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लघुकथाएँ

लघुकथाओं के क्रम में महानगर की कहानियों के अंतर्गत प्रस्तुत है
ीमा वर्मा की लघुकथा- आँगन के फूल


चैत्र मास के नवरात्र शुरू हो चुके थे।
सुबह से ही रेखा घर के कामों में व्यस्त थी। आँगन से मिट्टी निकालकर वह खेत्री बो रही थी। मंदिर सुबह ही सजा दिया था, दीपक और धूप की सुगंध पूरे घर में फैल चुकी थी।
पतिदेव बाज़ार से पूजा का सामान लेने गए हुए थे।
घड़ी की सुइयाँ जैसे धीमी हो गई थीं। वह बार-बार दरवाज़े की ओर देखती और मन ही मन सोचती इतनी देर क्यों हो गई?
तभी दरवाज़ा खुला और वे अंदर आए। हाथों में थैले थे और चेहरे पर हल्की झुंझलाहट।
“कहाँ रह गए थे? बड़ी देर लगा दी!” रेखा ने उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करते हुए पूछा।
“फूल वाले से बहस हो गई, बस वहीं समय लग गया।”
उन्होंने सामान टेबल पर रखते हुए कहा।
“क्यों, क्या हुआ?”
“लूट मचा रखी है! श्रद्धा के नाम पर लोगों को लूट रहे हैं। जिसको देखो, मनमानी कीमत बता रहा है।” उनकी आवाज़ में नाराज़गी साफ झलक रही थी।
रेखा चुप हो गई।
उसे कल की बात याद आ गई, जब वह खुद बाज़ार गई थी। कुछ दुकानदार तो इतने बद्तमीज़ हो गए थे कि मोल-भाव करने वालों को उल्टा जवाब देने लगे थे।
पूजा-पाठ समाप्त होने के बाद उन्होंने कहा,
“तुम थोड़ी देर आराम कर लो, मैं ज़रा बाहर होकर आता हूँ।”
सुबह से थकी हुई रेखा ने सोचा, थोड़ा लेट जाती हूँ।
अभी उसने आँखें मूँदी ही थीं कि बाहर से हलचल की आवाज़ आई।
वह उठकर बाहर आई तो देखा पतिदेव आगे-आगे कई छोटे-छोटे पौधे लिए चले आ रहे थे और पीछे एक माली मिट्टी की बोरी उठाए हुए था।
कुछ समझ पाती, उससे पहले ही माली ने गमलों की सफाई शुरू कर दी। सूखी घास हटाई, नई मिट्टी भरी और एक-एक करके फूलों के पौधे लगाने लगा।
रेखा बस चुपचाप यह सब देखती रही।
तभी पतिदेव मुस्कुराते हुए बोले, “अब से माता रानी की पूजा हमारे अपने आँगन के फूलों से होगी।”
और रेखा को अभी से अपना आँगन फूलों से महकता दिखाई देने लगा था ।

१ अप्रैल २०२६

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