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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
संयुक्त अरब इमारात से पूर्णिमा वर्मन की कहानी- 'उसकी दीवाली'


नंदिता त्रिवेदी जब 'संस्कृति' पर पहुँची तब तक शोरूम खुल चुका था।
संस्कृति यानि नंदिता त्रिवेदी का बुटीक जिसे वह पिछले दो सालों से चला रही है। सामने शोरूम है और पीछे है वर्कशॉप जहाँ कारीगर सिलाई और कढ़ाई का काम करते हैं। नंदिता ने देखा- सफ़ाई का काम पूरा हो चुका था। वर्कशॉप का दरवाज़ा खुला था। अंदर दिखती छहों मशीने चालू हो चुकी थीं। रज़िया तुरपाई की गद्दी पर जम गई थी और जिया व लीला अपने-अपने फ्रेम में कसीदे काढ़ने लगी थीं।
काउंटर पर ऊँचे स्टूल पर बैठी सुधा चाय की चुस्कियाँ ले रही थी। नंदिता की आहट पाकर वह खड़ी हो गई। नंदिता ने पर्स काउंटर के नीचे वाली दराज़ में रख कर ताला लगाया और सुधा से आज तैयार हो जाने वाले कपड़ों की सूची निकालने को कहा।
कितने कपड़े तैयार हो गए हैं और कितने बाकी हैं यह जाँच करने के लिए नंदिता ने सूची से मिलान शुरू कर दिया। सुधा ने चाय को जल्दी से ख़तम किया और काम में सहायता करने लगी।
"मिसेज़ सेठ के सूट?"
"प्रेस में हैं।"
"दोनों सूट?"
"हाँ।"
"चुन्नियाँ पीको हो गईं?"

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