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जब मैंने पिता को यह कहते सुना कि सोफ़िया हमारे यहाँ आकर घर
के कामों को संभाल लेगी, उस समय मुझे हैरानी तो तनिक भी नहीं
हुई, लेकिन मैं उस बात पर काफी देर तक सोचता ही रह गया था।
मेरी माँ को अस्पताल में दाखिल हुए आज तीसरा दिन था। उससे दो
दिन पहले से ही मेरी बहन चचेरी बहनों के साथ समुद्र किनारे
बंगले पर सर्दी की छुट्टियाँ बिता रही थी। हमारे घर के कामों
को संभालने के लिए किसी व्यक्ति की ज़रूरत थी, इस बात को मैं
पिता से अधिक समझता था। शहर में जहाँ हम रहते हैं, नौकरानियों
की कमी नहीं थी, फिर भी सोफ़िया हमारे घर आ रही थी, इस बात से,
जैसे कि मैं ऊपर कह आया हूं, मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। इस प्रश्न
को गौर से सोचते हुए मैं यह मान लेने को विवश था कि मेरे पिता
को यह गवारा नहीं कि हाथ आया मौका यों ही चला जाए।
सोफिया को लेकर हमारे घर में काफी झमेला खड़ा हो चुका था। मेरी
माँ के पास बात का कोई प्रमाण नहीं था, फिर भी वह सोफिया को
मेरे पिता की रखैल मानती थी। नौबत यहाँ तक आ गयी थी कि मेरी
माँ ने गठरी संभालते हुए पिता से कहा था कि दो में से एक यहाँ
रहेगी। अगर वह रहती है तो सोफिया वाले नाटक की समाप्ति हो जानी
चाहिए और अगर सोफिया वाला यह खेल खतम नहीं होता, तो वह इस घर
में पल भर के लिए भी रहना पसंद नहीं करेगी। |