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दिनेश का फ़ोन कुवैत से आया तो मैं उस समय जापान गया हुआ था। यह नौकरी भी तो एक जगह टिक कर नहीं बैठने देती ना। दुनिया भर के शहरों का चक्कर काटता फिरता हूँ। घर में टिक कर रह पाना तो एक बहुत बड़ी उपलब्धि जैसा लगता है।

दिनेश ने कोई विशेष संदेश भी नहीं छोड़ा था। बात भी तो हमेशा संयत ढंग से ही करता है। समय ने उसे संपूर्ण रूप से परिपक्व बना दिया है। उसकी आवाज़ तो सदा ही सपाट-सी लगती है, किसी भी उत्तेजना या भावुकता से रहित। पत्नी ने उसे बता दिया था कि मैं जापान से कब लौटूँगा। और उसने भी बस इतना भर ही कहा कि 'मैं फिर फ़ोन कर लूँगा।'

'इकबाल भाई ने ईद पर सिवइयाँ भिजवाईं थीं। नाराज़ हो रहे थे। कह रहे थे कि इतना बड़ा मोटर ट्रेनिंग स्कूल चला रहे हैं और हमारी भाभी हैं कि अभी तक गाड़ी भी नहीं चला पाती हैं। आपको काफ़ी डांट रहे थे कि बीवी को घर में कैद करके रखा हुआ है।' पत्नी ने सूचना दी।

इकबाल भाई को ईद-मुबारक कहने के लिए टेलीफ़ोन किया और चाय की चुस्की भरने लगा।
दिनेश का फ़ोन फिर आया। वही संयत आवाज़, 'सुरेन तुम कल ही कुवैत आ जाओ। बहुत ज़रूरी काम है। मैं एयरपोर्ट पर तुम्हारे लिए वीज़ा लेकर आ जाऊँगा। कम से कम एक हफ़्ते की छुट्टी लेकर आ जाओ। काम बहुत ज़रूरी है। गुरमीत को तुम्हारी सख़्त ज़रूरत है।'

मैं हलो-हलो कहता रहा। पर दिनेश को तो बस सूचना देनी थी और यह काम वह पहले ही कर चुका था।
पत्नी की नाराज़गी के बावजूद मैं कुवैत की ओर चल दिया। ना जाने क्या अनबूझ-सा रिश्ता बन गया था मेरे और गुरमीत के बीच।

घर से निकलने की सोच ही रहा था कि बाहर फ़ायर इंजन के चिंघाड़ने की आवाज़ आई। पता नहीं कहाँ आग लगी थी। टैक्सी में बैठा तो पास से सर्र करती हुए एँबुलैंस निकली। रास्ते में अंधेरी के श्मशान घाट के सामने से टैक्सी गुज़री तो शरीर में झुरझुरी-सी उभरी।
कुवैत पहुँचकर दिनेश मुझे सीधा अपने घर ही ले गया। गुरमीत वहीं पर था। चुप! एकदम चुप! उस हर समय चहकने वाले गुरमीत के स्थान पर जैसे किसी ने उसकी पत्थर की मूरत बनवा कर रखी दी हो। मुझे देखकर भी उस पर कोई विशेष प्रतिक्रया नहीं हुई। उसकी आँखों में कोई पहचान या ख़ुशी नहीं उभरी। उस ज़िंदादिल गुरमीत को एक ज़िंदा लाश बना देने के लिए किसे कसूरवार ठहराया जाए - नियति को या...। और मैं कुछ भी नहीं सोच पा रहा था, केवल गुरमीत की एक ही बात, हथौड़े की तरह, बार-बार मेरे दिमाग में बजे जा रही थी, 'भराजी, यहाँ की पुलिस बड़ी ख़राब होती है जी।'

अगले ही दिन मैं और दिनेश गुरमीत को साथ लिए एक बार फिर उस रास्ते पर चल दिए जहाँ सब कुछ घटा था। गुरमीत की आँखों में फैले आतंक, ख़ालीपन और सूनापन मुझे उस दिन की तमाम घटना सुनाते दिख रहे थे। कुलवंत माँ बनने वाली थी। बेटी के बाद बेटा होने की दोनों को प्रबल आकांक्षा थी। कुलवंत पूरे दिनों से थी। उसने गुरमीत को कहा भी, 'सुणो जी, आज कम ते ना जाओ। लगदा है आज हस्पताल जाणा पयेगा।'
'ओ भागवाने डरने की क्या गल है? ये फोन रख्या है न, बस कर देणा। मैं गोली वांग भजया आऊँ। डरीदा नहीं होंदा। कल तों तां ईद दियाँ छुटि्टया नें।'
हुआ वही जिसका कुलवंत को डर था। प्रसव वेदना शुरू हो गई। थोड़ी देर तक तो वह सहती रही। फिर जब नहीं सहा गया तो उसने गुरमीत को फ़ोन किया। गुरमीत भी काफ़ी उत्तेजित था। प्रसन्नता और चिंता की मिश्रित भावनाएँ लिए वह अपनी कार की ओर भागा। गुड्डी के जन्म के समय तो वह कुलवंत से बहुत दूर था किंतु इस बार वह कुलवंत के साथ होगा, उसे स्वयं सहारा देगा। साथी ने बधाई भी दी, 'गुरमीत सिंह अब तो ईद पर बेटा होने वाला है। बहुत किस्मत वाला होगा।'

आँखों में कुलवंत, गुड्डी और होने वाले पुत्र की तस्वीरें लिए गुरमीत ने अपनी कार स्टार्ट की। घर पहुँचने की जल्दी में गुरमीत ने एक्सीलेटर पर अपने पैर का दबाव बढ़ा दिया। अभी वह 'सी-फेस' पर पहुँचा ही था कि पुलिस का सायरन सुनाई दिया। किंतु वह तो अपनी ही धुन में गाड़ी चलाए जा रहा था। कुवैत टॉवर के पास पहुँचते-पहुँचते पुलिस की गाड़ी ने उसे रुकने का इशारा किया। गुरमीत घबरा गया। न जाने क्या अपराध हुआ है उससे। ठुल्ला अरबी भाषा में चिल्लाए जा रहा था और 'स्पीडो मीटर' की ओर इशारा किए जा रहा था। काफ़ी कठिनाई से गुरमीत को समझ आया कि उसे तेज़ गाड़ी चलाने के जुर्म में पकड़ा जा रहा है। उसने अपने सारे कागज़ पुलिस के हवाले कर दिए। एकाएक विचार कौंधा कि कुलवंत की क्या हालत होगी। अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में अरबी के शब्द मिलाकर वह पुलिस वालों को यह समझाने लगा कि उसकी पत्नी की 'डिलीवरी' होने वाली है और बच्चा किसी भी क्षण पैदा हो सकता है। किंतु उसकी बात न तो कोई सुन रहा था और ना ही किसी को समझ आ रही थी।

गुरमीत को ले जाकर कोतवाली में बंद कर दिया गया। वह गिड़गिड़ाया, उसने मिन्नतें की, वास्ते दिए। उसने हर एक पुलिस वाले से बात करने की चेष्टा की कि शायद किसी को उसकी बात समझ में आ जाए और उस पर दया करके उसे छोड़ दे।
हम तीनों दिनेश की कार में सवार कुवैत टॉवर तक पहुँच गए और गुरमीत की आँखों का दर्द जैसे कई गुणा बढ़ गया था। कुछ न कर पाने का अहसास उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
गुरमीत को जेल में डालकर इंस्पेक्टर तो ईद की छुटि्टयाँ मनाने चला गया। और गुरमीत चार दिन तक उस जेल की दीवारों से सिर टकराता रहा, चिल्लाता रहा, अपनी कुलवंत को याद करता रहा।

फिर ख़याल आया, कुलवंत के पास दिनेश जी का घर का फ़ोन नंबर तो हैं। शायद भाभी जी को फ़ोन कर लिया हो। शायद जब वह जेल से बाहर निकले तो कुलवंत और बेटा दोनों हस्पताल में सुरक्षित हों। कुलवंत बेचारी गुरमीत की प्रतीक्षा करते-करते दर्द से निढाल होने लगी थी। गाँव की लड़की परदेस में अकेली। हिम्मत करके दिनेश बतरा के घर फ़ोन किया। पर वहाँ कोई फ़ोन ही नहीं उठा रहा था। जब दर्द असह्य हो गया तो सलवार उतार कर ज़मीन पर चटाई बिछा कर लेट गई। फिर विचार आया कि अगर बच्चा ज़मीन पर गिर गया तो वापस जाकर पलंग पर लेट गई। सोचा मोमजामा बिछा लूँ। ग़ुड्डी के जन्म के समय तो उसे कुछ सोचना ही नहीं पड़ा था। सब कुछ माँ के घर ही हुआ था। दर्द था कि बढ़ता ही जा रहा था। डेढ़ साल की गुड्डी माँ की हालत देखकर रोने लगी थी। पर माँ की कराहटें उसके बाल सुलभ मन को पीड़ित किए जा रही थीं।

कुलवंत दर्द से चीखे जा रही थी। गुरमीत को भी याद किए जा रही थी और अपनी माँ को भी। जब तक ईद का चांद पैदा हुआ कुलवंत बेहोश हो चुकी थी। उसे पता ही नहीं चला कि उसका बेटा हुआ या बेटी। बच्चा रोया या नहीं?
गुड्डी भी रोये जा रही थी। उसकी माँ का शरीर खून से लथपथ था और उसके साथ बँधा हुआ था एक छोटा-सा नन्हा मुन्ना। मुन्ना तो रोए जा रहा था। वह भी तो रक्त में सना पड़ा था। गुड्डी ने उसे हाथ लगाया तो उसे अपने हाथ में चिपचिपाहट महसूसू हुई। अब वह पूर्ण रूप से घबरा गई। अपने नन्हें-नन्हें कदमों के सहारे दरवाज़े की ओर भागी। किंतु दरवाज़े की चिटकनी तो उस नन्हीं सी गुड़िया की पहुँच से काफ़ी ऊपर थी। काफ़ी देर तक दरवाज़ा पीटती रही। मगर कोई सुन पाता तभी तो खोलता।

अब न तो माँ की कराहटें सुनाई दे रहीं थीं और ना ही मुन्ने का रोना। पूरे घर में एक भयानक-सा सन्नाटा छाया हुआ था। रोते-रोते ही गुड्डी की भूख तेज़ होने लगी। वह बेचारी फ्रिज खोलने की कोशिश करने लगी। किंतु फ्रिज था कि खुल ही नहीं रहा था। गुरमीत के सामने जेल में खाना पड़ा था। वह बेसुध कभी उस खाने की ओर देखता तो कभी दीवारों की ओर शून्य में ताकने लगता। और उधर गुड्डी पूरे घर में कुछ-न-कुछ खाने को खोज रही थी। आख़िर थक कर चूर हो गई और रोते-रोते सो गई।

गुरमीत हवालदार के पैर छूकर गिड़गिड़ा रहा था, एक टेलीफ़ोन करने की अनुमति माँग रहा था। पर 'वहाँ की पुलिस वाले तो बहुत ख़राब होते हैं ना जी।' सोते-सोते गुड्डी के पेट में मरोड़ ज़रूर उठा होगा। जाकर माँ को जगाने की कोशिश करने लगी। पर कुलवंत तो गहरी नींद में सो चुकी थी। गुड्डी के लिए एक बार फिर खाना ढूँढ़ने और रोने का काम शुरू।

चौथे दिन गुरमीत की रिहाई हुई। वह सीधा घर पहुँचा। चाबी से बाहर से ही दरवाज़ा खोला और अंदर घुसते ही उसे नाक पर हाथ रखना पड़ा। सामने कुलवंत और बच्चे की नंगी लाशे पड़ी थीं। गुड्डी को खोजा। वह फ्रिज के पास ही पड़ी थी।
'हरामज़ादों!' वह दहाड़ा, 'मैं तुम्हें ज़िंदा नहीं छोडूँगा। एक-एक को मार डालूँगा स़बको चुन-चुनकर मार डालूँगा।' वह चिल्लाए जा रहा था। कुलवंत, गुड्डी और मुन्ने की लाशों पर काफ़ी देर तक रोता रहा। थोड़ा सँभला और दिनेश बतरा को फ़ोन किया।

दिनेश अपने चिरपरिचित अंदाज़ में गुरमीत को हौसला दिलाता रहा।
'दिनेश जी मैं अब यहाँ नहीं रहूँगा जी। पर जाने से पहले सबका काम तमाम कर दूँगा जी। किसी हरामज़ादे को नहीं छोडूँगा।' रह-रहकर गुरमीत के भीतर का हिंसक पशु जाग उठता। दिनेश ने उसे बड़ी कठिनाई से संभाला। और अब हम दोनों उसे समझा रहे थे।

अपनी गृहस्थी खुद अपने हाथों से जलाकर गुरमीत वापस आ गया था, दारजी के पास। पर सब कुछ सह जाने और कुछ न कर पाने की अपनी असमर्थता के कारण गुरमीत भीतर ही भीतर घुटता रहा - एक भयानक चुप्पी ओढ़े हुए।
और यह चुप्पी आज ही टूटी थी जब वह हर्षोल्लास से चिल्ला उठा था- 'कर दी सालों की ढिबरी टाइट!'

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२४ अक्तूबर २००६