अढ़ाई-तीन सौ पन्नों का काम पूरा भी हो चुका था, किंतु आया सिंह अरोडा के इस भाषण को सुनने के बाद मैंने इन सारे पन्नों का पैकेट बनाकर रजिस्टर्ड डाक से उनके स्वर्गीय दादा शमशेर सिंह अरोडा के नाम प्रेषित कर दिया था। पैकेट के एक ओर प्रेषक का झूठा पता लिखकर।

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1 जनवरी 2007

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