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लघुकथाएँ

लघुकथाओं के क्रम में महानगर की कहानियों के अंतर्गत प्रस्तुत है
आचार्य संजीव सलिल की लघुकथा- गाँधी और गाँधीवाद


गाँधी जयंती के अवसर पर

बापू आम आदमी के प्रतिनिधि थे। जब तक हर भारतीय को कपड़ा न मिले, तब तक कपड़े न पहनने का संकल्प उनकी महानता का जीवंत उदाहरण है। वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं’ -नेताजी भाषण फटकारकर मंच से उतरकर अपनी महँगी आयातित कार में बैठने लगे तो पत्रकारों ने उनसे कथनी-करनी में अन्तर का कारण पूछा।

नेताजी बोले– ‘बापू पराधीन भारत के नेता थे। उनका अधनंगापन पराये शासन में देश का दुर्दशा दर्शाता था, हम स्वतंत्र भारत के नेता हैं।  अपने देश के जीवनस्तर की समृद्धि तथा सरकार की सफलता दिखाने के लिए हमें यह ऐश्वर्य भरा जीवन जीना होता है। हमारी कोशिश तो यह है की हर जनप्रतिनिधि को अधिक से अधिक सुविधाएँ दी जाएँ।’

‘चाहे जन प्रतिनिधियों की सुविधाएँ जुटाने में देश के जनगण का दीवाला निकल जाए? अभावों की आग में देश का जन सामान्य जलाता रहे मगर नेता नीरो की तरह बाँसुरी बजाते ही रहेंगे- वह भी गांधी जैसे आदर्श नेता की आड़ में?’ – एक युवा पत्रकार बोल पड़ा।

अगले दिन से उसे सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो गया।

२६ सितंबर २०११

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