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कहानियाँ 

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है यू.एस.ए से
सुषम बेदी की कहानी—
सड़क की लय


नेहा ने सुना पापा कहे जा रहे थे - ''सड़क की भी एक लय होती है। इसे सुनो, पहचानो और उसी हिसाब से गाड़ी चलाओ। जब तुम मैनहैट्टन में चलाती हो तो यहाँ सैंकड़ों गाड़ियाँ एक साथ चलती हैं। बार-बार लाल बत्ती होने से रुकना पड़ता है, इसीलिए गाड़ी की स्पीड खूब धीमी रखनी चाहिए ताकि घचके से ब्रेक लगाने की ज़रूरत ना पड़े।''

परसों नेहा का ड्राइविंग का इम्तहान है। यों तो नेहा ड्राइविंग स्कूल में कार चलाना सीखती रही है पर एक बार टेस्ट में फेल होने के बाद वह काफी नर्वस है, और पापा ने कहा कि वह इसका कुछ अभ्यास करवा देंगे। पापा की तो ड्राइविंग बढ़िया होती ही है। कितने बरसों से तो चला रहे हैं वे गाड़ी।

छोटी थी तो ज़िद करती थी गाड़ी चलाने की! पर तब पापा कहा करते थे, बड़ी हो जाओ तब सिखाएँगे तुमको गाड़ी। पर कालेज जाने पर उसे वक्त ही नहीं मिला। अब तो नौकरी भी शुरू हो गई और उसे होश आया है गाड़ी सीखने का।

तेईस बरस की उम्र में गाड़ी चलाना सीख रही है। सबर्ब में रहने वाले लड़के लड़कियाँ तो सोलह साल के होते ही चलाने लगते हैं। पर नेहा तो मैनहैट्टन में रहती है। यहाँ गाड़ी की वैसी ज़रूरत पड़ती ही नहीं वर्ना वह भी पहले सीख जाती। भैया भी तो लेट सीखा था, नौकरी लगने पर ही।

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