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विमल महाजन ने आज दफ़्तर से
अवकाश ले रखा था। उन्हें कई दिनों से लग रहा था जैसे उनका शरीर
आवश्यकता से अधिक थकता जा रहा है। उन्होंने फैसला किया कि आज
केवल आराम ही किया जाए, देर तक सोए। उठकर आराम से सुबह के
कामों से निवृत्त हुए, और समाचार-पत्र लेकर बैठ गए।
आजकल समाचार-पत्र पढ़ने में
उन्हें कोई विशेष रुचि नहीं रही थी। पंजाब में हो रही घटनाओं
को पढ़कर उन्हें एक अजीब-सी बेचैनी होने लगती। उन्हें हमेशा
याद आता था अपना वह छोटा-सा गाँव ज़गरांव ज़हाँ उनका जन्म हुआ
था, लुधियाना के करीब ही। जब कभी बहुत प्रसन्न मुद्रा में
होते, तो कहते, 'इस जगरांव में हिंदुस्तान की दो महान
विभूतियों ने जन्म लिया है- एक थे लाला लाजपत राय, और दूसरा!'
और वह हँस पड़ते। किंतु आजकल जैसे स्वयं से ही सवाल पूछते रहते
थे, 'क्या हो गया है अपने पंजाब को?' एक दिन बहुत भावुक होकर
बोले, 'रंजना, हम तो एकदम 'स्टेट-लेस' होकर रह गए हैं। यहाँ
बंबई वाले तो नारा लगाते हैं 'सुंदर मुंबई मराठी मुंबई', यानी
हम तो यहाँ के कभी नहीं हो सकते। और पंजाब जाने का अर्थ है,
मौत को दावत देना। इतना बुरा हाल तो सैंतालीस में भी नहीं हुआ
था।' और फिर वे एक गहरी सोच में डूब गए थे। कितना भयावह विचार
है! आपकी मातृभूमि आपसे छिन जाए, बिना किसी अपराध के। |