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इसकी
महत्ता इस आकलन में भी है। इसी के चलते इस भाषण को यहाँ उद्धृत
करना ज़रूरी हो गया है। दरअसल उन दिनों मेरे सिर पर एक खब्त
सवार रहती थी। मैं अपने कोट की जेब में एक छोटा-सा
टेप-रेकार्डर रखता था और ऐसे हर मौके की ज़रूरी लगने वाली
आवाज़ों को उसमें रिकार्ड कर लिया करता था। यों तो शिमला क्लब
की वह पूरी शाम ही मेरे पास रिकार्ड है, किंतु जो ऐतिहासिकता
आया सिंह अरोडा के भाषण में है उसका कोई समानांतर नहीं है
इसलिए उसे बगैर किसी संपादन इत्यादि की औपचारिकता के मैं यहाँ
उद्धृत कर रहा हूँ -
साहबों! नया वक्त हम सबका
इंतज़ार कर रहा है...
(हाँ, एक ज़रूरी बात बताना मैं भूल गया हूँ। अरोडा जी का यह
भाषण लगभग ग्यारह बजे शुरू हुआ था और बारह बजने में चंद मिनट
पहले तक अविरल चलता रहा था। इस बीच संसार और इस क्लब की अन्य
सब आवाज़ें ख़ामोश हो गई थीं।) किंतु मैं कहना चाहता हूँ कि इस
क्लब के हम सब सदस्यों का इंतज़ार हर नया वक्त कुछ ज़्यादा ही
शिद्दत के साथ करता है। फिर आज हम सब तो इतिहास के एक ऐसे मोड़
पर खड़े हैं, जहाँ से पीछे मुड़ कर देखना बीती हुई खूबसूरतियों
को दोबारा देखने जैसा होगा। इसलिए भी और इसके बगैर भी यह
ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है कि आज के इस मौके पर मैं आप को उस
इतिहास में ले चलूँ जो हमारे इस महान क्लब की परंपरा के साथ
जुड़ा है। यही परंपरा और इतिहास हमारे इस क्लब को जीवन प्रदान
करते हैं।
जैसा कि आप
सब वाकिफ़ हैं इस क्लब की स्थापना सन 1837 में हुई थी। पौने दो
सौ साल पहले। किसी भी संस्था के जीवन में यह कोई बहुत छोटा
अर्सा नहीं कहा जा सकता। बाहर की सड़क पर चलते लोगों की भीड़
से छिटक कर आज जब हम सब इस क्लब के गेट को लाँघकर भीतर आ रहे
होते हैं तो यह जानकर ही आ रहे होते हैं कि इतने लंबे अर्से से
जीवित हम इस क्लब के माननीय सदस्य हैं। यह हम सबके लिए गरिमा,
अहं और गर्व का विषय है। मुझे ठीक से नहीं मालूम आज इस पहाड़ी
शहर की कितनी आबादी है। दो-तीन लाख से कम तो क्या होगी? पर आप
स्वयं देखिए और अपने भाग्य को सराहिए, कि इस क्लब के कुल जमा
तीन सौ-साढ़े तीन सौ सदस्यों में से आप भी एक हैं। और बाकी के
लाखों-लाख लोग इस क्लब के गेट के भीतर आना तो क्या,
ताकने-झाँकने तक की भी नहीं सोच सकते।
तो इतनी महान
संस्था का सदस्य होने का गर्व अगर हम ही लोग नहीं करेंगे, तो
कहिए हमसे ज़्यादा कृतघ्न आदमी इस शहर में कोई दूसरा तो नहीं
ही हो सकता। इतना मैं यकीन के साथ कहना चाहता हूँ। मैं एक और
बात यकीन के साथ कहता हूँ कि आप यह कभी नहीं जान सकते कि आखिर
इस क्लब की स्थापना हुई क्यों थी? आज यह जानने का कोई ज़रिया
मौजूद ही नहीं है। कुछ अनुमान है। कुछ कल्पनाएँ हैं। और कुछ
सुनी-सुनाई बातें हैं। इनके द्वारा हम यह सब जानने की कोशिश कर
सकते हैं। जिस समय इस क्लब की स्थापना हुई तब न तो मैं था और न
आप थे। और तो और तब पता नहीं हमारे दादे-परदादे-लक्कडदादे किन
अंधेरी खोहों में गुम थे? पता नहीं किन जंगलों में किस नंग-धडंग़
हालत में ज़िंदा थे। हां, वे हमारी तरह तो बिल्कुल ही नहीं थे।
हमारी तरह! हम जो आज बिल्कुल उन अंग्रेज हुक्मरानों की तरह जी
रहे हैं, जिन्होंने पौने दो सौ साल पहले इस क्लब की स्थापना
अपने वास्ते की थी। तब हमारे वे पूर्वज बेचारे... पर आज के इस
खुशनुमाँ मौके पर उनकी बात करके भला ज़ायका क्यों ख़राब किया
जाए।
अंग्रेज़
साहेब लोग थे। इस कौम के हुकमरान थे। सात समंदर पार से हुकुम
ज़माने यहाँ आए थे। यह उन्हीं लोगों का जिगरा था कि हमारी इस
कौम पर वे राज कर सकते थे। इस क्लब की स्थापना वे ही लोग कर
सकते थे। सात समंदर पार छूट आए अपने मुलुक के लिए करते थे।
अपनी कौम के हित में करते थे। उनकी तारीफ़ मुझ जैसा ना चीज़ कोई
क्या करेगा। मेरे पास भला शब्द ही कहां है जो उनकी तारीफ़ में
अपनी इस छोटी सी जुबान से बाहर उंडेल दूं। वैसे मेरे यह सब
करने की तो ज़रूरत होनी भी नहीं चाहिए। फिर आज अगर हम सब साहब
लोग इस लुटे-पिटे शिमला शहर के इस क्लब के अंदर हैं, और पूरी
तरह मौज मस्ती में हैं, तो यह हमारे उन मरभूखे-नंगे
दादो-परदादों-लक्कडदादों का ही पुण्य प्रताप नहीं है,
जिन्होंने हमें पैदा किया था। बल्कि ज़रा ग़ौर कीजिए तो पाइएगा
कि यह तो सब उन दिलदार, सात समंदर पार से हमारे ऊपर हुकूमत
करने वाले गोरे साहबों की देनदारी है, जिनके लिए अगर मैं
शुक्रगुज़ार भी हूँगा तो भी उनकी कृतज्ञता के बोझ से खुद को
मुक्त नहीं कर पाऊँगा. हम सबको उनका शुक्रगुज़ार होना चाहिए।
हम हैं! हम कोई कृतघ्न कौम नहीं हैं। हम उनके शुक्रगुज़ार हैं।
मेरे प्यारे
साहबो, मेरे कहने की तो ज़रूरत ही क्या। आप खुद भली-भांति
जानते हैं कि यह शहर अपने जन्म काल से ही साहबों का शहर है।
साहबों का शहर। सदियाँ बीत रही हैं। पर इस शहर की वही असली
साहबी बरकरार है। यह हम-आप सब साहबों के लिए ही बना शहर है।
इतिहास गवाह है साहबो, इतिहास गवाह कि हिंदुस्तानी राजा-महाराजा
लोग तक इधर देसी स्कैंडल करने और अंग्रेज़ साहबों की
तलियाँ-जूतियाँ चाटकर चाहे इधर आते-जाते रहे हों, पर वे साहब
नहीं हुए। हो नहीं सकते थे। आप जान लीजिए, इस शहर का इतिहास
मैलकॉम मुगरिज साहबों की देनदारी है। उन्होंने इस शहर का
जुग्रफिया ही नहीं बनाया, बल्कि इसे इसकी कैमिस्ट्री भी दी,
जिसमें आज हमारे जैसे साहब लोग जीने के काबिल हुए हैं। साहबों
की उस संस्कृति में जीने के काबिल।
तो मैलकॉम
मुगरिज जैसे अंग्रेज़ साहब- बहादुर का नाम जाने बिना आप इस शहर
के इतिहास को नहीं समझ सकते। आगे समझाएँगे तो क्या खाक। उन
जैसे सब अंग्रेज़ी साहबों को इस शहर का जुग्राफिया अपने घर
लंदन की याद दिलाता था। अब यह हम सबकी बद-किस्मती है कि हमने
फिलहाल लंदन नहीं देखा। पर वे अंग्रेज़ी साहब हमारी तरह के
बदनसीब लोग थोड़े ही थे। वे दुनिया घूमे हुए लोग थे। दुनिया
उनके तलुवों के नीचे थी। क्या तो वह ज़माना रहा होगा, जब इस
हिंदुस्तान की सरज़मीं पर अंग्रेज़ों का वह राज था। मैं आपसे
तभी तो कहता हूँ आप यकीन करें कि उन फिरंगी साहबों की बात ही
क्या रही होगी। वे जन्मजात साहब थे। किसी हद तक यहाँ मौजूद हम
आप सब की तरह। बल्कि हम सब लोग जिस साहबी को पाने के लिए
एडियाँ चटकाते हैं, घूस देते हैं, कालाबाज़ारी करते हैं, वही
साहबी उनकी जेब में रहती थी। वे लोग थे जो आदमियत पर हुकूमत
पैदा करने के लिए पैदा हुए थे। वे जिस भी काम में हाथ डालते
वहीं कामयाबी पाते थे। व्यापार तक साहबों की तरह करते थे।
प्यार साहबों की तरह करते थे। मैलकॉम मुगरिज तो कहा करते थे,
इम ब्लैक नेटिव्ज की इस चिंपाजीनुमा कॉम में ब्लैक ब्यूटी के
रूप में पैदा होने वाली इन लड़कियों पर तो अंग्रेज़ कौम भी
हैरान है।
साहबो, हमें
तो उन लोगों का कृतज्ञ होना चाहिए कि वे हमारी इन काली-कलूटी
लड़कियों को ब्लैक ब्यूटी जैसे खूबसूरत संबोधन से याद करते थे।
उन्हें उठाते और इस्तेमाल भी करते थे तो अपने उसी पूरे साहबी
अंदाज़ में। भूखे बाघों की तरह उन पर टूट नहीं पड़ते थे, जैसा
कि हमारे यह चिंपाजी नेटिब्ज करते हैं। अपनी ही कौम की
लड़कियों पर इस कदर जुल्म ढाते हैं। यह लोग उनके मुकाबले कहाँ
ठहरते हैं। इसका फ़ैसला थोड़ा-सा सोचकर आप खुद कीजिए। बल्कि मैं
तो कहता हूँ आप एक काम कीजिए। मेरी आप सब साहबों को सलाह है,
चहलकदमी करते हुए, थोड़ा-सा घूमते-टहलते हुए जाइए और खुद अपनी
आँखों से देखिए इस शहर के मालरोड का क्या हाल कर डाला है इन
लोगों ने। अपनी आँखों से देखिए साहिबान यह वही मालरोड है जहाँ
पर हम हिंदुस्तानी कभी पाँव तक नहीं धर सकते थे, पर अब आप खुली
आँख से देखिए तो आपका रोने का मन करेगा कि इन पिछले पचास सालों
में हमारे इन्हीं नेटिब्ज ने इस माल रोड तक का क्या हाल कर
दिया है। मेरा तो दिल रोता है। आपका भी रोए तो रोने दीजिए।
हमारे ही इन गंदे लोगों ने अपनी तमाम गंदगी इधर उंडेल दी है।
कंडोमों से लेकर कॉपर-टियों तक सभी कुछ! तभी तो मैं कहने के
लिए मजबूर हूँ आखिर हमारी साहबी उनके मुकाबले कहाँ ठहरती है।
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