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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
भारत से सन्तोष श्रीवास्तव की कहानी— एक कारगिल और


उतरते अक्टूबर की गुलाबी शामें। मुम्बई का मौसम सहता-सहता सा खुशगवार। दरवाजा खुला था। जूते बाहर ही उतारने पड़े। वे सोफे पर बैठी थीं और दरवाजे के पास ही बने ऊँचे से मन्दिर में दीया जल रहा था। अगरबत्ती के धुएँ की सुगन्ध चारों ओर फैली थी।

’’आओ बेटी....हमने पहचाना नहीं,‘‘ उन्होंने बूढ़ी आँखो पर चश्मा फिट किया।
’’मैं उमा की सहेली हूँ। स्कूल से कॉलेज तक हम दोनो साथ-साथ पढ़े हैं। मैं तो आपको देखते ही पहचान गई। उमा के रिसेप्शन पर मिली थी न आपसे।‘‘
’’अब उतना कहाँ याद रहता है। हो भी तो गए पाँच साल।‘‘

तब तक उमा के ससुर बाहर निकल आए। मुझे देख इशारा किया बैठने का। मेरे बैठते ही सामने के सोफे पर से गद्दियों के पीले सफेद रंग से मेल खाती दो बिल्लियाँ कूदीं। मैं चौंक पड़ी, वे मुस्करा दीं-’’बड़ी शैतान हैं दोनों।‘‘

फिर दोनों को गोद में बैठाकर प्यार करने लगीं। कमरे में काँच के पार्टीशन के पार दूब का लचीला लॉन था छोटा-सा और एक हरसिंगार का छतनार पेड़ कोने में। दूब पर हरसिंगार के फूल बिखरे थे। उन्होंने काँच का दरवाजा जरा-सा खोला और बिल्लियों को बाहर निकाल दिया। बिल्लियाँ दूब पर मटरगश्ती करने लगीं। उमा आ गई थी।

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