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"जय दुर्गे महाकाली नमस्तुते माँ चंडी नम:। या
देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।" श्लोक के शब्द मनचाहे क्रम से ही, विस्मृत
अवस्था में भी स्वत: ही होठों तक आ और जा रहे थे।
"जय जयति ब्रह्मचारिणी जय जयंती भद्रकाली माँ सरस्वती नम:।" मानो बिस्तर पर नहीं,
माँ के मंदिर में आसित थे वे -- आश्चर्य था प्रणव भास्कर बैनर्जी को खुदपर?
"जय जय शैलपुत्री रक्त-नेत्रिणी विघ्न-विनाशिनी विंध्य-वासिनी कष्ट हरिणी नम:।"
"या कात्यायनी पार्वती कमला गौरी नंदिनी रक्षामि अहं माँ अंबे नमोस्तुते।"
मंत्र और संस्कृत सब भूल चुके थे वे परंतु रात के
नीरव सन्नाटे में भी, अनियंत्रित और उत्कंठ पाठ खुद उनके ही कानों से टकराकर
चतुर्दिक गूँजने लगा। बुद्धि और मन की सीमाएँ तोड़ते, माथे पर बहते ठंडे पसीने से,
देवी के प्रति समर्पित वे बोल, निरंकुश आँखों और होठों से बह रहे थे। माँ के हर रूप
का साक्षात्कार कर लिया था आज उन्होंने- माँ जगत जननी दुर्गा, माँ
सुख-समृद्धिदात्री लक्ष्मी, माँ आत्मसंतुष्टा, ज्ञान-वर्धिनी सरस्वती, माँ
पाप-विनाशिनी महाकाली। शक्ति का संचार था चारों तरफ़। सृष्टि और रचयिता दोनों ही से
जुड़ गए थे वे इस एक ही पल में।
खुदको नास्तिक मानने वाले प्रणव बैनर्जी के लिए यह
एक नया अनुभव था। आस्था और प्रकाश की इस रात्रि में त्रिशंकु से लटके हुए वे अपनी
अधखुली आँखों से भी, साफ़-साफ़ देख पा रहे थे माँ को। बस माँ के रेशमी आँचल के नीचे
सर रखकर भी, पूर्णत: समर्पित होकर भी, वापस सो नहीं पा रहे थे वह -- एक बेचैनी, एक
प्रश्न पूछती, उत्तर टटोलती व्यग्रता में डूब चुका था आकुल मन।
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