मुखपृष्ठ

पुरालेख-तिथि-अनुसार -पुरालेख-विषयानुसार -हिंदी-लिंक -हमारे-लेखक -लेखकों से


कहानियाँ  

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस माह प्रस्तुत है
यू.के. से उषा राजे सक्सेना की कहानी— उससे मिलना।


'मे आई गेट यू समथिंग मैम . . .?
एला ने सिर उठा कर देखा, मुस्कराता हुआ एक आकर्षक युवक काले पैंट और कमीज़ पर एप्रेन बाधे हाथ में ऑर्डर–पैड और पेन पकड़े, मुस्कराता हुआ उससे ऑर्डर लेने की मुद्रा में शालीनता और मुस्तैदी से खड़ा है।

उसे देख कर एला डनबार के आँखों के सामने वह दृश्य सजीव हो उठा। जब सात वर्ष पूर्व वह अपने बाप के शक्तिशाली व्यक्तित्व के नियंत्रण से छुटकारा पाने के लिए रोष में एडिनबरा स्थित उसके विशाल घर तथा सुख–सुविधओं को पल–भर में छोड़ कर भागी थी। उस समय उसका आत्मविश्वास इस बुरी तरह से डगमगा रहा था कि वह सिवाय रेस्तरां में काम करने के अतिरिक्त कोई और काम करने की सोच ही नहीं पा रही थी। उसने पहली नौकरी ऐसे ही किसी रेस्तरां में पकड़ी थी। वह भी इसी तरह लोगों से ऑर्डर लिया करती थी। ग्राहक से बातें करते समय आकर्षक मुस्कराहट और हल्की–फुल्की फ्लर्टिंग अच्छे टिप के लिए ज़रूरी थी। वर्ना लंदन जैसे श
हर में सिर्फ वेतन में कतई गुज़ारा नहीं हो सकता था।

गर्दन को ज़रा घुमा कर एला ने मुस्करा कर कहा "सॉरी मैं खयालों में कुछ ऐसी डूब, कि तुम्हें देख ही नहीं पाई।"


"दैटस् ओ के मैम। कैन आई गेट यू, अ वेक–अप ड्रिंक? वाईन बीयर और समथिंग मोर एक्साइटिंग? व्हाइल यू आर वेटिंग फॉर योर फ्रेंड।" उसने फिर एक आकर्षक मुस्कराहट एला की ओर फेंकी
"फ्रैंड! हॅु–ह माई फुट वह किसी का दोस्त नहीं हो सकता है।" एला ने मन–ही–मन कहा।
"जस्ट अ ग्लास ऑफ मिनरल वॉटर प्लीज! इफ यू डोन्ट माइंड" एला ने कहा। अगर वह ठीक समय पर नहीं आया तो मैं उसका इंतजार नहीं करूँगी। और फिर उसने घड़ी की ओर देखा अभी सात बजने में दस मिनट बाकी थे।
पृष्ठ : 1। 2। 3
आगे—

वह अपने पिता से मिलने सिर्फ मिर्चा के कहने पर आई थी वर्ना उसने तो उसे अपने जीवन से कभी का निकाल दिया था पर क्या सचमुच वह उसके जीवन से निकल चुका था? . . .मिर्चा ऐसा नहीं मानता है। वह कहता है, "एला तुम्हारे मन में आज भी उसके लिए भावनाएँ हैं, और उसकी यादें परछाई की तरह तुम्हारे साथ चलती हैं।" वाकई मानव मन गुत्थियों से भरा होता है। मैं भी भला उसे कहाँ भूल पाई। अक्सर रात में सपने उसकी यादों पर पड़ी धूल हटा दिया करते हैं।
 
वेटर ने पानी का ग्लास टेबल पर रखा तो एला की तंद्रा फिर टूटी।
'मन का संतुलन बनाए रखने के लिए मुझे जिन और टॉनिक की सख्त ज़रूरत है पर उस जैसे सख्तजान व्यक्तित्व का सामना अल्कोहल से आए असंतुलन से करना ठीक नहीं है। मुझे शांत, सौम्य होने के साथ ही, पूर्णरूप से संतुलित भी होना होगा', एला ने सोचा। वेटर के जाने के बाद उसने फिर घड़ी पर नज़र डाली। पिछले पाँच मिनट में वह दस बार घड़ी पर नज़र डाल चुकी थी। यदि अगले सात मिनट में वह नहीं आया तो मैं एक मिनट भी उसका इंतज़ार नहीं करूँगी. . . उसने खुद से कहा। सच बात तो ये है कि उसके व्यक्तित्व का सम्मोहन अब फिर उसपर तारी हो रहा था। एला का मन उससे मिलने को बेचैन हो उठा . . .कैसा लगता होगा वह। पता नहीं अपने हाई–फाई जीवन के बीच उसने कभी मुझे 'मिस' भी किया या नहीं? क्या लोगों का स्वभाव समय के साथ बदलता है? इतने दिनों में वह कुछ तो बदला होगा? मिर्चा का कहना है समय और परिवेश लोगों के स्वभाव और चरित्र पर असर जरूर डालता है पर वह व्यक्ति के जन्मजात गुण नहीं बदलता। शिशु अपने 'जेनेटिक्स' ले कर पैदा होता है। उसके चरित्र के सारे गुण बीज के रूप में उसमें जन्म से मौजूद होते हैं। परिस्थितियाँ और परिवेश उस पर असर डालते हुए उसे गढ़ती हैं। पर व्यक्ति के मौलिक गुण सदा वही रहते हैं। व्यक्ति के 'जेनेटिक्स' उसे बदलने नहीं देते हैं। एला की यादें उसे उदिग्न करती हैं, क्या यह सच है, लोग पैदाइशी मृदु–भाषी कठोर निर्दयी उदार या स्वार्थी होते हैं? क्या लोग सचमुच अपने वंशानुगत बनावट के दास होते हैं? एला के मन में तमाम प्रश्न उठ रहे थे और प्रत्येक प्रश्न के घेरे में उसकी उपस्थिति मौजूद थी। उसने सिर उठा कर रेस्तरां का निरिक्षण किया। एक छोटा सा कैफे–बार, जहाँ दिन में भी हल्का–सा अंधेरा रहता है, पर्दे गहरे लाल केसमेंट के। लंबी खिड़कियाँ नीले और लाल स्टेन–ग्लास की। कॉफी के प्याले, ग्लास और कुर्सियाँ 'अ बिट फंकी' उसने सोचा। संगीत रैज–मैटाज्म, वाल्यूम जरा ऊँचा।

सब कुछ उसकी पसंद के विपरीत है। एला ने जानबूझ कर यह जगह चुनी है। उसकी पसंद ऊँची है। वह हर चीज़ एक विशेष उच्च–वर्ग के मानदण्ड से देखता है। कुछ भी हो, एला ने मुँह बनाया वह मुझसे मेरी ज़मीन पर मिलेगा। मुझे उससे न तो कुछ लेना–देना है न ही मुझे उससे कोई दहशत है। मैं अपना जीवन अपने ढंग से जीना चाहती हूँ। मैं तो उसे भुला ही चुकी थी। पर मिर्चा का कहना है, वर्तमान को एक विशेष मोड़ देने से पूर्व मेरा उससे एक बार मिल ही लेना ठीक होगा। वर्ना मेरा भूतकाल मुझसे सदा सवाल करता रहेगा और वह मेरे जीवन में सदा एक स्याह घेरे की तरह साथ चलता रहेगा और मेरी कुंठाएँ मुझे जीने नहीं देंगी।

सात साल। ठीक सात साल चार महीने तीन दिन सात घंटे बाद मैं उससे मिलूँगी। क्या आज भी वह वैसा ही शानदार और प्रभावशाली होगा? क्या उसके चेहरे पर वही खूबसूरत मुस्कराहट होगी? एला का मन चंचल हो उठा। भावनाओं का ज्वार उसे उत्तेजित और नर्वस, दोनों ही कर रहा था।
तभी दरवाजे पर कुछ हलचल हुई। वह रेस्तरां के अंदर आ चुका था। वेटर संकेत से उसे एला का टेबल दिखा रहा था। आगे बढ़ने से पहले उसने मुस्कराते हुए हाथ हिला कर अपने आप का आभास एला को दिलाया। 'टिपिकल ऑफ हिम' एला जज्बाती हो उठी। वह दौड़ कर उसके गले से झूल जाना चाहती थी उसकी बाँहों में समा जाना चाहती थी। ओह! यह कैसा उन्माद! यह कैसी हलचल! अचानक उसकी रीढ़ की हड्डी सनसनाई, दिमाग में बगूला उठा पेट में मछलियाँ फड़फड़ाईं। स्नायु–तंत्र उत्तेजना से तन्नाई। अरे! यह सब क्या हो रहा है? ओ शिट! वह उत्तेजित क्यों हो रही है? उसने अपने आपको कोसा। इतनी देर से संयत रहने का जो परिश्रम वह कर रही थी वह सब व्यर्थ गया न? एला बस रो पड़ने वाली थी कि उसने लम्बी साँस खींची और मिर्चा को याद किया, फिर संतुलित कदमों से उसकी ओर बढ़ी वह हल्के से हँसा फिर आगे बढ़ कर प्यारके आवेग के साथ उसने उसे बाँहों में भर लिया . . .और दनादन उसके दोनों गालों पर कई चुम्बन जड़ दिये। एला भाव–विभोर! उसकी बाहों में समाती चली गई . . .वह उससे फिर कभी बिछड़ना नहीं चाहती थी। 'ओह! मिर्चा अगर मुझे इस तरह इससे लिपटा, और भावतुर देखे तो भला क्या कहेगा।' उसने अपने भावनाओं के ज्वार को नियंत्रित करते हुए मन–ही–मन कहा।

उसने एला के कमर में हाथ डाल कर प्यार से उसे अपने और करीब कर लिया। एला को अच्छा लगा। वह उससे लिपटी उसके बदन की गर्मी और स्पर्श को अपने अन्दर समोती उसके कदम से कदम मिलाती टेबल की ओर बढ़ी।

टेबल के पास पहुँच कर उसने कुर्सी को हल्के से बाहर की ओर खींचा फिर दोनों हाथों से एला को सहेजते हुए किसी साम्राज्ञी की तरह उस पर बैठा कर अपना कैशमेयर टॉपकोट और स्कार्फ पास खड़े वेटर के हाथों में पकड़ाया फिर कुर्सी पर बैठते हुए रेस्तरां और बार का निरीक्षण किया। उसकी शरबती आँखों में मनोरंजन भरा कौतूहल था। 'फनी प्लेस'। उसने मुस्कराते हुए एला के समूचे अस्तित्व को आँखों में भरकर संतुष्ट भाव से देखा।

वही वही बिल्कुल वही वह कहीं से भी नहीं बदला था। शायद उसने उसे ऐसी जगह पर बुला कर गलती की। सच! वह ऐसी जगह जाने का बिल्कुल आदी नहीं है। एला को याद आया उसकी पसंद कभी भी सवाए हिल्टन या डोरचेस्टर से कम नहीं रही है। पर आखिर मैंने उसे बुलाया ही क्यों? यह सब मिर्चा का कसूर है, उसने भन्नाते हुए खुद से कहा। उसी ने कहा था इसीलिए तो। इस तरह, अपने मन को समझा कर वह थोड़ी संतुष्ट हुई।

'तुम्हारी चिठ्ठी मिली तो बहुत अच्छा लगा। वर्ना मैंने तो मन को समझा ही लिया था कि शायद तुम मुझसे कभी सम्पर्क ही नहीं करोगी।"

"सच मैं तुम्हें पत्र कभी न लिखती पर मिर्चा ने कहा इसलिए लिख दिया। पर तुमने भी तो कभी कोई चिठ्ठी नहीं लिखी।' एला ने हल्के रोष और मान से कहा।

"ऐस मत कहो एला मैंने तुम्हें कई पत्र लिखे पर सभी पत्र मेरे पास, 'रिटर्न टू द सेन्डर' के नोट के साथ वापस आ गए। तुमने अपना कोई फारवर्डिंग एड्रेस या फोन नम्बर भी तो नहीं छोड़ा।" उसने उसी गहरी, प्रभावशाली और संतुलित आवाज़ में एला की आँखों में सीधा देखते हुए कहा। वह भला कभी गलत हो सकता है, एला को वे बीते हुए दिन याद आ गए जब घर में केवल एक ही व्यक्ति सही हो सकता था। और वह था 'वह'।
"मैं तुमसे नाराज़ जो थी तुम्हारे ताना–शाही में मेरा दम घुट रहा था।" एला ने बिगड़ कर कहा।
"घर छोड़ते समय तुमने कहा था तुम स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहती हो, और अपने अनुभव एकत्रित करना चाहती हो। तुम वयस्क थी, साथ ही तुम मेरी सुनती भी कहाँ थी। तुम्हारा मुझ पर से विश्वास जो उठ चुका था।"
"तुम्हें सबकुछ याद है। तुम बिल्कुल नहीं बदले। क्या मैं ही हमेशा गलत होती थी?" एला ने संयम बरतते हुए भी उस पर सीधा हमला किया। उसका मन उद्वेलित हो रहा था। भावनाओं का ज्वार उठ और गिर रहा था।
वह एला के मन में उठते द्वंद्व को समझ रहा था। अतः उसने बड़े ही करीने और चतुराई से विषय बदला। वह एला को अच्छे मूड में देखना चाहता था। एला भी उसे कहाँ 'अपसेट' करना चाहती है। पर उसकी दमित ग्रंथियाँ उसे संभलने दें तब ना।
"अच्छा तो एला, बताओ न तुम्हारा काम कैसा चल रहा है। तो तुम 'मर्चेट एन्ड मिल्स' में पार्टनर हो गई हो।" उसने मुस्कराते हुए कहा तो एला का आत्मविश्वास सूरज की पहली किरण सा जगमगा उठा।
"यप्प।" एला चिड़िया की तरह चहकी।
"दैट्स ग्रेट। लेट्स सेलिबे्रट।" कहते हुए उसने चुटकी बजा कर वेटर को बुलाया। वही सेविल रो के 'वेल–कट' कपड़ों का चयन, वही शानदार व्यक्तित्व, वहीं स्वरों की गूँज कहीं कोई बदलाव नहीं। आँखों के कोरों पर उभर आई खूबसूरत 'लाफिंग लाइन्स' उसे दुनियाँ का सबसे आकर्षक व्यक्ति बना रही थी। शायद इसीलिए तमाम औरतें उसपर मरती हैं। जब हँसता है तो उसका चेहरा कोमल और आकर्षक हो उठता। . . .और मिर्चा, मिर्चा की खूबसूरती उसके सहजता और सरलता में हैं। उसमें कोई आडंबर नहीं है। उसके लिए कपड़े कोई मायने नहीं रखते हैं। 'कपड़े सिर्फ तन को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है' मिर्चा कहता है। वह हफ्तों एक टी–शर्ट टैटी जीन्स और चाइनीज टेक–अवे खाकर गुज़ार सकता है। उसे बाहर जाने की जरूरत नहीं, वह किचन में मसालों के साथ 'एक्सपरिमेंट' करते हुए रिलैक्स करता है।

वह मेनू हाथ में उठा कर एला की ओर देखता है, पल भर को एला की आँखें उसकी आँखों में उलझ जाती है। वह मुस्करा कर एला के पसंद के चिकन–टीक्का और शीख कबाब के साथ बोजुले की विंटेज आर्डर करता है।

एला के अंदर भावनाएँ उथल–पुथल करती जोर–शोर से हुल्लड़ मचाने लगती हैं उसे उसकी पसंद याद है। एला ठगी सी रह जाती है। वह उससे ढेरों प्रश्न करना चाहती है जाने क्या–क्या कहना–जानना–पूछना चाहती है पर उसकी ज़बान तालू से चिपक जाती है। बस इतना ही कह पाती है, "तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?" यह भी कोई प्रश्न है। स्टूपिड कहीं की! वह खुद को डाँटती है।
"बढ़िया . . .बहुत बढ़िया काम बहुत बढ़ गया है। अब मेरी यात्राएँ सिर्फ यू.के. तक ही सीमित नहीं है, मेरा एक पैर सदा हवाई जहाज में रहता है। अब बिज़नेस दुनियाँ के हर कोने में फैल गया है . . .कभी अमेरिका कभी इंडिया कभी जापान . . ." कहते हुए वह हँसता है तो उसकी दंत–पंक्तियाँ झिलमिला उठती है।
"साथ ही वाइन, विमेन और . . ." एला का 'पास्ट' उसे उकसा गया और फिर उसने व्यंग्य करते हुए ताना मार ही दिया।

ओह! शिट, एला अपने आप को धिक्कारते हुए ग्लानि अनुभव करती है। लगता है वह फिर लड़ने पर उतारू है और अब सब कुछ स्पॉइल कर के ही दम लेगी। ओह! एला, यू स्टूपिड ग्रो–अप नाउ . . .उसने मन–ही–मन कहा।
वह एला के मन में उठते हुए ज्वार को समझता है, अतः मुस्करा कर एला के टिप्पणी को गोल करते हुए बातों का नया सूत्र उठाता है। एला उसकी आवाज सुनते–सुनते किसी और दुनिया में पहुँच जाती है। वह हाँ या ना में सिर हिलाते हुए गुज़रे दिनों को याद करती है। कब और कैसे सबकुछ गड़बड़ा गया? और उसके प्रति उसके मन में ढेरों हीनता की ग्रंथियाँ बन गई। और वह उसके छाया से भी घबराने लगीं।

अचानक वातावरण में खामोशी छा जाती है। वह एला से उत्तर की अपेक्षा करता है तो एला सकपका जाती है, और कहती है, "हाँ, तो तुम कुछ कह रहे थे?"
वह फिर मुस्कराता है, और मेज़ पर रखे उसके हाथों को दोनों हाथों में लेकर सहलाते हुए कहता है, "यह पूछ रहा था कि खाने में और क्या मँगाऊँ? गुलास रोगन–जोश राइस रशीयन सलाद और पीटा ब्रेड . . ."
"ओह! तुम्हें मेरी सारी पसंद याद है। तुम तो कुछ भी नहीं भूले हो!" एला उसकी ओर गर्वीली दृष्टि से देखती है और वह ठहाका लगा कर हँस पड़ता है। वेटर ऑर्डर ले कर चला जाता है। एला की उँगलियाँ नैपकिन से खेलने लगती है, वह नैपकिन को उसके हाथों से अलग कर उसकी उँगलियों के साथ 'दिस लिटिल फिंगर' जैसा खेल खेलने लगता है। फिर कुछ रुक कर उसकी ओर देखकर कहता है, "एला मैं चाहता हूँ तुम मेरे साथ स्पेन चलो और वहाँ 'विला–मारबेया' में मेरे साथ रहो।' उसकी भौंहें प्रश्नवाचक मुद्रा में ऊपर की ओर उठ जाती हैं।
अचानक वह रोष जो कुंडली मारे एला के अवचेतन में बैठा हुआ था फुफकार उठता है, "क्या? मैं सबकुछ छोड़–छाड़ कर तुम्हारे पास स्पेन चली आऊँ। ओह! तुम कितने स्वार्थी हो। सिर्फ अपने बारे में सोचते हो। यहाँ जो कुछ मैंने सात सालों में बनाया है वह क्या ताश के पत्ते है? जिन्हें तुम कहते हो, मैं फूँक मार कर उड़ा दूँ। तुमने सदा मेरी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है! तुम्हें पता है इसीलिए मैं तुमसे कितनी घृणा करती हूँ? मैं क्या तुम्हारी दास हूँ? कि बस तुम्हारे पीछे भागती रहूँ!"
एला के आक्षेपों से उसका उसका चेहरा लाल हो कर अवसाद से पीला पड़ जाता है वह बड़े ही कोमल शब्दों में एला को समझाता है, "एला मैंने जान–बूझ कर ऐसा कुछ भी नहीं किया। वे मेरे शुरू के दिन थे। संघर्ष के दिन थे। पैर जमाने के दिन थे। मुझे देर रात तक काम करना होता था। काम और काम के अलावा मुझे कुछ समझ नहीं आता था।'
वह एला को शान्त करने की कोशिश कर रहा था पर एला का सुप्त आक्रोश ज्वालामुखी–सा आग उगल रहा था। वह उसकी कोई बात नहीं सुनना चाहती थी।
"मैं सब जानती हूँ। मैं तुम्हारे रास्ते की रोड़ा थी। तुम आज़ादी चाहते थे। मेरी वजह से तुम उन औरतों से खुल कर नहीं मिल पाते थे इसलिए तुम अक्सर बाहर राते बिताते थे। और मैं तुम्हारा इंतजार करती रहती थी। पर तुम्हें भला मेरी भावनाओं को समझने की क्या ज़रूरत थी।"
एला की ग्रंथियाँ खुल रही थी। एक ओर वह तूफानी हो रही थी तो दूसरी ओर बर्फ सी ठंडी . . .साथ ही वह उसे उद्वेलित करते हुए भी उससे शान्ति और शीतलता की अपेक्षा रखती है। क्यों? एला तुम्हें मुझसे बहुत सी शिकायतें हैं। और तुम्हें पूरा हक है शिकायत करने का। मैं तुम्हारे दुःखों को समझता हूँ। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि तुम अकेला मत महसूस करो। तुम मार्था को पसंद करती थी इसलिए मैंने मार्था को तुम्हारी सहयोगिनी की तरह घर में रखा। मुझे दुःख इस बात का है तुम फिर भी अकेली रही। मैं तुम्हारे लिए सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं कर सका।" और उसके हँसते हुए चेहरे पर फिर दुख और क्षोभ साकार हो उठा।
एला उसके चेहरे पर उमड़ आए दुःख से कातर हो उठी। नहीं! नहीं! वह उसे इस करूण स्थिति में नहीं देख सकती है। उसे उसके साथ इतना कठोर नहीं होना चाहिए। काश! वह अपने उसी पुराने स्वाभिमानी अधिकार भरे जकड़न के साथ कहता "इनफ एला नॉट एनअदर वर्ड यू आर कमिंग एन्ड दैटस् इट।" तो अच्छा होता।
"ठीक है एला मैं तुम्हारी बात समझता हूँ।" उसके स्वर में करूणा थी, "तुम्हारे भावनाओं का मैं आदर करता हूँ। तुम मुझसे रुष्ट हो तो क्या? मैं तुमसे सम्पर्क रखूँगा। जब तुम चाहोगी मैं तुमसे मिलने दुनिया के किसी भी कोने में आऊँगा। तुम्हें पत्र लिखता रहूँगा। फोन भी करूँगा . . .।"
उसने फिर विषय बदला, बोला, "यह ज़रा अलग हट कर रेस्तरां हैं, क्यों? कुछ अजीबो–गरीब। क्यों एला! पर तुम्हें पसंद है तो अच्छा है। वैसे खाना और सर्विस बढ़िया हैं।
एला को अच्छा लगा कि आखिर उसे समझ तो आया कि उसकी दुनिया के अतिरिक्त भी कोई दुनिया है जहाँ और लोग भी साँस लेते हैं, जहाँ उसके अदब और कायदे नहीं चलते हैं, जहाँ लोग अपने निर्णय खुद लेते हैं। सारी ज़िंदगी उसने उसके जीवन को नियंत्रित किया। कहाँ जाना है? किससे मिलना है? कैसे रहना है? क्या खाना है? क्या नहीं खाना है? अंत में एक दिन वह उससे लड़ कर लंदन चली आई थी।
"मैंने तुम्हें बहुत मिस किया एला। तुमने मुझे गुडबाय का भी अवसर नहीं दिया।"

"मिस किया शायद इसीलिए तुमने मुझसे कोई सम्पर्क नहीं किया!" एला ने फिर उसे ताना मारा।
"ओह! एला तुमने अपना कोई फारवर्डिंग ऐड्रेस नहीं दिया, फोन नंबर या इ–मेल का पता भी नहीं दिया। कहाँ चिठ्ठियाँ भेजता?।"

एला फिर बिखर पड़ी, "मुझे मालूम है, तुमने मुझे खोजने की कोई कोशिश नहीं की वर्ना तुम मेरे दोस्तों से मेरा पता पूछ सकते थे। इंटरनेट से मेरा ई–मेल पता खोज सकते थे। नहीं! नहीं! तुम्हें तो अपने व्यापार के आगे किसी का खयाल ही नहीं रहता है। तुम बला के स्वार्थी हो। कम–से–कम जीवन में एक बार तो इस कड़वे सच को स्वीकार कर लो।"
एला की बातों से उसके हृदय पर फिर आघात होता है। उसके चेहरे से मुस्कराहट गायब हो जाती है, उसका स्वाभिमान धूमिल पड़ जाता है। उसका मन कराह उठता है। फिर भी वह सारे आक्षेपों को सहन करते हुए भी एला की बातों को मुस्कराते हुए एक खूबसूरत मोड़ देता है। बातों की कला में माहिर जो है, एला को उस पर प्यार आता है।
"अच्छा एला यह तो बताओ, तुम्हारी सोशल लाइफ कैसी है? आर यू गोइंग आउट विथ समवन?"
एला का गोरा रंग गुलाबी हो उठता है, हल्की सी शर्म उसकी आँखों में झाँक जाती है। वह सकारात्मक अंदाज़ में सिर हिलाती है। वह उसके उत्तर पर मुस्कराकर अपनी प्रसन्नता प्रगट करता है।
"कौन है वह? उसका नाम क्या है? बताओगी नहीं एला?" उसकी आवाज में खुशी की खनक एला को सुनाई देती है।
"वह हंगेरियन है। उसका नाम मिर्चा है। 'मर्चेंट एन्ड मिल्स' में हम दोनों बराबर के पार्टनर हैं और हम साथ रहते हैं।"
वह हल्के से दाहिनी आँख को दबाकर, मुस्करा कर पूछता है, "यह मिर्चा तुम्हारा खयाल अच्छी तरह रखता है क्या?" उसके स्वर में स्नेहपूर्ण चिंता थी।
"तुमसे तो अच्छा ही रखता है।" एला ने फिर हँसते हुए स्नेहपूर्ण ताना मारा उसने प्यार से एला का हाथ अपने दोनों हाथों में ले कर सहलाते हुए अत्यंत सावधानी एवं मधुर स्वर में कहा, "एला तुमने अपने पत्र में बहुत सी ऐसी बातें लिखीं जिनका मुझे पता ही नहीं था। मैं तुम्हारा अपराधी हूँ। मैंने तुम्हें दुख दिया। मैं कितना स्वार्थी और अहमी हूँ कि मैं तुम्हारे अंदर होते उथल–पुथल को समझ ही न सका। सच मैं तो निराश हो चुका था कि मैंने तुम्हें खो दिया और अब शायद तुम मुझे कभी नहीं मिलोगी।"
"फिर?" उसने प्रश्न किया, "तुम्हारा हृदय कैसे बदला?"
मैं जीवन के ऐसे मोड़ पर खड़ी थी जहाँ मुझे अपने जीवन के बारे में गम्भीर निर्णय लेने थे . . .ऐसे में मिर्चा ने कहा, "अपने भविष्य के लिए कोई भी निर्णय लेने से पहले मुझे अपने टूटे रिश्तों और उनसे उलझे भावनात्मक तंतुओं को सुलझा लेना चाहिए। नहीं तो बीता हुआ कल बार बार मुझे सताता रहेगा।"
"लगता है मिर्चा बहुत ही सुलझा हुआ व्यक्ति है, उसे जीवन का गहन अनुभव है।"
"हाँ, वो तो हैं।"
कहते कहते एला खामोश हो जाती है। पिछली तमाम खट्टी–मीठीं यादें उसे भावुक कर देती है। आँखों में पानी भर आता है। गले में दर्द की गुठली अटक जाती है। आवाज़ रूद्ध हो जाती है। वह बहुत कोशिश करती है पर आँखें सारा राज़ खोल देती है।
वह जेब से रूमाल निकाल कर एला के गालों पर लुढ़क आए आँसुओं को पोछते हुए उसका कंधा थपथपाता है और कुर्सी बदल कर उसके पास आ बैठता है। एला को अच्छा लगता है। वह उसके कंधों पर सिर रख कर सुबकने लगती है।
"जिंदगी भर मैं यही कोशिश करती रही कि मैं ही तुम्हारे जीवन की केन्द्रबिन्दु बनी रहूँ। तुम्हें पाने के लिए ही मैं तुमसे लड़ती रही। मैं नहीं चाहती हूँ कि मैं मिर्चा के व्यक्तित्व में जीवन भर तुम्हें खोजती रहूँ।"
मुझे नहीं मालूम था, कि तुम पर मेरे व्यक्तित्व का इतना शक्तिशाली प्रभाव है।
"क्यो नहीं, तुम मेरे पिता नहीं थे क्या?"
"था, क्यों? हूँ नहीं क्या?" उसने प्यार से उसे सहलाते हुए कहा, "मुझे दुःख है एला मेरी वजह से तुम्हें बहुत दुःख पहुँचा। मेरी जिंदगी का वह सबसे मुश्किल समय था। वस्तुतः तुम्हारी माँ की लंबी बीमारी और फिर उनकी असमय मृत्यु ने मुझे बिल्कुल अकेला कर दिया था। मुझमें अस्थिरता आ गई थी। मैं बिज़नेस की व्यस्तता में खुद को खो देना चाहता था। और उसी व्यस्तता में मैं तुमसे दूर होता चला गया . . ."
"नहीं नहीं ऐसा मत कहो, गलती हम दोनों की थी। हम दोनों ही आत्म–केन्द्रित स्वार्थी जिद्दी और अहमी हैं, आखिर है तो बाप–बेटी न।" कहते हुए वह आँसुओं के बीच खिलखिलाई।
कितना खूबसूरत और शानदार व्यक्तित्व है मेरी बेटी का। कितना सुखद है उसका सानिध्य उसने सोचा।
"क्या तुम मिर्चा से प्यार करती हो? क्या तुम उससे शादी करोगी?" उसके अंदर का आनंदित पिता बोला।
"हूँ" एला ने हामी भरी, "उसने पिछले महीने ही प्रपोज़ किया था। वह मुझे पसंद है।" कहते हुए एला को विस्मय हुआ कि उसने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण निर्णय को पूरे आत्मविश्वास से उसे बेझिझक सुना दिया। और उसने बिना किसी विरोध के उसे स्वीकार कर लिया। कितना सहज विश्वास है उसे मेरे चुनाव पर।
"मिर्चा कहता है, वह तुमसे मिलना चाहता है।"
"बहुत खूब! मैं भी उससे मिलना चाहता हूँ, मिर्चा जरूर ही बहुत भाग्यशाली है।"
एला आत्मविश्वास से मुस्कराती है, उसकी ग्रंथियाँ खुल रही हैं। वह सहज होती जा रही है।
"ऑफ–कोर्स डैड आई शैल अरेंज अ मीटिंग सून।" कहते हुए एला खड़ी होती है। उसके बदन में पिता के सानिध्य का सुख और संतोष फुरहरियाँ भरता है। वह बिल का भुगतान कर के एला को बाँहों में भर कर माथे पर प्यार को बोसा जड़ देता है। एला उसकी बाहों में नन्हें बच्चे सी समा जाती है। उसे मिर्चा की बात याद आती है, हममें से कोई पूर्ण नहीं है, हम सब अधूरे हैं, पूर्णता मात्र हमारी एक कल्पना है।

पृष्ठ : . .

आगे—

1

1
मुखपृष्ठ पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार । अपनी प्रतिक्रिया  लिखें / पढ़े
1
1

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक
सोमवार को परिवर्धित होती है।