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कहानियाँ 

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है यू.एस.ए से
सुषम बेदी की कहानी— गुनहगार


वह घूरे जा रही थी अख़बार के उसी पन्ने पर जहाँ इश्तहार छपा था, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह इश्तहार उसके लिए है।
यों अखबारों के इश्तहारों से शादियों के काम लेना उसके लिए नई बात नहीं थी। बेटी की शादी के लिए इसी तरह से वर चुना गया था। यहाँ तक कि छोटे बेटे के लिए भी इश्तहार निकलवाया था। वह तो यों हो गया कि इश्तहार से बात बनी नहीं और बेटा फिर अपनी पसंद की ही फिरंगी दुल्हन ले आया। वही दुल्हन अब कहती थी कि "युअर मदर शुड हैव हर ओन इन्डिपेंडेंट लाइफ़। मेरी माँ ने भी तो दूसरी शादी की है। इसमे कोई बड़ी बात नहीं। यहाँ जो रहता है उसे यहीं के रीति-रिवाज़ के अनुसार चलना चाहिए।"
"ममी कुछ गलत तो नहीं कहती वह?" बेटा बीवी की हाँ में हाँ मिलाता है। इस सब का नतीजा यह कि उसका रहने का कोई घर नहीं। बेटे के पास रहने का उसका हक छिन चुका है। छिनना तो क्या कभी दिया ही नहीं गया। यही उम्मीद की कि माँ कभी-कभार मेहमान बनके तो आ सकती है पर अपनी अकेली ज़िंदगी़ का बचा-खुचा हिस्सा उन्ही के सिरहाने काटने नहीं आएँगी। बेटी के पास जाओ तो जवाई इस तरह घूरता है कि बेटा तो रखता नहीं अब हमारे सिर पर बोझ क्यों उतार रही हो अपना। जवाई की तो ज़िम्मेदारी है नहीं कि सास की देखभाल करें।
कहाँ जाए रत्ना? अब क्या करे?
अख़बार के खुले सफ़े पर फिर से निगाह चली जाती है!
कैसे कर सकी वह?

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