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उस अंबर की ओर ताकते ताकते
नयन पथरा गये थे….जहाँ से कभी जीवनदायिनी बूँदें बरसती
थीं। गाँव की जीर्ण-शीर्ण झोपड़ियाँ एक ही आस में लीन थीं
– मेघों का आगमन।
फिर एक दिन, क्षितिज पर काले कफ़न से मेघ उठे। हवा में एक
अजीब-सी तीखी गंध घुल गई, जो लोभ की चिमनियों और अहंकार के
कारखानों से रिसते ज़हर की थी। लोगों के चेहरों पर प्यास
बुझने की आस नहीं, बल्कि एक अनजानी दहशत तैर गई।
पहली बूँद गिरी। नहीं, वह बूँद न थी। वह तो लोहे का एक
छोटा-सा टुकड़ा था, गरम और तीखा – मानव निर्मित स्पर्धाओं
की ऊष्मा से पिघली धातु का प्रतीक। फिर देखते ही देखते,
आसमान से पत्थरों की बौछार शुरू हो गई! वे पत्थर न थे, वे
तो प्राणघाती बारूद के गोले थे! हर गिरती बूँद एक विस्फोट
थी, एक चीख थी, एक अंतिम साँस थी। ये गोले शक्तियों के
संघर्ष और अधिकार की लिप्सा के परिणाम थे – मानो आग का
दरिया बह निकला हो।
गाँव का शांत जलाशय अब रक्त और धुएँ के घूँघट में लिपटा
था। हरे-भरे खेत अंगारों की चिता बन चुके थे। मिट्टी,
जिसकी गोद में कभी धान के सुनहरे बाल लहराते थे, अब राख और
लहू का दलदल थी – धरती के घावों और प्रकृति के असंतुलन का
प्रत्यक्ष प्रमाण। जिंदगी और मौत के बीच झूलते लोग,
जीवनदायिनी वर्षा की कल्पना करते करते थक गये।
और जब अंतिम बारूदी बूँद गिरी, तो पीछे छोड़ गई एक नीरवता
का गहरा कुआँ। यह कुआँ सिर्फ खामोशी का न था, यह था बुझते
दीयों का मातम, हर अंकुरित उम्मीद का राख होना। उस राख और
लहू में सने गाँव की हर आत्मा एक विदीर्ण अरण्य-रोदन कर
रही थी: क्या मानव की अंधी दौड़ ने ही इस विष-वर्षा को
आमंत्रित किया था? इस विनाश के तांडव के बाद, धरती पर क्या
कभी फिर से प्रेम और शांति के पुष्प खिलेंगे? या यह शून्य
ही हमारा अंतिम सत्य होगा।
१ मई
२०२५ |