|
बादल
और नीचे झुक आये थे। अशोक ने एक बार आसमान की ओर देखा और
अपने पिता रघुनाथ से कहा- "पिताजी अब गाँव में रहने की
जरूरत भी क्या है ? आप मेरे साथ दिल्ली में भी तो रह सकते
हो।"
"अशोक, यहाँ खेती करता हूँ तो हाथ पैर चलते रहते हैं।
इसीलिए ठीक भी हूँ। शहर में तो बैठे बैठे सारा शरीर बेकार
ही हो जायेगा।"
"क्यों बेकार हो जायेगा ? वहाँ पार्क हैं, सुन्दर सड़कें
हैं। आप सुबह शाम घूम सकते हो।"
"फिर भी बेटा अपनी धरती की बात अलग होती है।"
"पिताजी, दिल्ली भी तो अपनी ही धरती पर है, वह कोई विदेश
में थोड़े ही है।"
रघुनाथ थोड़ी देर चुप रहा। फिर बोला -"बेटा, किसानी से कुछ
कमाता हूँ तो तेरी ही मदद करता हूँ न।"
"नहीं, पिताजी। आपके आशीर्वाद से मुझे कोई कमी नहीं है। अब
आपको खेती करने की कोई जरूरत नहीं है।"
"अशोक, किसान केवल अपने और अपने परिवार के लिए ही नहीं
जीता। अगर किसान अन्न नहीं उगाए तो लोग क्या खायेंगे?"
अशोक ने तर्क दिया-" केवल आपके गाँव छोड़ने से गाँव खाली
नहीं होगा, पिताजी। गाँव में और लोग भी हैं किसानी के
लिए।"
"अशोक ! ऐसा सभी सोचने लगें, तब?"
अशोक ने झुंझलाकर कहा -" पिताजी, आपको वहाँ कोई कमी नहीं
अखरेगी।"
तभी बादलों से नन्हीं नन्हीं बूँदें झरने लगीं। धरती की
सौंधी गंध हवा में बिखर गयी। सहसा रघुनाथ ने कहा -" यह
माटी की गंध दे सकोगे?" |