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कहानियाँ  

समकालीन हिन्दी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है यू.के. से
तेजेंद्र शर्मा की कहानी- जीना यहाँ किसके लिए


'जीतू बेटा! अब और नहीं सहा जाता। मुझे मार डाल बेटा! मुझे ' यह फुसफुसाहट तो बाऊ जी की ही लग रही है। मेरे बढ़ते कदम रुक गए हैं। सोचता हूँ कि बाऊ जी की ओर मुड़ कर देख लूँ। साहस नहीं जुटा पाता हूँ। क्या सचमुच यह बाऊ जी ने ही कहा है या यह मेरा वहम ही है? आजकल बाऊ जी फुसफुसाहट में ही बात कर पाते हैं। उनकी कही बात को समझने का प्रयास ही हम सबका काम है माँ, भैया जी, हम दोनों की पत्नियाँ और जब दीदी यहाँ हो तब। मन में कहीं यह डर भी तो है कि यदि बाऊ जी ने सचमुच ही यह सब कहा हो तब?

पिछले कुछ समय से बाऊ जी ने एक चुप्पी सी ओढ़ रखी है। एक शब्द भी तो नहीं बोलते। यदि उनसे कुछ पूछते हैं तो भी अस्फुट से स्वरों में हाँ या नहीं जैसा उत्तर ही मिलता है। हिम्मत नहीं जुटा पा रहा कि बाऊ जी की आँखों में आँखें डाल कर देख पाऊँ। न जाने उन आँखों में क्या भाव हो। जब बाऊ जी ने यह बात कही होगी, उस समय उनकी अपनी मन:स्थिति क्या रही होगी? वे क्या सोच रहे होंगे? फिर इस काम के लिए उन्होंने मुझे ही क्यों चुना? मैं तो पेशे से भी सिविल इंजीनीयर हूँ कृष्णकांत भैया चाहे दाँतों के ही सही, कम से कम डाक्टर तो हैं। आजकल तो जया दीदी भी आई हुई है और फिर माँ तो सारा समय ही उनके पास ही रहती हैं। क्या बाऊ जी यह बात बाकी सबसे पहले कर चुके हैं? मैं बात को सुन कर भी अनसुना कर जाता हूँ। "जी बाऊ जी, आपके लिए चाय ले कर आता हूँ।"

सीधा रसोईघर की ओर बढ़ जाता हूँ, बाऊ जी के लिए मसाले वाली चाय बनाता हूँ। जबसे बाऊ जी की मित्रता पटेल अंकल से हुई है, तभी से चाय में मसाले का प्रयोग करने लगे हैं। दफ़्तर में चाहे कैसी भी चाय पी लेने वाले बाऊ जी, घर में हमेशा मसाले वाली चाय ही पीते हैं। ईलिंग रोड से जब भारतीय दालें, चावल और आटा आदि मंगाये जाते हैं तो चाय मसाले का पैकेट लाना कभी नहीं भूलती माँ। कल रात से लन्दन और उसके आसपास के क्षेत्रों में भारी हिमपात हो रहा है। बाऊ जी के बारे में सोचते-सोचते कड़ाके की बर्फ़ीली ठण्ड में भी मेरे माथे पर पसीने के बूँदे दिखाई दे रही हैं।

किचन टॉवल से ही माथा पोंछ लेता हूँ। बाऊ जी को हमेशा से ही बाऊण्टी के किचन टॉवल पसन्द आते हैं। थोड़े महंगे अवश्य होते हैं किन्तु उनका काग़ज़ मजबूत और मुलायम होता है, उस पर नीले फूलों की बेल बनी रहती है। घर में वर्षों से यही किचन टॉवल ख़रीदे जाते हैं।

चाय लेकर बाऊ जी के निकट पहुँच जाता हूँ। बाऊ जी की ओर देखता हूँ। उनकी आँखों मे याचना स्पष्ट दिखाई दे रही है। जैसे मुझ से प्रार्थना कर रहे हो, क्यों नहीं मुक्ति दिला देते मुझे इस नरक से मैं अचानक एक गहरी सोच में डूब जाता हूँ। बाऊ जी ने तो कभी जान बूझ कर किसी का दिल तक नहीं दुखाया, सदा ही सबसे हँस कर बातचीत करते, जीवन्त व्यक्तित्व के स्वामी, किसी को कभी दु:ख देने के बारे में कभी सोचा ही नहीं होगा। तो फिर बाऊ जी इस नरक में जीने को क्यों अमिशप्त है?

बाऊ जी की आँखों में बसे प्रश्नों का मेरे पास कोई उत्तर नहीं हैं। पाँच फूट दस इंच कद के बाऊ जी आज बस एक व्हील चेयर पर विराजमान कृषकाया ही बन कर रह गए हैं। पेशे से चार्टर्ड अकाऊण्टेण्ट, बाऊ जी को लन्दन के आर्थिक जगत में एक विशेष दर्जा हासिल था। इस क्षेत्र में वे अकेले भारतीय, या कहा जाये कि एशियन रहे होंगे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इंग्लैण्ड में भारतीय मूल के लोगों को हाथ के काम वाले क्षेत्र में तो आसानी से काम मिल जाया करता है,परन्तु जहाँ कहीं प्रबंधक या इस से ऊपर की बात होती है तो गोरी चमड़ी एक अनिवार्य योग्यता बन जाती है। आपसे कहीं कम पढ़े लिखे गोरे लोग वाया भटिण्डा आपसे आगे कूदते फाँदते निकल जाते हैं। उस दिन विजय भाई भी अपने रेडियो स्टेशन का रोना रो रहे थे जहाँ उनका गोरा स्टूडियो मैनेजर सैम उनका ही बॉस बना बैठा है।

किन्तु बाऊ जी का तो जलवा ही दूसरा था। मैंने तो बाऊ जी को कभी भी थ्री-पीस सूट के बिना दफ़्तर जाते नहीं देखा। भला कौन सा ऐसा सुरुचिपूर्ण रंग होगा जिस रंग का सूट बाऊ जी के पास न हो। उन्हें मार्क्स एण्ड स्पेन्सर के सेंट माईकेल के सूट ही अच्छे लगते हैं। उसी कंपनी की टाई कमीज़ें और स्वेटर भी। उस से सस्ते कपड़े उन्हें पसन्द नहीं आते और उससे महंगे कपड़े उन्हें फिजूलखर्ची लगती है। वैसे बाऊ जी को काले रंग का सूट हमेशा ही अधिक पसन्द आता है। कभी कभी तो बन्द गले की काली कमीज़ पहन लेते हैं तो टाई लगाने के झंझट से बच जाते हैं। घर में बाऊ जी सदा ही सफेद कुर्ता पजामा पहनते हैं। लखनऊ से विशेष रूप से मंगवाया करते हैं।

थियेटर में उन्हें विशेष रुचि रही है। साऊथ बैंक का इलाका उनका प्रिय इलाका है। सत्येंद्र जी ओर बाऊ जी घण्टों नाटकों पर बातें कर सकते हैं। कई बार दोनों शाम को टेम्स के किनारे साहित्य, राजनीति और नाटकों के विषय में बतियाते रहते हैं। सत्येंद्र अंकल हिन्दी साहित्य के प्रेमी हैं तो बाऊ जी अंग्रेजी और उर्दू के। किन्तु दोनों ही अंग्रेज़ी नाटक साथ-साथ देखा करते थे। जब से बाऊ जी ने व्हील चेयर का साथ अपना लिया है सत्येंद्र अंकल अकेले पड़ गए हैं। अब उन्हें नाटक अच्छे नहीं लगते। पूरा जीवन ही एक नाटक लगने लगा है।

सत्येंद्र अंकल माँ को भी छेड़ते रहते थे। 'भाभी जी इसे जरा काबू में रखा करें। गोरी मेमें भी इस पर मरती हैं। यह जब काले रंग का ओवरकोट, सिर पर फेल्ट हैट और मुँह में पाईप लगा कर चलता है तो के एन सिंह तक को कम्पलेक्स दे देता है।' बाऊ जी का तो व्यक्तित्व ही ऐसा है कि किसी को भी मिले तो अपने व्यक्तित्व की एक अमिट सी छाप छोड़ सकते हैं। हैं? या थे? बाऊ जी के जीवित रहते उनके बारे में थे कह पाना कितना कठिन कार्य है?

बाऊ जी कई बार पुराने किस्से सुनाया करते थे। 'बेटा जी, बंगे से चले थे तो पाँच पाउण्ड ले कर आए थे। तुम्हारी माँ की गोद में तो जया भी थी। यह जो सब घर में देखते हो न; यह सब तुम्हारी माँ का प्रताप है। इस भागवन्ती ने जो जिन्दगी की लड़ाई में साथ दिया है उसकी तो मिसाल भी नहीं मिल सकती। यह जो आज की पीढ़ी है न, जो बिना शादी ब्याह के लिव-इन अरेन्जमेण्ट की बात करती है, वो इस त्याग, इस मेहनत को समझ नहीं सकती। यह अन्नपूर्णा मेरे साथ न होती तो मैं कब का थक कर हार चुका होता।' माँ बस शरमा कर मुँह फेर लेती। उसे बच्चों के सामने अपनी तारीफ़ सुनना अजीब-सा लगता।

कितना अजीब-सा लग रहा है बाऊ जी को व्हील चेयर पर बैठा देख कर। कैसे एक भरा पूरा स्वस्थ शरीर प्रकृति के एक ही झटके से धम से गिरता है और कुर्सी से चिपक कर रह जाता है। कभी-कभी अच्छे मूड में होते तो मुकेश के दर्द भरे गीत गुनगुनाया करते। राज कपूर की पूरी टीम ही उन्हें प्रिय थी - शैलेंद्र, शंकर जयकिशन, मुकेश और राजकपूर - सजनवा बैरी हो गए हमार! अब तो जीवन ही बैरी हो गया है!

चाय देख कर भी बाऊ जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की है। बस एक ओर ही देखे जा रहे हैं। चाय देख कर राज कपूर की फिल्म तीसरी कसम का डायलॉग सुनाया करते थे, 'चाह की तासीर गर्म होती है जी!' आज एकदम चुप हैं। ऐसा क्यों हो जाता है? कैसे हो जाता है?

बाऊ जी सेवानिवृत्त होने वाले थे। वे चाहते तो उनकी कम्पनी उन्हें एक्स्टेंशन दे सकती थी। परन्तु बाऊ जी माँ के साथ भारत दर्शन के लिए जाने का निर्णय लिए बैठे थे। पाकिस्तान जाने का भी तो कार्यक्रम था। झंग के उस क्षेत्र में भी जाना चाहते थे जहाँ उनकी पुश्तैनी तिकोनी हवेली थी। बाऊ जी के दादा जी के दो भाई और थे। यानी कि कुल तीन भाई, इसीलिए तिकोनी हवेली। गीली आँखों से बाऊ जी याद किया करते हैं कि कहाँ उनके दादा जी घोड़ा बाँधा करते थे, कैसे कन्धे पर बन्दूक लगी रहती थी, कुल्ले वाली पगड़ी और बड़ी-बड़ी मूँछें, स्वयं बाऊ जी के चौड़े कन्धे और ऊँचा कद, दादा जी की ही तो देन थी। बाऊ जी सेवानिवृत्ति के बाद माँ के साथ दक्षिण भारत की सैर भी करना चाहते थे। कन्या कुमारी में विवेकानंद स्मारक पर खड़े हो कर भारत की विशालता को नाप लेना चाहते थे।

उनका इरादा वैष्णोदेवी के दर्शन का भी था तो साथ ही साथ चारों धामों की यात्रा का भी कार्यक्रम था। जीवन में एक ही वस्तु की तो कमी रह गई थी। अपनी मातृभूमि को जी भर कर देख लेना। मातृभूमि भी तो बँट गई थी। जब विभाजन हुआ था, तो परिवार 'बंगा' नामक स्थान पर रहने आ गया था। शरणार्थी, अपने ही देश में शरणार्थी। पीड़ा विस्थापन की पीड़ा। अपनी मर्ज़ी से विदेश में बसने जाना एक अलग बात है परन्तु तलवार के जोर पर अपने ही देश में विस्थापित हो जाना? कभी-कभी कलम उठा लेते थे तो अपने वतन की याद में कुछ पंक्तियाँ स्वयंमेव ही उतर जाती थीं, 'करदा है मन मत्थे लांवां, मुड़ वतन दी खाक नूं, कर के सजदे सिर झुकावां, उस जमीने पाक नूं'
मैं तो पूछ ही लेता था, "बाऊ जी आप पाकिस्तान की ज़मीन को इतना क्यों याद करते हैं?''
"ओये लल्लू यह ज़मीने पाक का मतलब पाकिस्तान की जमीन नहीं है। इसका मतलब है पाक यानि कि पवित्र ज़मीन। आई बात समझ में।"

सेवानिवृत्ति के बारे में सोच कर ही बाऊ जी की आँखों में एक विशेष सी चमक आ गई थी। एक भरा पूरा जीवन सम्मानपूर्वक जी लेने का सुकून, बस दो महिने बाद बाऊ जी और माँ भारत भ्रमण पर निकलने वाले थे। बाऊ जी पहले पाकिस्तान जाना चाहते थे, तो माँ भारत। माँ का कहना था कि सारे रिश्तेदार तो भारत में ही हैं, इसलिए पहले वहाँ चलते हैं। जबकि बाऊ जी का विचार था कि पहले झंग का चक्कर लगाया जाए ताकि सारे रिश्तेदारों को अपनी मातृभूमि का आँखों देखा समाचार सुनाया जा सके। माँ का बचपन तो बंगे में ही बीता था। भला उसे झंग में क्या दिलचस्पी हो सकती थी। परन्तु माँ तो माँ ही है न। बाऊ जी की प्रत्येक इच्छा माँ के लिए हुक्म के समान हो जाती है। इसीलिए माँ भी पहले झंग चलने को तैयार हो गई थी। वे भी देखना चाहती थीं कि हीर स्याल के इलाके में ऐसा क्या है जो बाऊ जी को वहाँ जाने के लिए इतना आतुर बना रहा हैं। कहीं भी अपनी इच्छानुसार जा पाना इतना आसान होता है क्या? बाऊ जी तैयारियों में लग गए थे। अधिकतर रिश्तेदारों को एक लम्बे अर्से के पश्चात मिलने वाले थे। झंग के अपने पड़ोसियों के तो चेहरे भी खासे धुंधले पड़ चुके थे। इकबाल नाई, उनके कालेज के साथी मंजूर, परवेज और मुन्ना 'क्या वे सब वहाँ झंग में होंगे? दुनिया कितनी बदल चुकी है। यदि वे स्वयं पाँच नदियों का जल छोड़कर टेम्स के किनारे आ बसे हैं, तो क्या उनके मित्र अभी भी वहीं के वहीं खड़े होंगे? पाकिस्तान से भी तो कितने नौजवान खाड़ी के देशों में किस्मत आजमाने निकल चुके हैं।

बढ़िया भोजन बाऊ जी की कमज़ोरी है। अच्छे खाने के लिए बाऊ जी वेम्बले से इलफर्ड तक कार चला कर जाने से भी नहीं हिचकिचाते थे। भारतीय, कॉन्टिनेंटल, चायनीज और इटेलियन खाने उन्हें एक समान प्रिय थे। किन्तु जब जब आवश्यकता होती तो वे ऑमलेट और डबल रोटी खा कर भी गुज़ारा कर लेते थे। तीन महीने बाद ही बाऊ जी पैंसठ के होने वाले थे। और मैं सोच-सोच कर हैरान होता कि यह कभी न बूढ़ा होने वाला इन्सान, सेवा निवृत्त जीवन किस प्रकार बिताएगा।

किन्तु बाऊ जी के पास पुस्तकों का एक विशाल भण्डार-सा था। बाऊ जी का सपना था कि उनके पास एक निजी पुस्तकालय हो। उनकी इस लायब्रेरी में न जाने कितने प्रकार की पुस्तकें थीं। अनगिनत पुस्तकें, बेशुमार विषय। इनमें कानून की पुस्तकें थी तो उपन्यास भी थे, महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की जीवनियाँ थीं तो शेक्सपीयर के नाटक भी थे। उर्दू, पंजाबी, और हिन्दी की पुस्तकें भी दिखाई दे जाती थीं।

माँ तो पंजाबी और हिन्दी के उपन्यास ही पढ़ती है। अंग्रेज़ी और उर्दू का असला बाऊ जी के लिए है। बाऊ जी की प्रिय पुस्तकों में एमिली ब्रॉंटी का उपन्यास 'वदरिंग हाइट्स' और चार्ल्स डिकन्स का उपन्यास 'डॉम्बे एंड सन' है। बाऊ जी उपहार में पुस्तकें ही लेना देना पसन्द करते थे। उनके अनुसार पुस्तक से बेहतर साथी मिलना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। भारत के राजनीतिक जगत पर एक उपन्यास की भी योजना बना रखी थी। उन्होंने उपन्यास का नाम भी सोच रखा था, 'जीना यहाँ -किसके लिए!'

आज उनके उपन्यास का शीर्षक उनके अपने जीवन का शीर्षक बन गया है। जिस दिन बाऊ जी को पक्षाघात हुआ उस दिन मैं घर पर ही था। पढ़ते-पढ़ते मुझे गहरी नींद आ गई थी। अधखुली पुस्तक मेरे सीने पर ही रखी थी। बाहर लन्दन की तेज़ ठण्डी हवाएँ चल रही थीं। कुछ गिरने की सी आवाज़ से मैं चौंक कर उठा। गुसलखाने में से आवाज़ें आ रही थीं, जैसे कोई सहायता के लिए फ़र्श पर प्रहार करके हमें बुलाने का प्रयास कर रहा हो।

मैं भाग कर गुसलखाने तक पहुँचा तो वहाँ माँ पहले से ही बाऊ जी को उठाने का प्रयास कर रही थी। माँ रोये जा रही थी, उसका पूरा शरीर काँप रहा था। मुझे देखते ही उसकी रुलाई जोरों से फूट पड़ी, 'जीतू पुत्तर, वेख एह की हो गया। हाय रब्बा ऐहना दी आई मैनूं आ जाए।'

मैंने माँ को बाऊ जी से अलग किया। बाऊ जी के असहाय शरीर को कन्धे पर उठाया और बिस्तर पर वापस ले आया। वे खड़े नहीं हो पा रहे थे। माँ स्थिति को और बिगाड़ रही थी क्यों कि स्वयं भी बेहोश हुए जा रही थी। मैंने एम्बुलैंस के लिए फ़ोन किया। माँ को संभाला और उन्हें अपने साथ मिला कर बाऊ जी के पैरों के तलवों की मालिश करने लगे। सर्द तलवों में गरमाहट पैदा करने की एक बेकार-सी कोशिश।

बाऊ जी ने मुझे सदा से ही अपना मित्र समझा है। बाऊ जी जब कंबल में सिर लपेटे पड़े थे, तो मैं उन्हें हौसला देने के लिए मज़ाक में कह रहा था कि वे बंगे वाली पागल नर्स जैसे दिखाई दे रहे हैं। बाऊ जी जब कभी भी बंगे के बारे में बात करते हैं तो उस पागल नर्स का ज़िक्र अवश्य हो जाता है जो के कमेटी के दफ़्तर के बाहर गुदड़ी में लिपटी रहती। उसे एक मरीज़ से प्रेम हो गया था, जिसकी हस्पताल में ही मृत्यु हो गई। तब से वह नर्स पागलों का सा व्यवहार करने लगी। सड़क पर गिरे सिगरेट के टुकड़ों का आनंद उठाती और जून की चिलचिलाती धूप में भी कंबल ओढ़े रहती। पागल नर्स का ज़िक्र भी बाऊ जी होठों पर मुस्कुराहट नहीं ला पाया। उनकी हालत देख कर मेरे पेट में मरोड़ सा उठने लगा। यह विचार भी दिमाग को मथे जा रहा था कि कहीं बाऊ जी का अन्तिम समय तो नहीं आ पहुँचा।

बाऊ जी के मुँह से अजीब अजीब आवाज़ें निकल रही थीं। कुछ गुर्राहट, फुसफुसाहट और फुंकार का सा मिश्रण। कुछ बेमेल बेमतलब से शब्द। उनकी आँखों में बेचारगी, मजबूरी और दयनीयता के भाव साफ़ दिखाई दे रहे थे। न जाने क्यों मैंने एक बार फिर उन्हें कंबल ठीक ओढ़ाया।

बाऊ जी उस रात मरे नहीं, किन्तु उन्होंने जीना बंद कर दिया था। अब वे केवल सांस लेता हुआ, व्हील चेयर से चिपका आधा अधूरा-सा शरीर मात्र रह गए थे। उनके भीतर कुछ मर गया था। जैसे उनके भीतर की अग्नि बुझ चुकी थी। यह उनका सबसे तीव्र संघर्ष था, किन्तु उनके संघर्ष करने की शक्ति जैसे चुक-सी गई थी।

हस्पताल के डॉक्टर भी बाऊ जी की तबीयत में सुधार लाने में असफल रहे थे। बाऊ जी को अधरंग हो चुका था। अब वे स्वयं अपना कोई भी काम करने में सक्षम नहीं थे। उन्हें उठने, बैठने, नहाने, खाने सभी कामों में किसी न किसी की सहायता की आवश्यकता पड़ती थी। त्रासदी तो यह थी कि पक्षाघात के इस हमले से उनकी नज़र पर भी असर हुआ था और वे नजरें टिका कर कुछ भी पढ़ पाने में असमर्थ हो चुके थे। और सबसे गहरा असर उनके व्यक्तित्व पर हुआ था। उनके दिमाग से बीमारी से लड़ने की शक्ति छिन चुकी थी। मैं और भैया बाऊ जी की हर ज़रूरत का ध्यान रखने का प्रयास करते। किन्तु माँ, माँ को तो और कुछ सूझता ही नहीं था। कौन विश्वास करेगा कि इस औरत ने एक पूरा जीवन इंग्लैण्ड में बिता डाला है। पश्चिमी सभ्यता की हवा उसके संस्कारों को ज़रा भी तो नहीं भेद पाई। बाऊ जी की हर फुसफुसाहट भरी बात माँ को समझ में आ जाती। उनकी नज़रों के भावों को माँ आसानी से पढ़ लेती।

बाऊ जी की बुझी हुई निगहें मुझ पर टिकने का प्रयास कर रहीं हैं। लैंगलैण्ड कम्पनी का फ़ाइनेंस निर्देशक अपने ही पुत्र से कुछ माँगने की कोशिश कर रहा है। वहीं फुसफुसाहट मेरे पूरे जिस्म पर एक बार फिर रैंग गई, 'मुझे मालूम है बेटा, अब मैं बचने वाला नहीं। प्लीज किल मी माई सन। मुझ पर दया...।' कुछ शब्द उनके गले में अटक कर रह गए हैं।

'अरे बाऊ जी, आप भी कैसीं बातें करने लगे? आप बिल्कुल ठीक हो जाएँगे। मेरे हाथ की चाय पीजिए। अभी तो अपने ममी को चारों धामों के दर्शन करवाने हैं।' मेरी आवाज़ मेरे लिए ही अजनबी हुई जा रही है। आवाज़ का खोखलापन मुझे ही समझ नहीं आ रहा। बाऊ जी की आँखें दूर कहीं शून्य की ओर ताके जा रही हैं। मेरी बनाई हुई चाय मेज़ पर पड़ी ठण्डी होती जा रही हैं।

लन्दन में ठण्ड पड़ना कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे सर्द देश के ठण्डे दिल वाले लोगों के बीच बाऊ जी को अपना जीवन को शुरू करना था। बाऊ जी ने बँटवारे का दर्द सहा था। परदेस के अनजान वातावरण में जीवन को स्थापित करने की चाह ! बाऊ जी में ग़ज़ब का आत्मविश्वास। बाऊ जी यह भी समझते थे कि भारत की पढ़ाई को यहाँ कोई कुछ नहीं समझता। इसलिए सुबह नौकरी और रात को पढ़ाई। इस देश की डिग्री हासिल करनी है।

जीवन में कुछ बनने का जुनून। और मुकाबला उस समाज से, जहाँ बड़े बड़े अक्षरों में लिखा होता 'कुत्ते, काले और आयरिश के लिए प्रवेश वर्जित! यह प्रवेश वर्जन किराये पर मकान लेने, रेस्टॉरण्ट में भोजन करने, कॉलेज में पढ़ाई और नौकरी के लिए आवेदन जैसे सभी क्षेत्रों पर लागू होता।

पहले-पहले तो बाऊ जी को इंग्लैण्ड के लोगों की अंग्रेज़ी समझ ही नहीं आती थी। क्यों कि यहाँ अंग्रेज़ी तो कोई बोलता ही नहीं। कोई स्कॉटिश है तो कोई यार्कशरमैन, कोई कॉकनी बोलता है तो कोई अंग्रेज़ी के नाम पर कुछ भी बोल लेता है। किन्तु बी.बी.सी. पर बोली जाने वाली अंग्रज़ी तो गिने चुने अंग्रेज़ ही बोल सकते है। इस के बावजूद सभी बाऊ जी के अंग्रेज़ी बोलने के अन्दाज़ का मज़ाक उड़ाते। ऐसे विपरीत वातावरण में बाऊ जी ने अपने जीवन की शुरुआत की थी।

संघर्ष और काम में व्यस्त बाऊ जी फिल्मों के लिए समय निकाल ही लेते थे। हिन्दी फिल्मों में वे मोतीलाल और राजकपूर के प्रशंसक थे तो अंग्रेज़ी फिल्मों में वे पॉल न्यूमेन, मार्लन ब्राण्डो के अतिरिक्त चार्लदन हेस्टन की ऐतिहासिक फिल्में पसन्द करते थे। वैसे देखने के लिए तो जॉन वेन और जेम्स बॉण्ड की फिल्में भी देख ही लेते थे।

मैं बाऊ जी को देखने हर रोज नॉर्थविक पार्क हस्पताल जाता। यद्यपि लंदन मे रहने के कारण मेरी विचारधारा भी कुछ कुछ पश्चिमी ढंग की हो गई है, फिर भी जब क्लेयर ने मेरे रोज़ाना हस्पताल जाने पर शिकायत की तो मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा, 'जेट्स, व्हाई डू यू हैव टू सी युअर फादर एवरी डे? अवर लाईफ इज गेटिंग डिस्टर्ब्ड!' अभी तो हमारी शादी नहीं हुई, बाद में क्या होगा?'

मैं क्लेयर को समझा नहीं पा रहा था कि मेरा बाऊ जी को हस्पताल देखने जाना मेरे व्यक्तित्व का एक अंग ही है। बाऊ जी हमारे लिए क्या हैं, यह मैं उसे कैसे समझाता। बाऊ जी के बिना जीवन के विषय में सोच कर ही रीढ़ की हड्डी में सनसनी दौड़ जाती है। कई बार तो मैं हस्पताल जा कर भी बाऊ जी की ओर देखने का साहस नहीं जुटा पाता। जैसे मुझ में सच्चाई का सामना कर पाने की हिम्मत चुकती जा रही हो। फिर अचानक एक अपराध बोध मेरे मन में घर बना लेता हैं। मैं कई बार बाऊ जी से बात करने का प्रयास भी कर चुका हूँ, किन्तु सामने कोई प्रतिक्रिया ही नहीं होती। बाऊ जी का शरीर इतना दुबला हो गया है कि अब तो लगने लगा है जैसे हम उनसे न मिल कर किसी अन्जान व्यक्ति से मिल रहे हो।

दो महिने तक बाऊ जी हस्पताल में रहे। इन दो महीनों में माँ ने न जाने कितने उपवास रखे होगे। शिव चालिसा, हनुमान चालिसा तो पढ़ती ही थीं, महामृत्युंजय मंत्र का जाप प्रतिदिन १०८ बार करतीं। न जाने कितने यंत्र और तावीज अंबाले से मंगवाए। जब तक हस्पताल वाले बाहर निकलने को न कहते बाऊ जी के पास ही रहतीं। बाऊ जी वापस घर आए तो नीचे के एक कमरे को ही उनका बेडरूम बनाना पड़ा। लंदन में बेडरूम और बाथरूम तो पहली मंज़िल पर होते हैं न। बाऊ जी की व्हील चेयर अन्दर बाहर आसानी से लाई जा सके, इसलिए मुख्य द्वार पर रैम्प भी लगवाने पड़े। बाऊ जी की आवाज़ कुछ हद तक वापस आ गई और शारीरिक हरकत भी किन्तु उनके मस्तिष्क को जो क्षति पहुँच चुकी थी, उसका अन्दाज हम पहले से नहीं लगा पाए थे।

एक हँसता खेलता चार्टर्ड एकाउंटेण्ट जो बड़े आदमी की बड़ी से बड़ी समस्याएँ चुटकियों में हल कर सकता था, आज निरीह, असहाय और लाचार बना बैठा था। आज कोई ठहाके नहीं, पाईप नहीं, और ग्लैनफ़िडिश भी नहीं। मित्र की हालत का असर सत्येंद्र अंकल पर भी हुआ - बाई पास सर्जरी!

अब बाऊ जी समझ चुके थे कि स्थितियों पर उनका नियंत्रण नहीं रहा। इस बात की झल्लाहट भी उनमें दिखाई देती थी - नहाना, कपड़े बदलना, बाल बनाना, नाखून काटना, खाना खाना यानि कि हर बात के लिए वे किसी न किसी पर निर्भर थे - विशेषकर माँ पर। और यही उन्हे कचोटता था।

बाऊ जी के चेहरे और व्यक्तित्व में इतना अधिक परिवर्तन आता जा रहा था कि उन्हें पहचानना और भी कठिन होता जा रहा था। एक विचित्र-सा अजनबीपन पैठ रहा था हमारे सम्बन्धों के बीच! सभी विषयों पर बातचीत बन्द हो गई थी। कैसे वे फिल्मों की बातें किया करते थे, अनगिनत पुस्तकों से उदाहरण देते थे जिन्हें कि उन्होंने रात-रात भर जाग कर पढ़ा था। भारतीय और ब्रिटिश राजनीति पर घड़ल्ले से बहस किया करते थे। जय प्रकाश नारायण की बहुत प्रशंसा किया करते थे। वे उन्हें नेहरू जी की ही तरह स्वप्नदृष्टा लगते थे। अब एक ही झटके में सब समाप्त। दिलीप कुमार की नाटकीय अदाकारी, मोतीलाल का सहज अभिनय और राजकपूर का निर्देशन, अब यह सभी विषय बाऊ जी के ज्ञान से वंचित रह जाएँगे। हस्पताल से वापस आने के बाद से वे अपने ही नाम की प्रतिछाया बन कर रह गए थे।

मेरे दिमाग में हर समय बाऊ जी के कहे शब्द बजते रहते हैं। 'मुझे मार डाल बेटा। अब और नहीं सहा जाता। वे माँ के सामने ऐसे शब्द नहीं बोलते। मैं रातों को नींद से हड़बड़ा कर उठ बैठता हूँ दु:स्वप्न मुझे परेशान किए रहते हैं। कभी मुझे महसूस होता है कि मैंने बाऊ जी के चेहरे पर तकिया रख कर उनका दम घोंट दिया है तो कभी उन्हें मुक्ति दिलवाने के लिए बेहिसाब नींद की गोलियाँ खिला देता हूँ। मुझे समझ ही नहीं आता कि मैं करूँ क्या। जो संस्कार मुझे माँ और बाऊ जी से मिले हैं उनके रहते तो मैं किसी को कष्ट तक पहुँचाने के बारे में नहीं सोच सकता, किसी को मारना तो दर किनार रहा। फिर भला मैं अपने ही पिता की जान कैसे ले सकता हूँ? मैं यह तो कर सकता हूँ कि कोई मौत की कगार पर खड़ा हो तो उसे बचाने के लिए जी जान से जुट जाऊँ, किन्तु किसी को मौत देना।

मैं समझ रहा था कि बाऊ जी का दर्द शारीरिक होने के मुकाबले मानसिक कहीं अधिक है। किन्तु मैं उनकी बात कैसे मान लेता? युथेनेसिया यानि कि रहम या दया वाली मौत के विरुद्व तो बाऊ जी स्वयं कितनी बार पुरज़ोर दलीलें दे चुके थे, 'मैं कहता हूँ आप भगवान कैसे बन सकते हैं। जब जीवन देना आपके बस में नहीं तो आप जीवन ले कैसे सकते हैं। डाक्टरों को क्या मालूम कि मरीज़ कब ठीक हो जाए। क्या हमने चमत्कार होते स्वयं नहीं देखे?' डाइनिंग टेबल पर बाऊ जी इस विषय पर कितनी बार अपने विचार प्रकट कर चुके थे। यहीं वह समय होता था जब बाऊ जी फ़ांसी की सजा, पुलिस को हथियार दिए जाना और ब्रिटेन और अमरीका के सम्बन्धों पर बाऊ जी हमसे बात किया करते थे।

धीरे-धीरे बाऊ जी यह बात समझते जा रहे थे कि मैं उनकी बात मानने वाला नहीं हूँ। किन्तु उन्हें यह बात समझ नहीं आ रही थी कि उनका बार बार मुझे यह बात कहना कितना विचलित कर रहा है भीतर ही भीतर मैं कितनी बार मर रहा हूँ। उन्हें मारने का अर्थ मेरे लिए आत्महत्या ही तो है। उनके भीतर जो मैं जिन्दा हूँ, उसकी हत्या भला मैं किस प्रकार कर सकता हूँ?

बाऊ जी ने निर्णय ले लिया था। उन्हें सदा ही स्थितियाँ अपने नियंत्रण मे लेना सही लगता था। अब भी उन्होंने ठीक वैसा ही किया। उन्होंने बिना किसी से कुछ कहे खाना पीना छोड़ दिया। उनका शरीर बस एक कंकाल बनता जा रहा था। वे बिना हिले डुले बिस्तर पर पड़े रहते, घंटों शून्य में ताकते रहते। उनकी ओर देखने भर से ही मन में दर्द होने लगता था।

बाऊ जी के इस सत्याग्रह ने घर में सब की पीड़ा और तकलीफें इतनी अधिक बढ़ा दी थीं कि परिवार का प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को दोषी महसूस करने लगा था। मेरे मन में कभी कभी यह चाहत भी सिर उठती कि किसी भी तरह घर का माहौल फिर से नॉर्मल हो जाए। कई बार बाऊ जी पर क्रोध भी आता कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। दुनियाँ में कितने लोगों को पक्षाघात होता है। वे सब जीवन के साथ किस आसानी से समझौता कर लेते हैं। किन्तु बाऊ जी ने तो। अचानक मैं स्वयं ही अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता, शर्म से अपना सिर छुपा लेता, दु:खी हो जाता। यदि मेरा यह हाल था तो माँ किन हालात से गुज़र रहीं होंगी।

अब तो मैं भी मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा था कि किसी भी तरह बाऊ जी के जीवन का अंत हो जाये। मैं उन्हें इस प्रकार घिसटते, तड़पते नहीं देख सकता था। मुझे अहसास हो चुका था कि बाऊ जी की तबीयत में अब कोई सुधार नहीं आने वाला है। मैं सुबह जब नींद से जागता तो मन के किसी कोने में यह उम्मीद-सी लगी होती कि समाचार मिलेगा कि बाऊ जी चल बसे।

चार वर्ष बीत गए इसी समाचार की प्रतीक्षा में। इस बीच क्लेयर मेरी पत्नी बन चुकी थी। बाऊ जी मृत्यु की प्रतीक्षा में पड़े थे और मेरे लिए निर्णय लेने की घड़ी आ पहुँची थी। मुझे जीवन और मृत्यु में से एक का चुनाव करना था। किन्तु यह निर्णय बाऊ जी के विषय में नहीं था। मेरी पत्नी क्लेयर माँ बनने वाली थी। बाऊ जी के मन में भी एक बार फिर से जीने की तरंग जाग उठी थी। वे मेरे बच्चे को गोद में लेना चाहते थे। पुरानी कहावत है कि असल से सूद अधिक प्यारा होता है। वे भी अपने सूद को देख लेना चाहते थे, महसूस कर लेना चाहते। उस रात उन्होंने मुझे बुला कर कहा था, 'जीतू मैं कुछ दिन और जीना चाहता हूँ यार। तेरा बेटा देख कर मरूँ तो चैन से मरूँगा।' मुझे पल भर के लिए महसूस हुआ कि बाऊ जी में जिजीविषा एक बार फिर जाग गई है। मैं चहका था, 'बाऊ जी जुड़वाँ होने वाले हैं। जुड़वाँ। एक दादी का एक दादा का।'

एक हल्की फीकी-सी मुस्कान ! क्लेयर को अभी छठवाँ महिना ही चल रहा था। उसे जचगी के दर्द होने लगे। डाक्टरों का कहना था कि डिलिवरी तत्काल करना आवश्यक था क्यों कि गर्भाशय में ही बच्चों की मृत्यु हो जाने का भय था। सिजीरियन ऑपरेशन ही एकमात्र विकल्प था। अल्ट्रासाऊण्ड के माध्यम से यह पता चलते ही कि जुड़वाँ पुत्र होनेवाले हैं हमने तो उनके नाम भी रख लिए थे - भारतीय नाम हरीश और आनंद, किन्तु क्लेयर के लिए हैरी और एण्डी। अपने मित्रों में तो वे इन्हीं नामों से जाने जाते।

किन्तु डाक्टरों के एक प्रश्न ने हमारे सामने एक बिकट स्थिति पैदा कर दी, 'देखिये, मिस्टर मेहरा, फैसला आप को करना है। इन बच्चों के जीवित रहने के कोई विशेष आसार नहीं हैं। फिर भी हम कोशिश करके देख सकते हैं। बात यह है कि यह दोनों जितना समय भी जीवित रहेंगे, सुइयों और दवाइयों के बल पर ही। यदि हम कुछ भी न करने का निर्णय ले लें, तो हम इन दोनों को मुक्ति दे सकते हैं।' सूजन रो दी। वह किसी भी तरह अपने बच्चों को बचा लेना चाहती थी।

मेरे सामने एक बार फिर से जीवन और मृत्यु का प्रश्न आ खड़ा हुआ था। बाऊ जी की याचना भरी आँखे मुझ में दहशत पैदा किए जा रही थीं। लगा जैसे बाऊ जी ही एक बार फिर मेरे कानों में फुसफुसा रहें हों, 'मुझे मार डाल बेटा। मुझे मार डाल' और मैं कुछ भी सोच पाने में असमर्थ महसूस कर रहा था। जो काम मैं अपने बाऊ जी के लिए नहीं कर पाया क्या अपने होनेवाले बच्चों के लिए कर पाऊँगा। क्या उन नन्हीं उँगलियों को उन गुलाबी होठों को उन कमज़ोर बालकों को मुक्ति दिलाना मेरे लिए संभव हो पाएगा? समस्या कठिन है। हल कहाँ से ढूँढू?

क्लेयर की ओर एक बार फिर देखा, नज़रों ही नज़रों में कुछ समझाया। किन्तु क्लेयर आज जिस स्थिति में थी उसे मैं भली-भाँति समझ रहा था। क्लेयर के हाँ करने का तो प्रश्न ही नहीं था। मैंने स्वयं ही डाक्टर को अपना निर्णय सुना दिया। हैरी और एण्डी अब इंजेक्शनों का दु:ख नहीं सहेंगे उन्हें मुक्ति अवश्य मिलेगी।

बाऊ जी के लिए यह समाचार जानलेवा सिद्ध हुआ। उनकी मुक्ति भी हैरी और एण्डी के साथ ही साथ हो गई।

मेरे मन में विचित्र-सा अपराध बोध घर करने लगा था। मैं पाँच वर्ष तक अपने बाऊ जी को नरक में घिसटता देखता रहा, उनकी मुक्ति के लिए कुछ नहीं कर पाया। किन्तु अपने उन पुत्रों के लिए मैंने इतनी जल्दी निर्णय कैसे ले लिया। क्या मैं अपने बाऊ जी को अपने अजन्मे पुत्रों से कम प्यार करता था?

 

१५ मई २००१

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