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दिनेश का फ़ोन कुवैत से आया
तो मैं उस समय जापान गया हुआ था। यह नौकरी भी तो एक जगह टिक कर
नहीं बैठने देती ना। दुनिया भर के शहरों का चक्कर काटता फिरता
हूँ। घर में टिक कर रह पाना तो एक बहुत बड़ी उपलब्धि जैसा लगता
है। इकबाल भाई को ईद-मुबारक कहने
के लिए टेलीफ़ोन किया और चाय की चुस्की भरने लगा। घर से निकलने की सोच ही रहा
था कि बाहर फ़ायर इंजन के चिंघाड़ने की आवाज़ आई। पता नहीं
कहाँ आग लगी थी। टैक्सी में बैठा तो पास से सर्र करती हुए
एँबुलैंस निकली। रास्ते में अंधेरी के श्मशान घाट के सामने से
टैक्सी गुज़री तो शरीर में झुरझुरी-सी उभरी। अगले ही दिन मैं और दिनेश
गुरमीत को साथ लिए एक बार फिर उस रास्ते पर चल दिए जहाँ सब कुछ
घटा था। गुरमीत की आँखों में फैले आतंक, ख़ालीपन और सूनापन
मुझे उस दिन की तमाम घटना सुनाते दिख रहे थे। कुलवंत माँ बनने
वाली थी। बेटी के बाद बेटा होने की दोनों को प्रबल आकांक्षा
थी। कुलवंत पूरे दिनों से थी। उसने गुरमीत को कहा भी, 'सुणो
जी, आज कम ते ना जाओ। लगदा है आज हस्पताल जाणा पयेगा।' आँखों में कुलवंत, गुड्डी और होने वाले पुत्र की तस्वीरें लिए गुरमीत ने अपनी कार स्टार्ट की। घर पहुँचने की जल्दी में गुरमीत ने एक्सीलेटर पर अपने पैर का दबाव बढ़ा दिया। अभी वह 'सी-फेस' पर पहुँचा ही था कि पुलिस का सायरन सुनाई दिया। किंतु वह तो अपनी ही धुन में गाड़ी चलाए जा रहा था। कुवैत टॉवर के पास पहुँचते-पहुँचते पुलिस की गाड़ी ने उसे रुकने का इशारा किया। गुरमीत घबरा गया। न जाने क्या अपराध हुआ है उससे। ठुल्ला अरबी भाषा में चिल्लाए जा रहा था और 'स्पीडो मीटर' की ओर इशारा किए जा रहा था। काफ़ी कठिनाई से गुरमीत को समझ आया कि उसे तेज़ गाड़ी चलाने के जुर्म में पकड़ा जा रहा है। उसने अपने सारे कागज़ पुलिस के हवाले कर दिए। एकाएक विचार कौंधा कि कुलवंत की क्या हालत होगी। अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में अरबी के शब्द मिलाकर वह पुलिस वालों को यह समझाने लगा कि उसकी पत्नी की 'डिलीवरी' होने वाली है और बच्चा किसी भी क्षण पैदा हो सकता है। किंतु उसकी बात न तो कोई सुन रहा था और ना ही किसी को समझ आ रही थी। गुरमीत को ले जाकर कोतवाली
में बंद कर दिया गया। वह गिड़गिड़ाया, उसने मिन्नतें की,
वास्ते दिए। उसने हर एक पुलिस वाले से बात करने की चेष्टा की
कि शायद किसी को उसकी बात समझ में आ जाए और उस पर दया करके उसे
छोड़ दे। फिर ख़याल आया, कुलवंत के पास दिनेश जी का घर का फ़ोन नंबर तो हैं। शायद भाभी जी को फ़ोन कर लिया हो। शायद जब वह जेल से बाहर निकले तो कुलवंत और बेटा दोनों हस्पताल में सुरक्षित हों। कुलवंत बेचारी गुरमीत की प्रतीक्षा करते-करते दर्द से निढाल होने लगी थी। गाँव की लड़की परदेस में अकेली। हिम्मत करके दिनेश बतरा के घर फ़ोन किया। पर वहाँ कोई फ़ोन ही नहीं उठा रहा था। जब दर्द असह्य हो गया तो सलवार उतार कर ज़मीन पर चटाई बिछा कर लेट गई। फिर विचार आया कि अगर बच्चा ज़मीन पर गिर गया तो वापस जाकर पलंग पर लेट गई। सोचा मोमजामा बिछा लूँ। ग़ुड्डी के जन्म के समय तो उसे कुछ सोचना ही नहीं पड़ा था। सब कुछ माँ के घर ही हुआ था। दर्द था कि बढ़ता ही जा रहा था। डेढ़ साल की गुड्डी माँ की हालत देखकर रोने लगी थी। पर माँ की कराहटें उसके बाल सुलभ मन को पीड़ित किए जा रही थीं। कुलवंत दर्द से चीखे जा रही
थी। गुरमीत को भी याद किए जा रही थी और अपनी माँ को भी। जब तक
ईद का चांद पैदा हुआ कुलवंत बेहोश हो चुकी थी। उसे पता ही नहीं
चला कि उसका बेटा हुआ या बेटी। बच्चा रोया या नहीं? अब न तो माँ की कराहटें सुनाई दे रहीं थीं और ना ही मुन्ने का रोना। पूरे घर में एक भयानक-सा सन्नाटा छाया हुआ था। रोते-रोते ही गुड्डी की भूख तेज़ होने लगी। वह बेचारी फ्रिज खोलने की कोशिश करने लगी। किंतु फ्रिज था कि खुल ही नहीं रहा था। गुरमीत के सामने जेल में खाना पड़ा था। वह बेसुध कभी उस खाने की ओर देखता तो कभी दीवारों की ओर शून्य में ताकने लगता। और उधर गुड्डी पूरे घर में कुछ-न-कुछ खाने को खोज रही थी। आख़िर थक कर चूर हो गई और रोते-रोते सो गई। गुरमीत हवालदार के पैर छूकर गिड़गिड़ा रहा था, एक टेलीफ़ोन करने की अनुमति माँग रहा था। पर 'वहाँ की पुलिस वाले तो बहुत ख़राब होते हैं ना जी।' सोते-सोते गुड्डी के पेट में मरोड़ ज़रूर उठा होगा। जाकर माँ को जगाने की कोशिश करने लगी। पर कुलवंत तो गहरी नींद में सो चुकी थी। गुड्डी के लिए एक बार फिर खाना ढूँढ़ने और रोने का काम शुरू। चौथे दिन गुरमीत की रिहाई
हुई। वह सीधा घर पहुँचा। चाबी से बाहर से ही दरवाज़ा खोला और
अंदर घुसते ही उसे नाक पर हाथ रखना पड़ा। सामने कुलवंत और
बच्चे की नंगी लाशे पड़ी थीं। गुड्डी को खोजा। वह फ्रिज के पास
ही पड़ी थी। दिनेश अपने चिरपरिचित अंदाज़
में गुरमीत को हौसला दिलाता रहा। अपनी गृहस्थी खुद अपने हाथों
से जलाकर गुरमीत वापस आ गया था, दारजी के पास। पर सब कुछ सह
जाने और कुछ न कर पाने की अपनी असमर्थता के कारण गुरमीत भीतर
ही भीतर घुटता रहा - एक भयानक चुप्पी ओढ़े हुए। |
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२४ अक्तूबर २००६ |
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