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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से राजेंद्र त्यागी की कहानी— 'अधूरा सवाल जनतंत्र का'


 ''राजपथ व जनपथ में से कौन किसके ऊपर से गुजर रहा है? ..एक-न-एक तो जरूर दूसरे की छाती पर पांव रख आगे बढ़ा होगा। रेखागणित का सामान्य सिद्धांत है-जब दो रेखाएँ परस्पर एक-दूसरे को काटती हैं, तो दूसरी रेखा पहली रेखा के ऊपर से गुजरती है। ..जरूर यही सिद्धांत यहां भी लागू रहा होगा।'' राजपथ जनपथ के चौराहे पर खड़ा मुन्नालाल रेखागणित की इस पहेली को सुलझाने में मशगूल था। तभी जनतंत्र के दो पहरेदार आए और धकियाते-धकियाते उसे जनपथ की तरफ ले गए।

मुन्नालाल ने अपने को संभाला। कपड़े-लत्ते झाड़े और कुत्ते की तरह अपने ही मसूढ़ों से निकला खून चाटते हुए पहरेदार से पूछ बैठा, ''भइया मेरी गलती क्या थी?''

जवाब में पहरेदार ने मुन्नालाल के गाल पर एक तमाचा रशीद कर दिया। आंखों के आगे फिर अंधेरा छा गया। आंखें पूरी तरह खुली भी नहीं थी कि कड़क आवाज उसके कानों में घुसी, ''अबे साले! चुपचाप खड़ा रह वरना बंद कर दूँगा।''

जनतंत्र के इन पहरेदारों के बीच मुन्नालाल अपने आपको असमंजस की स्थिति में पा रहा था। तभी लाल-नीली, हरी-पीली गाड़ियों का एक काफिला राजपथ से गुजरा और जनतंत्र के पहरेदार अपनी-अपनी राह हो लिए।

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